आदिम जनजाति सबर के बीच काम करते झारखण्ड के जुझारू सोशल एक्टिविस्ट अरविन्द तिवारी- बरनाली चक्रवर्ती

सुबह सुबह रांची से जमशेदपुर के लिए निकला. मुझे जमशेदपुर में काम कर रही संस्था “युवा” की सेक्रेटरी मुखड सोशल एक्टिविस्ट बरनाली चक्रवर्ती से मिलना था. झारखण्ड स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस अच्छी थी. बस तेजी से रांची को छोड़कर जमशेदपुर की ओर निकल पड़ी. सुबह सुबह मौसम खुश गबार था. और मै बस में पीछे बैठा पिछले दिन बरनाली के फेसबुक पेज के बारे में सोच रहा था, जब मै होमवर्क करने के दौरान खंगाल रहा था. उसमे एक ख़ास बात ने मेरा ध्यान खींचा था, कि युवा झारखण्ड में आदिम जनजाति सबर के बीच काम कर रहा है. बस तेजी से चली जा रही थी. ड्राईवर ने गाने चला रखे थे तो ऐसे में मन बरबस यादों की अँधेरी उजाली गलियों में चला जा रहा था. सड़क के एक ओर झारखण्ड की पहाड़ियां बाहें फैलाएं हुए थीं. उसकी चोटियों पर सूर्य की सुनहरी किरणें बिखड़ने लगी थीं. धुप अच्छी लग रही थी. तो मैंने परदे एक तरफ हटा दिए. मद्धिम धुप अब मेरे चेहरे पर पड़ने लगी थी. पर मेरा ध्यान सड़क के दोनों किनारों पर दूर दूर तक ऊँचे नीचे छोटी छोटी जोत वाले खेतों की ओर भी जा रहे थे. एकदम खाली, किसी फसल का नामोनिशान नहीं. मुझे पटना से आते समय जनशताब्दी में एक सीनियर सिटीजन की बात याद आ गयी: “पानी कहाँ है? अधिकांश तो साल में एक ही फसल ले पाते हैं.”

बस तीन घंटे में जमशेदपुर शहर में प्रवेश कर गयी. रांची से जमशेदपुर 120 किमी के आसपास है. शहर में घुसने समय स्वर्णरेखा नदी पुल के नीचे बहती नज़र आई. बिहार के मैदानी इलाकों की तरह झारखण्ड की पहाड़ी नदियाँ विशाल नहीं हैं, छोटी हैं, पानी का स्तर सतही होता है, नदी की तलहट्टी दिखाई पड़ती है. पानी काला हो चला था. सोच में पड़ गया, हम किस तरह बिना सोचे अपनी नदियों का विनाश कर रहे हैं, जिस पर जीवन निर्भर है, उसी को मारने पर तुले हैं, फिर पानी को बोतल में बंद करते हैं, बाजार के हवाले कर देते हैं, सोचते नहीं हैं कि अगर जल जैसी मूलभूत चीज बाज़ार के हवाले हो जाएगी, तो जनसँख्या का विशाल तबका आने वाले दिनों में किस तरह जियेगा? हम जाने अनजाने भविष्य में एक भयंकर आक्रोश के बीज बो रहे हैं.

विस्टुपुर में अरविन्द तिवारी मिले. बरनाली चक्रवर्ती और अरविन्द तिवारी दोनों मेरे फेसबुक फ्रेंड रहे हैं. स्कूटी से आये हुए थे. फिर हम “युवा” के ऑफिस निकल पड़े. जमशेदपुर में आप जायेंगे, तो शहर के चप्पे चप्पे पर टाटा की छाप मिलेगी. अरविन्द ने बताया कि अमूमन फैक्ट्रीज शहर के बाहर होते हैं, पर जमशेदपुर में टिस्को सेंटर में है, और शहर उसके चारो ओर पसरा है. रांची की तुलना में जमशेदपुर छोटा शहर है, पर टाटा के मैनेजमेंट ने शहर के एक बड़े हिस्से को बहुत ही व्यवस्थित लुक दे दिया है. टिस्को की बाउंड्री से सटे सड़क से हम चल रहे थे. कुछ देर में हम “युवा” के ऑफिस पहुंचे. सलीके से, व्यवस्थित.

कुछ देर में बरनाली भी पहुंची. फिर बातों का सिलसिला चल निकला. बातों बातों में पता चला कि अरविन्द तिवारी और बरनाली चक्रवर्ती पति पत्नी हैं. मेरे लिए ये सुखद आश्चर्य से कम नहीं था. इतने दिनों से दोनों मेरे फेसबुक फ्रेंड थे, पर मुझे ये जानकारी नहीं थी. अनायास ही ख्याल आया कि दुसरे लोगों को भी इसी तरह से आश्चर्य हुआ करता था जब वे सागरिका और मेरे बारे में जानते थे, दोनों के फ्रेंड लिस्ट में कॉमन फ्रेंड होते हुए भी.

