आधा दर्जन से अधिक संबंधों के बाद भी प्रेम की प्यासी मधुबाला; पुण्यतिथि पर विशेष

नवीन शर्मा

मधुबाला का नाम लेने भर से आंखों के सामने दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला की तस्वीर उभर कर सामने आती है. उनके अप्रतिम सौंदर्य को शब्दों में बयान करना मुश्किल है. वे स्वर्ग की अप्सराओं जैसी सुंदर थी. उनकी खूबसूरती में एक अलग सा जादू था. उन्हें देखते ही उनके सौंदर्य के सम्मोहन से बचना मुश्किल था. यही वजह थी कि उनके साथ काम करनेवाले आधा दर्जन से अधिक अभिनेताओं ने खुद को उनके प्रेमपाश में बंधा पाया था.

सिर्फ नौ साल की उम्र में फिल्मी दु में रखा कदम

मधुबाला ने महज नौ साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में काम शुरू किया था. 1949 में उन्होंने अपना नाम बदल कर मधुबाला किया था. मधुबाला के पिता अत्ताउल्ला खान उनको अपनी कड़ी निगरानी में रखते थे.वे खुद फिल्म के सेट पर पर लेकर जाते थे.

शम्मी कपूर को पहली फिल्म में ही हो गया इश्क

शम्मी कपूर ने मधुबाला के साथ पहली फिल्म रेल का डिब्बा (1953) मे काम शुरू किया. हालांकि शम्मी बड़े निर्देशकों के साथ पूरे आत्मविश्वास के साथ काम कर चुके लेकिन शम्मी मधुबाला के सामने आए तो स्तब्ध थे. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘मैं मधुबाला के सामने बहुत ज्यादा नर्वस था, इतना कि मैं अपने डॉयलाग्स भी भूल गया था. जब मैंने उनकी ओर देखा मेरे मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे. हां, उनका मेरे ऊपर ऐसा असर हुआ था. और यह बात मधुबाला को समझ आ गयी थी. उन्होंने मेरी मदद की और एक महीने बाद, मुझे प्यार हो गया.। धर्म की दीवार बड़ी थी इसलिए शम्मी कपूर इस बात को आगे नहीं ले जा सके.

प्रेमनाथ भी थे मधुबाला के प्रेम में

प्रेमनाथ और मधुबाला की जोड़ी ने तीन फिल्मों (बादल, आराम और साक़ी) में तो कोई कमाल नहीं किया, लेकिन यह जोड़ी फिल्मों से बाहर बनने को तैयार थी. एक इंटरव्यू में प्रेमनाथ ने माना था कि वे दोनों शादी भी कर सकते थे, अगर इस प्रेम कहानी के बीच अचानक दिलीप कुमार न आ गए होते. ये वो वक़्त था जब मधुबाला प्रेमनाथ और दिलीप कुमार दोनों को ही रहस्य में रखे हुए थीं. प्रेमनाथ के अनुसार उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार की ओर झुकते हुए देखा था और इसके बाद उन्होंने खुद को बीच से हटा लेना ही उचित समझा. प्रेमनाथ और मधुबाला हमेशा अच्छे दोस्त रहे और कहते हैं कि अंततः दिलीप कुमार का मधुबाला से शादी न करने का फैसला प्रेमनाथ को काफी नागवार गुजरा.

गुरुदत्त के साथ जोड़ी

मि. एंड मिसेस 55 को तकरीबन सभी समीक्षकों ने मधुबाला की सबसे बेहतरीन फिल्मों में शुमार किया है. फिल्म बेहद सफल रही और दोनों की केमिस्ट्री भी. गुरुदत्त ने ही मधुबाला की कॉमिक टाइमिंग को सबसे पहले पहचाना था जिसे हमने बाद में महलों के ख्वाब (1957) और चलती का नाम गाड़ी (1960) में भी देखा. गुरुदत्त निजी ज़िन्दगी में जिन परिस्थितियों से गुजर रहे थे वही हालात तकरीबन मधुबाला के साथ भी थे. अजीब इत्तेफाक था कि आगे चलकर मात्र चार साल के अंतराल में दोनों ने ही 40 की उम्र के पहले ही दुनिया को अलविदा कह दिया.

