समाजवादियों से दूरी बनाकर रखने वाले, ब्राह्मणों के वर्चस्व वाले बक्सर लोकसभा सीट से इस बार कौन?

हालाँकि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पार्टी ज्वाइन करने के कुछ दिनों बाद सार्वजनिक तौर पर कहा था कि वे चुनावी राजनीति में हिस्सा नहीं लेंगे और पार्टी को मज़बूत करने पर अपनी ऊर्जा लगाएंगे. पर राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि बक्सर के मौजूदा सांसद अश्वनी चौबे का परफॉरमेंस ख़ास न होने के चलते बक्सर सीट जदयू के खाते में जा सकती है. ब्राह्मणों के वर्चस्व वाले बक्सर सीट को चुनावी समीकरण के हिसाब से प्रशांत किशोर के लिए सही भी माना जा रहा है, क्योंकि प्रशांत किशोर पांडेय इसी जाति से आते हैं.

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जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न बताये जाने की शर्त पर कहा, ” अगर उन्हें सिर्फ चुनाव प्रबंधन में मदद करना होता, तो पार्टी ज्वाइन करने की क्या जरुरत थी? उन्होंने दल की सदस्यता ली है, इसका मतलब साफ़ है कि जदयू उन्हें चुनाव में खड़ा कर सकता है.” प्रशांत किशोर के पिता रोहतास जिले के कोरान गांव के निवासी हैं, पर उनके पिता श्रीकांत पांडेय बक्सर शिफ्ट कर गए. बक्सर से ही प्रशांत किशोर ने स्कूली शिक्षा पूरी की.
अगर प्रशांत किशोर बक्सर से चुनावी मैदान में ताल ठोंकते हैं, तो अश्वनी चौबे भागलपुर जाना चाहेंगे. उस परिस्थिति में शहनबाज हुसैन को किशनगंज लोकसभा सीट से खड़ा किया जा सकता है. किशनगंज सीट से शहनबाज हुसैन एक बार चुनाव जीत चुके हैं.
जदयू के नेताओं की राय ये है कि अगर बक्सर से जदयू के टिकट पर ब्राह्मण उम्मीदवार खड़ा हो, और उसे भाजपा और लोजपा का वोटबैंक समर्थन दे दे, तो फिर जीत निश्चित हो जायेगी.

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हालाँकि जदयू विधायक ददन पहलवान ने बक्सर सीट से लोकसभा चुनाव जीतने का दावा करते हुए कहा कि वर्तमान समय में मेरे अलावा एनडीए का कोई भी नेता बक्सर से चुनाव नहीं जीत सकता है, बस इस सीट पर मेरी दावेदारी है और पार्टी से मेरी मांग है कि लोकसभा का टिकट मुझे ही दिया जाए. ना हो तो लोग सर्वे करा लें। पिछली बार मोदी लहर में भी एक लाख 98 हजार वोटर मेरे साथ थे और आज भी मेरे साथ हैं और इसलिए चुनाव मैं ही जीत सकता हूं. वहीं जेडीयू से प्रशांत किशोर के भी बक्सर से चुनाव लड़ने की चर्चा होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि टिकट वैसे लोगों को नहीं दिया जा सकता है जो इस सीट से चुनाव हार जाएं.

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अगर एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर प्रशांत किशोर मैदान में उतरते हैं, तो उनका मुकाबला राजद के जगदानंद सिंह से होना तय माना जा रहा है. राजद के दिग्गज नेता जगदानंद सिंह 2014 में अश्वनी चौबे से हार चुके हैं.

ददन पहलवान की बातें असत्य नहीं हैं. 2014 के लोक सभा चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार अश्वनी चौबे को 319012 वोट मिले. दूसरे स्थान पर रहने वाले राजद के जगदानंद सिंह को 186674 वोट मिले, वहीँ बसपा के टिकट पर लड़ रहे ददन पहलवान को 184788 वोट मिले. वहीँ जदयू के उम्मीदवार श्यामलाल सिंह कुशवाहा 117012 वोट के साथ चौथे स्थान पर रहे. ऐसे में प्रशांत किशोर का दावा निर्विवाद नहीं रहेगा. आने वाले दिनों में तय होगा कि जदयू इस सीट पर प्रशांत किशोर या ददन पहलवान को खड़ा करती है. ददन पहलवान का परफॉरमेंस इसलिए भी शानदार है, क्योंकि बिहार में बसपा का कोई बेस नहीं है. तो जो वोट ददन पहलवान के हिस्से आये, वे उनके खुद के हैं.

