मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने से पहले बंगाल में तपन कुमार के नाम से प्रसिद्द थे महान गायक तलत महमूद

नवीन शर्मा 
ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि तलत महमूद ने कई फिल्मों में तपन कुमार के नाम से भी गीत गाए थे. ये उन दिनों की बात थी जब वो हिंदी सिनेमा में अपना सफर शुरू कर रहे थे.

बुआ ने गायकी में आगे बढ़ाया
तलत महमूद का जन्म लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के एक खानदानी मुस्लिम परिवार में 24 फ़रवरी, 1924 को हुआ था. उनके पिता का नाम मंजूर महमूद था. तीन बहन और दो भाइयों के बाद तलत महमूद छठी संतान थे. घर में संगीत और कला का सुसंस्कृत परिवेश इन्हें मिला. इनकी बुआ को तलत की आवाज़ की ‘लरजिश’पसंद थी. भतीजे तलत महमूद बुआ से प्रोत्साहन पाकर गायन के प्रति आकर्षित होने लगे. इसी रुझान के चलते ‘मोरिस संगीत विद्यालय’, वर्तमान में ‘भातखंडे संगीत विद्यालय’, में उन्होंने दाखिला लिया. प्रथम गायकी शुरुआत में तलत महमूद ने लखनऊ आकाशवाणी से गाना शुरू किया.

सोलह साल की उम्र में ही आकाशवाणी के लिए पहला गाना रिकॉर्ड कराया
उन्होंने सोलह साल की उम्र में ही पहली बार आकाशवाणी के लिए अपना पहला गाना रिकॉर्ड करवाया था. इस गाने को लखनऊ शहर में काफ़ी प्रसिद्धि मिली. इसके बाद प्रसिद्ध संगीत कम्पनी एचएमवी की एक टीम लखनऊ आई और इस गाने के साथ-साथ तीन और गाने तलत से गवाए गए. इस सफलता से तलत की किस्मत चमक गई। यह वह दौर था, जब सुरीले गायन और आकर्षक व्यक्तित्व वाले युवा हीरो बनने के ख्वाब सँजोया करते थे.

बोम्बे वाया कलकत्ता
तलत महमूद गायक और अभिनेता बनने की चाहत लिए 1944 में कोलकाता चले गए. उन्होंने शुरुआत में तपन कुमार के नाम से गाने गाए, जिनमें कई बंगाली गाने भी थे. वास्तव में कैमरे के सामने आते ही तलत महमूद तनाव में आ जाते थे, जबकि गायन में सहज महसूस करते थे. कोलकाता में बनी फ़िल्म ‘स्वयंसिद्धा’ (1945) में पहली बार उन्होंने पार्श्वगायन किया.

हिंदी फिल्मों में अनिल विश्वास ने दिया ब्रेक

1949 में वो अपनी तक़दीर आज़माने बंबई पहुंचे. तलत की प्रसिद्धि उनके वहाँ पहुंचने से पहले ही वहाँ पहुंच चुकी थी. अनिल बिस्वास ने उन्हें पहला ब्रेक दिया. उन्होंने दिलीप कुमार की फ़िल्म ‘आरज़ू’ के लिए ‘ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल, जहाँ कोई न हो’ गाया.

आवाज की लरजिश की वजह से कई बार रिजेक्ट हुए

अपने करियर के शुरुआती दौर में तलत को उनकी आवाज़ में कंपन की वजह से कई बार रिजेक्ट किया गया. ये अलग बात है कि यही कंपन और यही लरज़िश आगे चल कर उनके गाने की यूएसपी बन गई. ये ठीक वैसा ही मामला था जिसमें अमिताभ बच्चन को उनकी भारी आवाज़ की वजह से आल इंडिया रेडियो में रिजेक्शन मिली थी.
मानिक प्रेमचंद बताते हैं, ‘वो जिस तरह से गाते थे, उसी तरह से बोलते भी थे. उनको सुनने के लिए उनके नज़दीक आना पड़ता था. उनका अपना स्वभाव उनके गानों में दिखाई पड़ रहा था. वो बहुत अदबी आदमी थे. अगर आप तलत को सुनने का शौक रखते हैं, तो आप पाएंगे कि उनके गानों का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है, उसकी काव्यात्मकता.’

स्टाइलिश कपड़ों के शौकीन
तलत आइसक्रीम के शौकीन थे. उनको स्टाइलिश कपड़े पहनने का शौक था. हमेशा सूटबूट में रहते थे. उनको दुनिया घूमने का भी शौक था. पचास के दशक में ही उन्होंने वर्ल्ड टूर का चलन शुरू किया था. वो दूसरे भारतीय गायक थे जिन्होंने लंदन के ‘रॉयल अल्बर्ट हॉल’ में गाया था. बाद में उन्होंने न्यूयार्क के ‘मेडिसन स्क्वेयर गार्डेन’ में भी गाया.।

शायरी की अच्छी समझ
तलत को उर्दू शायरी की बहुत समझ थी, इसलिए वो उन गीतों को गाने के लिए चुनते थे जो श्रोताओं के दिल के बहुत नज़दीक थे. इनकी आवाज़ में मोहम्मद रफ़ी जैसी रेंज नहीं थी. उनकी आवाज़ में वो बैरी टोन भी नहीं था, जो हेमंत कुमार की आवाज़ में था. लेकिन इसके बावजूद एक सीमित दायरे में गाते हुए भी वो संगीत प्रेमियों के दिल में घर करते जा रहे थे.