चाय के साथ बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा: 

फिर चाय के साथ बातचीत का सिलसिला निकल पड़ा. बरनाली ने बताया कि झारखण्ड तो एक समय बृहत् बंगाल का हिस्सा रहा है. स्वतंत्र अस्तित्व में आने से पहले बिहार का हिस्सा रहा. लम्बे समय से हवा पानी बदलने के लिए बंगाली लोग झारखंड में आते रहे हैं. हजारीबाग, मधुपुर, पलामू, घाटशिला जैसी जगहों में अच्छी खासी संख्या में बंगाली बसे हुए हैं. घाटशिला में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का घर भी है. रांची में टैगोर हिल का रखरखाव ठीक ढंग से हो रहा है, घाटशीला जैसी जगहों पर भी झारखंड सरकार को ध्यान देना चाहिए. टूरिज्म के लिहाज से भी बेहतर हो सकता है.

आगे उन्होंने बताया कि झारखण्ड में कई तरह की बंगाली भाषा बोली जाती है. जैसे पुरुलिया, मानभूम की तरफ जो बँगला बोली जाती है, उसे राड़ बँगला कहते हैं. कुछ आदिवासी समुदाय जैसे भूमिज भी बँगला बोलते हैं, हालाँकि आजकल कुछ लोग इसे “अजगर” कहने लगे हैं. अजगर? मै समझ नहीं पाया. बरनाली ने स्पष्ट किया, अजगर की तरफ जो उनकी अपनी भाषा को दबोच रहा है. अपने पिता तपन चक्रवर्ती को याद करते हुए बरनाली ने बताया, उनके पिता रेलवे में नौकरी करते थे. आठवी पास थे, पर अपनी मेहनत और लगन के बल पर pathway Inspector बनकर रिटायर हुए. कम्युनिस्ट विचारधारा के थे. इमरजेंसी के दौरान रेलवे स्ट्राइक में भाग लेने के चलते नौकरी से निकाले गये थे, उनके खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी किया गया था. इमरजेंसी ख़त्म होने के बाद नौकरी में फिर से बहाली हुई. बरनाली के दादा  गौर चन्द्र चक्रवर्ती हजारीबाग में रहते थे. उनके एक उपन्यास पर “मधुबन” फिल्म भी बनी है.

बरनाली की शुरूआती पढ़ाई नोआ मुंडी में हुई. फिर आठवी से जमशेदपुर में. विमेंस कॉलेज से इकोनॉमिक्स में होनर्स किया फिर LLB भी.

अरविन्द तिवारी और बरनाली चक्रवर्ती कैसे मिले? 

अरविन्द और बरनाली कैसे मिले पूछने पर अरविन्द ने अपने बैकग्राउंड के बारे में बताया कि  वे मूलतः औरंगाबाद से हैं. उनके पिता जमशेदपुर में रेलवे गार्ड थे. तो यही के रेलवे स्कूल में पढ़ाई हुई. 1994 में वे लालू यादव के समय BPSC से हुई परीक्षा पास करके शिक्षक बने. फिलहाल वे जमशेदपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर जंगल में टंगराईन के स्कूल में हेडमास्टर हैं. बरनाली एनजीओ ” युवा” चलाती हैं. अरविन्द सहयोग करते हैं. युवा की शुरुआत एक स्टडी ग्रुप के रूप में हुई थी. सारे युवा मिलकर परीक्षा की तयारी किया करते थे. कुछ विद्यार्थी सरकारी नौकरी में चले गये, बरनाली ने महसूस किया कि नौकरी के चले जाने के बाद अधिकांश लोगों ने अपने आप को सामाजिक सरोकार से काट लिया और अपने करियर में व्यस्त हो गये. बरनाली ने तय किया कि वे सोशल एक्टिविटी में अपना जीवन देंगी. उन दिनों “युवा” के लोग ब्लड डोनेशन, हेल्थ कैंप आदि लगाया करते थे. अरविन्द नौकरी में चले गये थे, तो वे युवा की गतिविधियों को फंडिंग किया करते थे. 1997 में युवा को ट्रस्ट के रूप में रजिस्टर कराया गया. शुरूआती दिनों की दिक्कतों के बारे में बात करते हुए दोनों कहते हैं कि हमें तकनीकी चीजों की बिलकुल जानकारी नहीं थी, तो ऐसे में हम कुछ दिग्गजों के पास गये, पर उनसे हमें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला. पर हमने हौसला नहीं छोड़ा और आगे बढ़ते रहे.