किशोर कुमार से विवाह

किशोर कुमार के साथ मधुबाला ने चार फिल्मों में काम किया. इनमें चलती का नाम गाड़ी (1960) और हाफ टिकट (1962) काफ़ी सफल भी रहीं. ये वो वक़्त था जब किशोर कुमार ने अपनी दूसरी शादी मधुबाला के साथ की. मधुबाला और किशोर कुमार के बिगड़े हुए रिश्तों पर काफी बाते कही जाती है. हालांकि मधुबाला के कई करीबियों ने इस तथ्य को मानने से इनकार किया कि किशोर मधुबाला के साथ बुरा बर्ताव करते थे लेकिन यह भी सच था कि अपने आखिरी दिनों में मधुबाला ज़्यादातर अपने पिता के घर में ही रहीं और किशोर कुमार उन्हें देखने आते रहे.

देव आनंद के साथ की नौ फिल्में

‘अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना.’ यह गाना समझने के लिए काफी है कि देव आनंद और मधुबाला परदे पर दिखने वाली सबसे बेहतरीन जोड़ियों में से एक थे. दोनों ने नौ फिल्मों में काम किया. देव आनंद अपने हिस्से का प्यार कर चुके थे, प्यार को खो चुके थे और कल्पना कार्तिक के साथ शादी भी कर चुके थे. शायद इसलिए वे और अभिनेताओं से ज्यादा परिपक्व थे. वे मानते थे कि मधुबाला में एक निर्दोष चंचलता थी जो साथी कलाकारों को रिझाने से नहीं चूकती थी. एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘मधुबाला को उनका ख्याल रखा जाना पसंद था, उन्हें प्यार था खुद को मिलने वाले प्यार से. ये एक मजेदार बात थी कि उनको निर्दोष भाव से फ्लर्ट करना पसंद था. लेकिन वे अचानक ही संजीदा हो जाती थीं, एकदम से’. एक अन्य साक्षात्कार में निर्देशक राज खोसला का भी मानना था कि मधुबाला अचानक ही आसपास के माहौल से निर्लिप्त हो जाती थीं. यह शायद वही अकेलापन था जो सामने आ जाता था.

अशोक कुमार के साथ हावड़ा ब्रिज

हिंदी फिल्मों के इतिहास में नायिका का नायक को रिझाने के लिए गाया गया कोई भी आइटम सॉन्ग इतना शालीन और सुरीला नहीं रहा जितना कि ‘आइये मेहरबां, बैठिये जानेजां..’ (हावड़ा ब्रिज, 1958). मधुबाला की पहली सफल फिल्म, महल 1949, अशोक कुमार के साथ थी. अशोक कुमार ने मधुबाला को बॉम्बे टाकीज में बतौर बाल कलाकार देखा था और बाद में वे उनकी नायिका भी बनीं. अशोक कुमार का एक साक्षात्कार में कहना था, ‘मधुबाला कभी मेरी दोस्त नहीं रही, हां, वो मेरी पत्नी के काफी करीब थी.’ अशोक कुमार ने मधुबाला को गीताबाली के साथ सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री माना.

राजकपूर पहली और आखिरी फिल्म के हीरो

राजकपूर के साथ मधुबाला ने शुरूआती दौर (1947-48) में चार फ़िल्में कीं जिनमें नीलकमल (1947) उल्लेखनीय है . राजकपूर, उनकी बतौर अभिनेत्री पहली (नीलकमल) और आखिरी (चालाक), दोनों ही फिल्मों के हीरो थे. अपने आखिरी दौर में मधुबाला को अपनी बीमारी की वजह से कई फिल्मों को अधूरा ही छोड़ना पड़ा. 1966 में फिल्म चालाक को पूरा करने के लिए उन्होंने फिर बाहर कदम निकाला था. लेकिन बढ़ती बीमारी की वजह से उन्हें फिर काम छोड़ना पड़ा और चालाक अधूरी ही रही.