किशोर बोले, ‘ चलो हम भाग चलें ‘

तलत महमूद की मन्ना डे से बहुत नज़दीकी दोस्ती थी. मन्ना डे अपनी आत्मकथा ‘मेमोरीज़ कम अलाइव’ में लिखते हैं, ‘एक बार मदन मोहन ने बंबई आई मलिका-ए-ग़ज़ल बेगम अख़्तर के सम्मान में रात्रि भोज दिया जिसमें बंबई की हर बड़ी संगीत हस्ती को बुलाया गया. जैसी कि उम्मीद थी भोज से पहले संगीत की एक महफ़िल हुई और सबसे पहले तलत महमूद से माइक के सामने आने के लिए कहा गया. जैसे ही उनकी पहली ग़ज़ल ख़त्म हुई, इतनी तालियाँ बजीं कि मेरे और मोहम्मद रफ़ी के बीचोबीच बैठे हुए किशोर कुमार ने हम दोनों से फुसफुसा कर कहा, चलिए हम दोनों चुपके से भाग चलें. तलत के फैलाए जादू के बाद अब हम लोगों को और कौन सुनेगा?’

छी जगजीत भी कोई ग़ज़ल गाते हैं गजल तो तलत महमूद गाते हैं

तलत महमूद की गायकी की सबसे अनूठी तारीफ तो गजल गायिका चित्रा सिंह ने की थी. चित्रा ने जब पहली बार जगजीत सिंह की गजल सुनी तो उन्होंने बेलाग ढंग से कहा छी ये भी कोई ग़ज़ल है ग़ज़ल तो तलत महमूद गाते हैं.
जगजीत सिंह और मेहदी हसन दोनों ने स्वीकार किया है कि उनके गायन पर तलत महमूद का बहुत बड़ा असर रहा है. मेहदी को तो पहली प्रसिद्धि तब मिली थी जब उन्होंने कराची की एक महफ़िल में तलत की एक ग़ज़ल ‘हुस्न वालों को न ये दिल दो ये मिटा देते हैं’. इस गायन के लिए मेहदी हसन को 17,000 रुपए मिले थे.

महज 40 साल की उम्र में करियर खत्म

इस सब के बावजूद मात्र 40 साल की उम्र में तलत महमूद के करियर का अंत शुरू हो गया था. आमतौर से गायक 40 साल की उम्र में अपने करियर की ‘पीक’ पर पहुंचते हैं, लेकिन इस उम्र तक आते-आते तलत की मांग कम हो चुकी थी.
मानिक प्रेमचंद ने तलत महमूद की जीवनी, ‘द वेल्वेट वॉयस’ के नाम से लिखी है। मानिक कहते हैं, ‘ये ‘अर्ली बर्न आउट’ का केस था. चालीस साल की उम्र में कोई इस तरह अपनी दुकान नहीं बंद करता. अपने करियर की उफान के दिनों में तलत अक्सर तीन-चार महीनों के लिए वर्ल्ड टूर पर चले जाते थे. इसका भी उनके करियर पर बुरा असर पड़ा. दूसरा भारतीय फ़िल्मों में संगीत का स्वरूप बदल रहा था. शोर शराबे वाला संगीत हावी होने लगा था. गानों में शब्दों का महत्व कम होता जा रहा था और तलत महमूद इस पूरे माहौल में ख़ुद को ‘मिसफ़िट’ पा रहे थे.
तलत को ये बात भी काफ़ी बुरी लगती थी कि कई बार इनसे गवाने के बाद वही गीत संगीतकार दूसरे गायकों से गवा लेते थे. इस बात से वो अंदर ही अंदर घुटते जा रहे थे.’ ‘जहाँआरा’ उनके करियर की आखिरी बड़ी फ़िल्म थी. बेहतरीन गानों के बावजूद ये फ़िल्म बुरी तरह से फ़्लॉप हुई थी और तीन दिनों के भीतर ये थियटरों से उतर गई थी. इस फ़िल्म ने कई लोगों के दिल तोड़े थे, जिसमें तलत का दिल भी शामिल था. सहर ज़माँ बताती हैं, ‘तलत को बहुत अच्छी तरह से पता था कि उनकी आवाज़ कुछ तरह के गानों के लिए ही उपयुक्त है. उनको पता था कि शोर वाले संगीत में उनकी आवाज़ खो कर रह जाएगी. इसका उन्हें अंदाज़ा हो गया था. ‘

अगर आप तलत महमूद और मेहदी हसन के करियर पर नज़र दौड़ाएं तो आप पाएंगे कि मेहदी हसन तलत महमूद से मात्र तीन साल छोटे थे. चालीस साल की उम्र में जहाँ तलत अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर थे, वहीं 1964 में 37 साल की उम्र में ‘गुलों में रंग भरे’ गाकर मेंहदी हसन अपने करियर का आगाज़ कर रहे थे.

‘ मेरी याद में तुम न आंसू बहाना ‘
9 मई, 1998 को पार्किंसन बीमारी से जूझते हुए तलत महमूद ने इस दुनिया को अलविदा कहा. अपने जीवन के आख़िरी दिनों में वो किसी से बात तक करने की स्थिति में नहीं थे. मानिक प्रेमचंद बताते हैं, ‘मेरे जीवन की सबसे दुखदायी याद है तलत साहब से उनके आख़िरी दिनों में मिलना. पूरी दुनिया को अपनी आवाज़ से मदहोश कर देने वाला शक्स एक-एक शब्द बोलने के लिए जद्दोजहद कर रहा था. मेरा कलेजा बैठा जाता था कि काश उनकी तकलीफ़ मुझे लग जाती !’ रह रह कर तलत महमूद का गाया एक गीत याद आता था, मेरी याद में तुम न आँसू बहाना, न जी को जलाना, मुझे भूल जाना.


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