आरा लोकसभा सीट: क्या फिर से भाजपा सांसद आर के सिंह लोक सभा पहुँच सकेंगे?

यादव, कुशवाहा, भूमिहार, राजपूत और कुछ दलित जातियों से आबाद आरा लोक सभा सीट जमीन के मुद्दे को लेकर लम्बे खुनी संघर्ष का गवाह रहा है. पिछले कुछ चुनावों में राजपूत उम्मीदवारों का बोलबाला रहा है. आरा लोक सभा क्षेत्र में कुल मिलाकर 7 विधान सभा क्षेत्र आते हैं: सन्देश, बरहारा, आरा, अगिआंव, तरारी, जगदीशपुर और शाहपुर.

अभी यहाँ से वर्तमान सांसद भाजपा के आर के सिंह हैं, जिन्होंने 2014 के चुनाव में राजद के भगवान् सिंह कुशवाहा को हराया था. भगवान् सिंह कुशवाहा पहले जदयू में थे, पर राजद से टिकट मिल जाने के बाद उन्होंने जदयू छोड़कर राजद ज्वाइन कर लिया. आरा लोकसभा की समस्याएं अमूमन वही हैं, जो प्रदेश के अन्य लोकसभा क्षेत्रों की हैं; बिजली, सिचाई की समस्या, सड़क, आदि.

आरा लोक सभा सीट का इतिहास:
1952 से अब तक आरा लोक सभा सीट पर कुछ लोगों का दबदबा रहा है. 1952 से लेकर 1971 तक लगातार पांच चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार बलिराम भगत जीतते आये. जहाँ 1952 में इस लोकसभा सीट को पटना शाहाबाद सीट के नाम से जाना जाता था, वहीँ 1957 में दूसरे लोक सभा चुनाव में ये शाहाबाद सीट के नाम से जाना गया. फिर तीसरे लोक सभा चुनाव से ये आरा लोक सभा सीट के नाम से जाना जाने लगा. 1977 में इमरजेंसी के उठने के बाद हुए चुनाव में इंदिरा गाँधी लहर में कांग्रेस आरा लोक सभा सीट गंवा बैठी. इस बार भारतीय लोक दल के चंद्रदेव प्रसाद वर्मा को जीत हासिल हुई. और 1980 में एक बार फिर चंद्रदेव प्रसाद वर्मा ही जीते, पर इस बार जनता दल ( सेक्युलर) के टिकट पर. 13 साल बाद कांग्रेस के बलिराम भगत की वापसी हुई, जब इंदिरा गांधी की ह्त्या से उपजे सहानुभूति लहर में वे एक बार फिर लोकसभा पहुंचे. 1989 में पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी इंडियन पीपल्स रामेश्वर प्रसाद जीत हासिल करने में सफल रहे. भोजपुर जिला नक्सल आंदोलन का केंद्र रहा है बिहार में. यही सहार ब्लॉक् के एक्वैरिया गांव से मास्टर जगदीश के नेतृत्व में नक्सल आंदोलन की शुरुआत मानी जाती है. नक्सल आंदोलन दलितों की अस्मिता, मज़दूरी का उचित मुआवज़ा, जमीन के आसमान वितरण के खिलाफ आवाज के मुद्दे पर शुरू
हुआ था. पर 1991 के अगले चुनाव में रामेश्वर प्रसाद अपनी दुहरा सके और जनता दल के राम लखन सिंह यादव इस सीट से चुने गए. मंडल आंदोलन के उभार का दौर था. कम्युनिस्टों को जाति के सवाल से जूझना था. 1996 में लम्बे अंतराल के बाद चंद्रदेव प्रसाद वर्मा की वापसी हुई और जनता दल के उम्मीदवार के रूप में इन्हे सफलता मिली. 1998 में समता पार्टी के एच पी सिंह इस सीट से जीते. 1999 में राजद के राम प्रसाद सिंह को जीत हासिल हुई. अब तक जनता दल विभिन्न घटकों में बंट चुका था. समता पार्टी, राजद आदि. 2004 में एक बार फिर राजद को सफलता मिली, जब कांति सिंह इस सीट से जीतीं. 2009 में जदयू उम्मीदवार मीना सिंह इस सीट से लोकसभा पहुंची. 2014 में भाजपा और जदयू अलग अलग लड़ रहे थे, इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार आर के सिंह को जीत हासिल हुई. आर के सिंह नीतीश कुमार के विश्वस्त प्रशासनिक अधिकारी रह चुके थे.

भगवान् सिंह कुशवाहा

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार आर के सिंह को कुल 3,91,074 वोट मिले जो कुल पड़े मतों का 43.78 प्रतिशत था. दूसरे स्थान पर रहे राजद उम्मीदवार भगवान् सिंह कुशवाहा, जिन्हे कुल2,55,204 वोट मिले, जो कुल पड़े मतों का 28.57 प्रतिशत वोट था. सीपीआई (माले) के उम्मीदवार राजू यादव तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें 98,804 वोट मिले, जो कुल डाले गए वोट का 11.06 प्रतिशत वोट था. आश्चर्य की बात ये है कि 2009 में इस सीट पर जीत हासिल करने वाली जदयू की मीना सिंह चौथे स्थान पर रहीं और उन्हें महज 75,962 वोट मिले,जो कुल पड़े 8.50 प्रतिशत था.

2019 का चुनावी परिदृश्य:

आर के सिंह की इमेज एक नो नॉनसेंस नौकरशाह की रही है. इन्होने ही 1990 में आडवाणी के रथ यात्रा के दौरान लालू यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार किया था. उस समय आर के सिंह समस्तीपुर के जिलाधिकारी थे. ये नीतीश कुमार के भी विश्वस्त अधिकारी रहे और उनकी कोर टीम का हिस्सा रहे. केंद्र में होम सेक्रेटरी रहे और कई महत्वपूर्ण मामलों से जुड़े रहे. 2013 में रिटायरमेंट के बाद भाजपा ज्वाइन किया. सुपौल के रहने वाले आर के सिंह के सुपौल या आरा से चुनाव लड़ने की उम्मीद जताई जा रही थी. पर आर एस एस ने सुपौल से उनके चुनाव लड़ने पर ऐतराज जताया. ऐसे में आरा सीट से इन्हे भाजपा उम्मीदवार बनाया गया.
2019 में चुनावी विश्लेषकों की राय है कि आरा लोक सभा में जातीय समीकरण को देखते हुए ये सीट एक बार फिर भाजपा के हिस्से ही आएगी और आर के सिंह एक बार फिर चुनावी मैदान में एनडीए उम्मीदवार के रूप में होंगे. हालाँकि 2019 में 2014 की मोदी लहर नहीं है, पर जदयू के साथ आ जाने से वोटों का बिखराव नहीं होगा और उम्मीद की जा रही है कि यह सीट एनडीए के खाते में एक बार फिर से जायेगी.

फिलहाल राजद ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. पर आरा सीट राजद के लिए चुनौती भरा है. आर के सिंह के पहाड़ जैसी चुनौती से पार पाना फिलहाल राजद के लिए मुश्किल लग रहा है.


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