2002 में अरविन्द और बरनाली ने विवाह करने का फैसला किया. बरनाली बताती हैं, शादी की बात करने के लिए अरविन्द पापा के पास गये, पापा छत पर कुर्सी पर बैठे थे, अरविन्द ने बिना किसी बैकग्राउंड के कह दिया, मै बरनाली से विवाह करना चाहता हूँ, आपको क्या कहना है? फिर बिना जवाब की प्रतीक्षा किये वे सीढियों से उतर कर घर से चले गये. मुझसे भी बात नहीं की कि क्या हुआ, नहीं हुआ. पापा एकदम सन्न. पर परिवार में विरोध नहीं हुआ. बरनाली अपनी सास की काफी तारीफ़ करती हैं, हालाँकि मेरी सास पढ़ी लिखी नहीं हैं, पर उन्होंने मुझे हर कदम पर सपोर्ट किया. बाकी लोगों से वे भले हिंदी में बोलती थीं, पर मुझसे मगही में बात करती थीं.

बरनाली तो हिंदी और मगही बोल लेती हैं, क्या अरविन्द बँगला सीख पाए? पूछने पर अरविन्द हलके हलके मुस्कुराने लगते हैं. अरविन्द सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी हैं, कम बोल कर काम चलाने वाले, बरनाली तेज तर्रार महिला हैं. खुलकर बोलती हैं. किसी से दबती नहीं हैं. अरविन्द भोजन के शौक़ीन हैं और यह उनकी देहयष्टि में भी झलकता है. वे बताते हैं कि अगर वे 50 किलोमीटर जाते हैं और रास्ते में किसी होटल, ढाबे की चाय, चिकेन या कुछ और प्रसिद्द है, तो फिर वे रुक कर जरुर उसका स्वाद लेते हैं, भले पेट उनका भरा हो. अरविन्द जमशेदपुर के बेहतरीन होटल्स से लेकर छोटी दुकानों की स्पेशलिटी पर बात कर सकते हैं. ये उनके भोजन प्रेम को दर्शाता है.

अरविन्द ने बताया, वे मेरे हर पोस्ट को पढ़ते हैं. मुझे जानकर अच्छा लगा. दोनों की शादी को 17 साल हो गये. दोनों साथ मिलकर अपनी पारिवारिक और सामजिक जिम्मेवारियों को निभा रहे हैं.

अरविन्द तिवारी एक बेहतरीन शिक्षक हैं: 

अरविन्द फिलहाल टंगराईन स्कूल में हेड मास्टर हैं. वे रोज मोटरसाइकिल से जमशेदपुर से टंगराईन जाते हैं. वे बताते हैं कि जब वे टंग राईन गये, तो उन्होंने सबसे पहले स्कूल का पोचारा करवा कर साफ़ सुथरा लुक दिया. वे बताते हैं कि उन्होंने स्कूल का वेबसाइट भी बनाया है, tangrain.in. पहला सरकारी स्कूल जिसका अपना वेबसाइट है.

उन्होंने अपने विभिन्न अनुभवों को शेयर करते हुए बताया कि एक बार उन्होंने बच्चों से कहा कि अगर वे 20 तक पहाडा याद कर लेंगे, तो उन्हें वे बाहुबली फिल्म दिखाएँगे. बच्चों ने याद कर लिया. फिर कुल 48 बच्चों को वे जमशेदपुर लेकर आये और उन्हें फिल्म दिखाई.

इसके अलावा, उन्होंने एक अनुभव साझा किया कि उन्होंने लड़कियों से कहा कि अगर वे कवितायेँ याद कर के सुनाएंगी तो उन्हें वे padman फिल्म दिखाएँगे. उन्होंने एक बार फिर अपना वायदा निभाया. अक्सरहां इन कामों में अरविन्द अपने जेब से खर्च करते रहते हैं.

