कन्हैया कुमार सीपीआई के टिकट पर बेगूसराय लोक सभा सीट से जोर आजमाईश करेंगे; क्या राजद समर्थन करेगा?

जवाहरलाल यूनिवर्सिटी के पूर्व अध्यक्ष और छात्र कन्हैया कुमार 2019 लोक सभा चुनाव सीपीआई के उम्मीदवार के तौर पर बेगूसराय सीट से लड़ेंगे. विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से, ये पता चला है कि सीपीआई के बेगूसराय यूनिट ने कन्हैया कुमार के नाम का प्रस्ताव राज्य की कार्यकारिणी को भेज दिया है. जैसे ही नाम पर मुहर लग जाती है, तो कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी की घोषणा कर दी जायेगी.

बेगूसराय में भूमिहारों का वर्चस्व है.  इसे “पूरब का लेनिनग्राद” के नाम से भी जाना जाता रहा है. अभी भी बेगूसराय में कम्युनिस्ट पॉलिटिक्स की अच्छी खासी पकड़ है. 2014 लोक सभा चुनाव में भोला सिंह को जीत हासिल हुई थी. भोला सिंह पूर्व कोंग्रेसी थे, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कम्युनिस्ट कार्यकर्त्ता के तौर पर शुरू की थी, उन्होंने भाजपा के टिकट पर बेगूसराय लोक सभा सीट से जीत हासिल की थी. बीजेपी के भोला सिंह 2014 चुनाव में आरजेडी के तनवीर हसन को करीब 58,000 वोटों से हराकर विजयी बने थे. जबकि सीपीआई उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह तीसरे स्थान पर रहे.

सूत्रों के अनुसार, जहाँ कांग्रेस बेगूसराय सीट से कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी के पक्ष में है, इसके विपरीत राजद इस सीट पर अपना दावा ठोंक सकता है. 2004 और 2009 में इस सीट पर जदयू के उम्मीदवार की जीत हुई. 2014 में भाजपा और जदयू अलग अलग लड़े और इस सीट पर भाजपा उम्मीदवार ने जीत हासिल की. फिलहाल सांसद भोला सिंह का देहांत हो चुका है. और चर्चा चल रही है कि बेगूसराय लोक सभा सीट से चुनाव लड़ने में नवादा सीट से सांसद गिरिराज सिंह रूचि दिखा रहे हैं. वहीँ नवादा सीट पर सूरज भान सिंह की पत्नी और मुंगेर लोकसभा सीट से वर्तमान सांसद लोजपा की वीणा देवी को खड़ा किया जा सकता है, ताकि मुंगेर लोक सभा सीट जदयू उम्मीदवार ललन सिंह के लिए खाली की जाए.

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि अगर कन्हैया कुमार चुनावी राजनीति में कदम रखते हैं, तो ये खुद लेफ्ट पॉलिटिक्स के लिए अच्छा रहेगा. राज्य में राजनीति की मुख्यधारा में लेफ्ट आ सकता है.

बताते चलें कि बता दें, कन्हैया मूल रूप से बेगूसराय जिले के बरौनी ब्लॉक में बिहट पंचायत के हैं. उनकी मां मीना देवी एक आंगनबाड़ी सेविका हैं और उनके पिता जयशंकर सिंह यहीं एक किसान हैं.

कन्हैया कुमार सीपीआई के छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन के सदस्य रहे हैं, जिन्हे 2016 में जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में भारत विरोधी गतिविधि आयोजित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कन्हैया कुमार के साथ उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को भी गिरफ्तार किया था. लेकिन पर्याप्त सबूत की कमी के चलते कोर्ट ने तीनों को जमानत पर छोड़ दिया, साथ ही दिल्ली पुलिस को भी फटकार लगाई थी.

फिलहाल कन्हैया के समर्थकों में एक उत्साह की लहर है और सोशल मीडिया में उनके समर्थकों ने एक मुहीम सी चला रखी है.