दिलीप कुमार के साथ चला कोर्ट केस

नया दौर (1957) की सफलता के साथ एक कोर्ट केस भी चल रहा था, जहां दिलीप कुमार और मधुबाला एक दुसरे के सामने खड़े थे. नया दौर में एडवांस फीस लेने के बाद भी मधुबाला ने अपने पिता के कहने पर मुंबई से बाहर जाकर शूट करने से मना कर दिया था. इसलिए कि मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान को लगता था कि यह शेड्यूल निर्माता बी आर चोपड़ा ने सिर्फ इसलिए रखा है कि दिलीप कुमार मधुबाला के साथ रोमांस कर सकें. रिश्तों में गजब की खटास आ चुकी थी. लेकिन मधुबाला का मन अब भी साफ़ था. फिल्मफेयर के एक पत्रकार के मुताबिक़ नया दौर की घटना के बाद मधुबाला ने उन्हें विशेष तौर पर घर बुलाकर इसलिए इंटरव्यू दिया था क्योंकि वे जानती थीं कि पत्रकार दिलीप कुमार के करीबी हैं. उन्हें उम्मीद थी कि वे उनका यह संदेश दिलीप कुमार तक पहुंचाएंगे कि वे अब भी उनसे कितना प्यार करती हैं. हालांकि इस संदेश को दिलीप कुमार ने दो शब्दों में सख्ती से खारिज कर दिया.

बेहद सफल जोड़ी होने के बाद भी मधुबाला और दिलीप कुमार की सिर्फ चार फिल्में ही आयीं. तराना (1951) की सफलता से शुरू हुई इस जोड़ी ने अपनी आखिरी फिल्म मुग़ले आज़म (1960) में भी सफलता के झंडे गाड़े. एक साक्षात्कार में दिलीप कुमार का कहना था, ‘मधुबाला की खूबसूरती ने उसकी कई और खूबियों को दबा दिया. हालांकि वो खूबसूरत थी लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसका चेहरा बहुत तराशा हुआ था.’
. मुग़ले आज़म भी मधुबाला की झोली में मीना कुमारी और निर्माता के आसिफ के बीच विवाद हो जाने के बाद आई. मीना कुमारी मुग़ले आज़म के लिए 15 दिन की शूटिंग कर चुकी थीं.

मधुबाला ने और भी कई अभिनेताओं के साथ फिल्में कीं जैसे कि प्रदीप कुमार, रहमान, अभी भट्टाचार्य, अजित और नासिर खान. मोतीलाल के साथ की गी उनकी फिल्म हंसते आंसू (1950) को ए सर्टिफिकेट मिला. इससे खुद मधुबाला यह फिल्म नहीं देख सकीं क्योंकि वे उस वक़्त 17 वर्ष की थीं. बलराज साहनी के साथ की गई उनकी एकमात्र फिल्म ये बस्ती ये लोग पूरी न हो सकी, इसका भी कइयों को अफसोस होगा.

मधुबाला का विवाह प्रस्ताव ठुकराया
एक तरफ जहां मधुबाला पर मर मिटने वाले लोगों की लंबी लाइन लगी थी वहीं दूसरी तरफ एक शख़्स ऐसा भी था जिसने मधुबाला का विवाह का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. ये थे संगीतकार एस मोहिंदर साहब। ये पहले से शादीशुदा थे.

तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या गम है जिसको छुपा रहे हो
अर्थ फिल्म का यह गीत मधुबाला पर एकदम फिट बैठता है. मधुबाला के दिल में छेद था वो इस गंभीर जानलेवा बीमारी का पता 1950 लग गया था. यह बात छुपाई गई थी. डॉक्टर ने कहा कि मधुबाला अब सिर्फ एक साथल ही जी पाएंगी लेकिन मधुबाला अपने हौसले के दम पर नौ साल तक इससे जुझती रहीं. इतना दर्द और अधूरे प्रेम संबंधों के बाद भी मधुबाला हमेशा हंसती खेलती नजर आती रहीं. वे अपने सारे दर्द को खुद ही पीकर मुस्कुराती रहीं. एक साक्षात्कार में देव आनंद का कहना था, ‘वो काफी हिम्मती थी. लोगो को ये पता लगना मुश्किल था कि वो बीमार है. वो अपने काम से प्यार करती थी और हमेशा हंसती रहती थी. फिर अचानक एक दिन वो कहीं खो गयी.


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