उन्होंने स्कूल में स्काउट्स की शाखा भी खोली. उनके सम्पर्क में जमशेदपुर के एक सोशल एक्टिविस्ट थे. उनका अपना स्कूल चलता है. उन्होंने अरविन्द के स्कूल के लिए 10 कंप्यूटर दिया और साथ ही कुल 231 बच्चों को स्वेटर और जूते भी. स्कूल में कंप्यूटर तो आ गया, पर बिजली नहीं थी. बिजली के लिए अरविन्द को जिला प्रशासन, MLA, MP हर जगह दस्तक देनी पड़ी. अंत में काफी भागदौड़ के बाद पुरे एक साल के बाद स्कूल में बिजली आई और फिर कंप्यूटर के कीबोर्ड पर बच्चों की उँगलियाँ थिरकने लगीं. सुदूर जंगल में आदिवासी बच्चों के लिए ये बिलकुल नया अनुभव था. इंडिया के लिए ये बड़ी बात नहीं हो सकती है, पर गावों में जहाँ भारत बसता है, और जो हर कदम असुविधाओं से लड़ता उलझता रहता है, अरविन्द के काम प्रशंसनीय हैं और साथ ही पालिसी मेकर्स के आँख खोलने वाले भी.

अरविन्द ने अपने स्कूल के बच्चो को जिला स्तर पर विज्ञानं प्रदर्शनी में हिस्सा लेने के लिए भी प्रेरित किया.उनकी प्रेरणा से दो बच्चे डिस्ट्रिक्ट लेवल कम्पटीशन में हिस्सा लेने आये. उन्होंने हयवा मशीन का मॉडल बनाया था.

अरविन्द ने अपने स्कूल में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का स्ट्रक्चर भी लगाया है. बच्चों के लिए पुस्तकालय स्थापित किया जिसमे नंदन, चम्पक आदि कहानियों की किताबें रहती हैं. उन्होंने अपने स्कूल में कहानी मेला का आयोजन किया और इसमें जमशेदपुर के कुछ नामी साहित्यकारों को आमंत्रित किया. सी भास्कर राव, जय नंदन, विजय शर्मा आदि. इन साहित्यकारों ने बच्चों को कहानियाँ सुनायीं और बच्चों ने भी कहानियां गढ़कर सुनायीं.

अरविन्द कहते हैं कि स्कूल के बच्चे अक्सरहां ट्रेन को अपने इलाके से गुजरते देखते थे, पर वे कभी ट्रेन पर चढ़े नहीं थे, एक बार इस जिज्ञासा को शांत करने के लिए कुल 150 बच्चों को ट्रेन पर बिठाकर हल्दी पोखर से बादाम पहाड़ और फिर वापस लाये. बच्चों के लिए ये यादगार अनुभव था. सचमुच !! मै सहमत हुए बगैर नहीं रह सका.

बरनाली चक्रवर्ती की संस्था “युवा” आज 21 साल पुरानी हो चली है: 

आज बरनाली की संस्था “युवा” 21 साल पुरानी हो चली है. एक लंबा सफ़र तय किया है, जो संघर्ष से भी उतना ही भरा रहा, जितना सबक से, उत्साह से, जोश से. बरनाली बताती हैं, शुरूआती दिनों में हम रोज अखबार को देखा करते थे, जहाँ कहीं प्रोग्राम हुआ करता था, हमलोग बिन बुलाये मेहमान की तरह चले जाते थे, कुछ सीखने को तो मिलेगा. सबसे पहले हमलोगों को लखनऊ में शह्भागी शिक्षण संस्थान में ट्रेनिंग लेने का मौक़ा मिला. इस तरह की ट्रेनिंग से हमें बहुत फायदा हुआ, हमें इस सेक्टर को जानने, समझने का मौक़ा मिला.

फिर 2005 में पहला ब्रेक थ्रू मिला जब संस्था को हजारीबाग स्थित “नवभारत जागृति केंद्र” ने 19 लाख का प्रोजेक्ट दिया था. ये ब्रिज कोर्स चलाने के लिए था, जो बच्चे स्कूल से ड्राप आउट हो गये हैं, उन्हें फिर से स्कूल से जोड़ने के लिए. अपने अनुभव को याद करते हुए बरनाली कहती हैं, प्रोजेक्ट के ख़त्म होने तलक हम पुरे 19 लाख रूपये खर्च नहीं कर पाए. बल्कि हमने 2.5 लाख रूपये फंडिंग संस्था को लौटा दिये. फिल्ड में काम करने के दौरान हमने और काम भी करने शुरू किये. जैसे महिलाओं का SHG ग्रुप बनाना शुरू कर दिया, उन्हें नाबार्ड से जोड़ा. खेती बारी के काम में भी घुसे.

खेती बारी का एक्सपीरियंस हमें झारखण्ड सरकार से अगला प्रोजेक्ट लेने में मददगार साबित हुआ.

आदिम जनजाति सबर के बीच संस्था पिछले छह साल से काम कर रही है.