बेगुसराय “पूरब का लेनिनग्राद”

बेगुसराय कभी पूरब का लेनिनग्राद कहलाता था. आज भी कई इलाकों में वामपंथ के  समर्थक उस दौर को याद करते हैं जब बिहार में ऊंची जाति में गिने जाने वाले भूमिहारों ने वामपंथ का झंडा थामकर यहां के ‘जमींदारों’ के खिलाफ पहली बार मोर्चा खोल दिया था. खास बात यह थी कि जिनके खिलाफ यह मोर्चा खोला गया था वह भी भूमिहार ही  थे, जिनका लाल मिर्च की खेती में एकाधिकार था. इस लड़ाई में जो नेता उभरे चंद्रशेखर सिंह, सीताराम मिश्रा, राजेंद्र प्रसाद सिंह ये सभी भूमिहार समुदाय से आते थे. धीरे-धीरे तेघड़ा और बछवारा विधानसभा सीटें वामपंथ का गढ़ बन गईं और कोई भी लहर इसको भेदने में नाकाम रही. ये एक अजीब स्थिति थी, जब शोषक वर्ग भी भूमिहार और इसके खिलाफ लड़ने वाले भी भूमिहार ही थे. दलित और पिछड़े नेतृत्व की स्थिति में नहीं थे.

तेघड़ा विधानसभा सीट जिसे कभी ‘छोटा मॉस्को’ के नाम से भी जाना जाता था यहां पर 1962 से लेकर 2010 का वामपंथी पार्टियों का कब्जा रहा है. 2010 में बीजेपी ने यहां जीत दर्ज की थी. वहीं बछवारा सीट भी साल 2015 में आरजेडी के पास चली गई. वामपंथ के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध 90 के दशक में लगनी शुरू हो गई थी.  जब मंडल आन्दोलन ने पिछड़ी जातियों में राजनीतिक अलख जगानी शुरू कर दी. अब वे उच्च जातियों का पारंपरिक नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार नहीं थे.  लालू यादव के चमत्कारिक उदय ने पुरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया. इसी दौरान बिहार में जातिगत हिंसा का खुनी खेल शुरू हुआ. वोटो का ध्रुवीकरण शुरू हुआ. बची खुची कसर आडवाणी की रथ यात्रा ने पूरी कर दी. अडवानी के नेतृत्व में हिंदुत्व की भगवा राजनीति ने समूचे उत्तर भारत में पाँव फैलाना शुरू कर दिया. ऐसे में जहाँ दलित और पिछडी जातियां लालू के नेतृत्व में जनता दल और आगे चल कर नीतीश कुमार के समता दल के बैनर तले एकजुट होने लगे, वहीँ उच्च जातियों के लोग कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा के झंडे तले एकजुट होने लगे. पूरा सामाजिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा था. पूरब का लेनिनग्राद ध्वस्त हो रहा था और अपने सुनहरे अतीत को याद कर रहा था. 1995 तक यहां की 7 में से 5 सीटें सीपीआई या सीपीएम के पास थीं. पर फिर तेजी से ये घटने लगा. रोचक बात ये भी रही कि जिस समय मध्य बिहार जमीन, उचित मजदूरी और दलित औरतों की आबरू के लिए खुनी संघर्ष में भिड़ा हुआ था, पूरब के लेनिनग्राद कहे जाने वाले बेगुसराय में इसका असर नहीं था. हिंसक लड़ाई से दूर था लेनिनग्राद !!

पर लग रहा है कि परिस्थितियों ने एक बार फिर से करवट लिया है.  हवा के रुख में बदलाव आया है. अब वामपंथी राजनीति के लिये दौर बदल रहा है. अगर राजद का समर्थन कन्हैया कुमार को मिल गया, तो NDA उम्मीदवार की राह कठिन हो सकती है. पिछले चुनाव में राजद दुसरे स्थान पर आया था. ऐसे में उम्मीद की किरण बनी है, कन्हैया कुमार और वामपंथी दलों के लिए भी.  रोचक बात ये है कि  ‘पूरब का लेनिनग्राद’ होते हुए भी सीपीआई एक ही बार लोकसभा चुनाव (1967) जीत पाई है. साल 2004 से यहां से एनडीए का प्रत्याशी ही लगातार जीत रहा है.


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