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महागठबंधन की बात करें तो राजद को कांग्रेस के दावे से भी दो चार होना पडेगा. क्योंकि बक्सर में ब्राह्मणो, दलितों का वोट कांग्रेस के परम्परागत वोट रहा है.

बक्सर लोक सभा सीट का इतिहास :

फिलहाल बक्सर लोकसभा क्षेत्र में छह विधान सभा सीट आते हैं, ब्रह्मपुर, बक्सर, डुमराव, राजपुर, दिनारा, और रामगढ़.

जदयू के हिस्से दिनारा, डुमराव और एक सुरक्षित सीट राजपुर कुल मिलाकर तीन सीट हैं, राजद के हिस्से एक -ब्रह्मपुर; भाजपा के हिस्से एक- रामगढ, और कांग्रेस के हिस्से एक- बक्सर सीट है.

अगर बक्सर लोक सभा सीट के इतिहास पर गौर फरमाएं तो पहले चुनाव में इस सीट को शाहाबाद उत्तर पश्चिमी के नाम से जाना जाता था. 1952 और 1957 में कांग्रेसी लहर में कमल सिंह इंडिपेंडेंट उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए. इसके बाद 1962,1967 और 1971 में लगातार तीन चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी हुए, पर 1977 में इंदिरा विरोधी लहर में यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गयी और भारतीय लोकदल के रामानंद तिवारी विजयी हुए. 1980 और 1984 में कांग्रेस के पक्ष में लहर का फायदा बक्सर में भी हुआ और कमलकांत तिवारी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे. 1989 और 1991 में बक्सर के वोटरों ने सीपीआई के उम्मीदवार तेज नारायण सिंह को मौका दिया. फिर 1996 में भाजपा ने पहली बार इस सीट से जीत हासिल की जब लालमुनि चौबे इस सीट पर विजयी हुए. फिर 1998, 1999, और 2004 में लालमुनि चौबे लगातार विजयी हुए. 2009 में जीत का क्रम टूटा राजद उम्मीदवार जगदानंद सिंह विजयी हुए. पर २०१४ में वोटरों ने एक बार भाजपा में भरोसा करके अश्वनी चौबे को अपना प्रतिनिधि बनाकर लोकसभा भेजा.

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इस प्रकार हम देखते हैं कि बक्सर लोक सभा सीट ने एक तो सवर्ण जातियों के उम्मीदवारों को अपना प्रतिनिधि चुना और दूसरे, 2009 को छोड़कर इस क्षेत्र में मतदाताओं ने समाजवादी दलों पर भरोसा नहीं जताया और अमूमन कांग्रेस और फिर भाजपा को अपना समर्थन दिया.

संभावना किसकी ज्यादा है?

2014 में इस सीट पर कुल वोटरों की संख्या 16 लाख 40 हजार 567 थी. 8 लाख 88 हजार 204 मतदाताओं ने अपने मतों का प्रयोग किया. इसमें पुरुषों की संख्या 4,93,930 और महिलाओं की संख्या 3,94,274 थी. बक्सर को सवर्ण बाहुल्य सीट कहा जाता है और ब्राह्मण वोटरों की अच्छी संख्या है. लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में लोगों ने अधिकांशत: किसी सवर्ण या ब्राह्मण उम्मीदवार को जिताया है और अश्विनी चौबे बाहरी होने के बावजूद इस सीट से सांसद बन पाए. इस चुनाव में बीजेपी-जेडीयू साथ-साथ हैं जिसकी वजह से राजद की परेशानी बढ़ गई है पर अश्वनी चौबे अपने संसदीय क्षेत्र में अलोकप्रिय साबित हुए. ऐसे में अश्वनी चौबे के कारनामों का खामियाजा कहीं जदयू उम्मीदवार को न भुगतना पड़ जाए. कुल मिलाकर पलड़ा एनडीए उम्मीदवार का ही भारी लग रहा है, पर एनडीए को अपने अंदरूनी झगडे निपटाने होंगे, ताकि भितरघात की संभावना को समाप्त किया जा सके. कुल मिलाकर रोचक भिड़ंत की उम्मीद है.

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