आदिम जनजाति सबर के बीच संस्था पिछले छह साल से काम कर रही है. इसके लिए हैदराबाद स्थित संस्था CWS “युवा” को सपोर्ट कर रही है. सबर जनजाति के बारे में बताते हुए बरनाली कहती हैं, ये अपनी जीविका के लिए जंगल पर निर्भर रहते हैं. जंगल से केंदु पत्ता, चिरौंजी, इमली, महुआ, आंवला, नीम फल, बेहड़ा ( त्रिफला का एक फल), अर्जुन पेड़ की छाल, लकड़ी, साल के पत्ते, बीज आदि एकत्र करते हैं. पर इन्हें इन उत्पादों के लिए उचित पैसे नहीं मिल पाते. जंगल से बाहर निकलते ही इन्हें दलाल धर लेते हैं और औने पौने दाम में इनके सामान को खरीद कर बाज़ार में ऊँचे दाम में बेच डालते हैं. फिर अपने पैसे को आधे शराब में, आधे भोजन में खर्च करके खाली हाथ हो जाते हैं. इन्हें रोज कमाना रोज खाना है.

जब हमलोग पहली बार इनके बीच काम करने गये, तो साथ में नाई को लेकर गये थे. शरीर से बहुत दुर्गन्ध आ रही थी, बालों में लीख नहीं, बल्कि खटमल थे. नाई भाग गया. हमलोगों ने इन्हें शैम्पू, साबुन से मल मलकर नह्लवाया. शिक्षा की बात बाद में होगी, पहले तो साफ़ सफाई हो जाए. पूछने पर कि अंतिम बार कब नहायें थे, उन्होंने बताया कि पिछली बारिश् में. उनके पिछले स्नान को 6 -7 महीने हो गये थे. इनके बारे में बताते हुए बरनाली कहती हैं, पहले इन्हें criminal ट्राइब में गिना जाता था, अब इस लिस्ट से इनको सरकार ने हटाया है. इनके पास अपने खेत नहीं हैं, ये खेती मजदूरी का काम करते हैं. इनकी टूटी फूटी झोपड़ियों में बकरियां रहती हैं, खुद झोपडी के बाहर मचान बनाकर रहते हैं. हमलोगों ने पता किया कि सरकार के कुल 234 स्कीम आदिम जनजातियों के कल्याण के नाम पर चल रहे हैं, पर इन तक इन सरकारी योजनाओं के लाभ अभी तक नहीं पहुंचे हैं.

इलाके में CRPF कैंप है. CRPF नक्सलियों के खिलाफ रह रहकर अभियान चलाती रहती है. क्या नक्सलियों से कोई समस्या हुई कभी? बरनाली इनकार करती हैं, शुरू शुरू में वे दूर से वाच किया करते थे, पर उन्होंने कभी परेशान नहीं किया. परेशानी तो हमें दलालों से हुई. स्थानीय नेताओं से हुई. उन्होंने प्रचार करना शुरू कर दिया, बरनाली नक्सली है, रात में मीटिंग करती है, चुनाव लड़ना चाहती है. फलां, फलां.

सबर जनजाति के बारे में बताते हुए बरनाली आगे कहती हैं, इनका शोषण खुद आदिवासी लोग भी करते हैं. अभी भी सभ्यता के प्रकाश से ये लोग दशकों पीछे हैं. इनके बीच कुछ साल नहीं, दशकों तक काम करने की जरुरत है. शिक्षा तो इनकी प्रायोरिटी में बहुत नीचे है, पहले तो इनके व्यवहार में परिवर्तन हो, ये जरुरी है. साफ़ सुथरे रहें, स्वास्थ्य बेहतर रहे, पौष्टिक भोजन करना सीखें. माओं को, बच्चियों को जानकारी होकि आप स्थानीय तौर पर उपलब्ध कद्दू खाईये, पपीता खाईये, सहजन खाइए. एक्सोटिक फल के बारे में क्यों सोचें, पर ये जानकारी होनी भी जरुरी है.

इनके एजुकेशन में एक कल्चर क्लैश भी है, आदिम जनजातियों के बच्चों को हम जो शिक्षा देते हैं वो उनके संस्कृति से मैच नहीं करती है. इससे भी दिक्कते पैदा होती हैं. ड्राप आउट होता है. बरनाली की राय है कि सरकार, गैर सरकारी संस्थाओं को बेहद इमानदारी से आदिम जनजातियों के बारे में सोचने की जरुरत है, तभी सच्चे अर्थों में इनका कल्याण हो सकता है.

लम्बी बात चीत में कैसे तीन घंटे बीत गये, पता ही नहीं चला. अगली बार उनके फिल्ड एरिया में जाने का वायदा करके हम सब लंच के लिए निकले. फिर लंच के बाद मैं रांची के लिए निकल पडा. देर शाम मै रांची लौट आया.


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