नक्सलियों के गढ़ और मांझियों के वर्चस्व वाले गया लोकसभा क्षेत्र में इस बार किस मांझी का परचम लहराएगा?

पटना के बाद बिहार का दूसरा सबसे बड़ा शहर, हिन्दू धर्म और साथ ही बौद्ध धर्म का पवित्र स्थान, दुनिया भर में विख्यात गया में 2019 में एक बार फिर रोचक चुनावी जंग की इबारत लिखी जायेगी. मांझियों का गढ़ गया लोक सभा सीट बिहार में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 6 लोक सभा सीटों में से एक है.

2007 में रिटायर्ड जस्टिस कुलदीप सिंह आयोग ने बिहार में छह सीटें रिज़र्व कीं: गया, हाजीपुर, सासाराम, गोपालगंज, समस्तीपुर और जमुई. इनमे तीन सीटें गया, हाजीपुर और सासाराम पहले से रिज़र्व सीट थे.

गया नक्सल आंदोलन का गढ़ रहा है
गया नक्सल आंदोलन का गढ़ रहा है. अतरी वजीरगंज, आमस, बाराचट्टी आदि ऐसे अनेक इलाके हैं जहाँ अर्ध सैनिक बलों और नक्सलियों के बीच आये दिन हिंसक झड़पें होती रहती हैं. मध्य बिहार के भोजपुर से शुरू होकर नक्सल संघर्ष की चिंगारी सोन नदी पार कर के गया में पहुँच गयी. दलित महिलाओं की इज़्ज़त, खेत मज़दूरों की मज़दूरों का उचित मुआवज़ा, भूमि का आसमान वितरण आदि जिन मुद्दों को लेकर नक्सल संघर्ष शुरू हुआ था, उसने जल्द ही खूनी जातीय संघर्ष का रूप ले लिया. भूमि के स्वामियों ने अलग अलग जातीय सेना का गठन किया. और पिछले कुछ दशक में यहाँ नरसंहार के दौर चले हैं. गया लोकसभा सीट पर वोटरों की कुल संख्या 1,329,192 है. इनमें से 705,874 पुरुष मतदाता हैं जबकि 623,318 महिला वोटर हैं.

गया संसदीय सीट के तहत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं
गया लोक सभा सीट के तहत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं- शेरघाटी, बाराचट्टी, बोधगया, गया टाउन, बेलागंज और वजीरगंज. इनमें से बाराचट्टी और बोधगया दोनों आरक्षित सीटें हैं. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 सीटें राजद, जबकि 1-1 सीट बीजेपी-जदयू,और कांग्रेस के खाते में गईं.

16वीं लोकसभा के लिए 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में गया सीट से बीजेपी के हरी मांझी जीते थे. हरी मांझी को 326230 वोट मिले थे. दूसरे नंबर पर आरजेडी के रामजी मांझी रहे जिन्हें 210726 वोट मिले. तीसरे नंबर पर जीतनराम मांझी रहे जो जेडीयू के टिकट पर चुनावी मैदान में थे. जीतनराम मांझी को 131828 वोट मिले थे. चौथे नंबर पर जेएमएम के अशोक कुमार रहे जिन्हें 36863 वोट मिले. बीजेपी के हरी मांझी ने 2009 में भी इस सीट से जीत का परचम लहराया था.

गया लोक सभा सीट का इतिहास:
1952 से 1967 तक गया लोक सभा सीट पर कांग्रेस का कब्ज़ा रहा. हालाँकि 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विग्नेश्वर मिसिर इस सीट से विजयी हुए थे. 1952 में सत्येंद्र नारायण सिन्हा से सबसे पहले इस सीट से जीत हासिल की. 1957 और 1962 में कांग्रेस के ब्रजेश्वर प्रसाद इस सीट से लोक सभा पहुंचे. 1967 में कांग्रेस के राम धनी दास विजयी हुए. फिर ये सीट अगले दो चुनाव के लिए कांग्रेस के हाथ से निकल गयी. 1971 और 1977 में ईश्वर चौधरी इस सीट से विजयी हुए. पहली बार जन संघ के टिकट पर और दूसरी बार जनता पार्टी के टिकट पर.

1980 में केंद्र में इंदिरा गाँधी की वापसी हुई. गया लोक सभा सीट फिर से कांग्रेस के हिस्से आयी. और लगातार दो बार 1980 और 1984 में राम स्वरुप राम कांग्रेसी सांसद के रूप में लोकसभा पहुंचे.
1989 में कांग्रेस के देश भर में ख़राब चुनावी प्रदर्शन के दौर में गया में भी कांग्रेस को नुकसान हुआ और फिर अगले लगातार तीन चुनाव में जनता दल के उम्मीदवार की जीत हुई. 1989 में ईश्वर चौधरी, 1991 में राजेश कुमार और 1996 में भगवती देवी. उम्मीदवार बदलते गए, हालाँकि दल वही रहा – जनता दल.

1998 में पहली बार केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाने का दावा किया, हालाँकि सफल नहीं हो सके. पर इसी साल गया लोक सभा सीट से भाजपा को सफलता मिली, जब कृष्ण कुमार चौधरी विजयी हुए. 1999 में भाजपा के रामजी मांझी जीते. 2004 में केंद्र में यूपीए सरकार आयी और गया लोकसभा सीट से राजद उम्मीदवार राजेश कुमार मांझी विजयी हुए. फिर उसके बाद लगातार दो बार से 2009 और 2014 में हरी मांझी जीत रहे हैं.
गया हम के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का क्षेत्र रहा है.2014 में वे लोक सभा चुनाव लड़ चुके हैं, पर तीसरे स्थान पर रहे,हालाँकि इमामगंज से विधान सभा चुनाव जीत चुके हैं.

लगातार दो बार 2009 और 2014 में हरी मांझी गया लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे हैं.

फिलहाल उम्मीद है कि जहाँ एक और हरी मांझी एनडीए के उम्मीदवार बने रहेंगे, वही दूसरी और राजद गया सीट को जीतन राम मांझी के लिए छोड़ देगा. ऐसे में राजद और मांझी का अपना वोट बैंक मिलकर हरी मांझी को कड़ी टक्कर देंगे.
कुल मिलाकर ये सीट फिर से किसी मांझी के पाले में जाएगा. पर हरी मांझी या जीतन राम मांझी कौन होंगे, एकदम स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता. क्योंकि ये मामला 50: 50 का है.

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