One Hundred Years of Solitude: गैब्रियल गार्सिया मार्केज के अनूठे शिल्प की जादूगरी

नवीन शर्मा
गाब्रिएल गार्सीया मार्केज का चर्चित उपन्यास Hundred Years of Solitude (एकांत के सौ वर्ष) कई मामलों में अन्य उपन्यासों से काफी हद तक अलग नजर आता है. इस उपन्यास की सबसे प्रमुख विशेषता इसका शिल्प और भाषा शैली है.  आज तक मैंने जितने भी उपन्यास पढ़ें हैं उनमें से किसी में भी शिल्प का ऐसा चमत्कार नहीं दिखा है. मार्केज किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थिति और परिवेश का वर्णन इतने अलंकृत ढंग से प्रतीकों व बिंबों की भरमार के साथ करते हैं कि आपके सामने फिल्मों के दृश्य के समान चीजें उभर कर सामने आने लगती हैं. एक से बढ़ कर एक उपमा, तुलना और स्थान व वस्तुओं का विस्तार से वर्णन आपको अचंभित कर देता है. इतने ज्यादा विस्तार और अलंकृत भाषा की वजह से इसे पढऩे में मेहनत करनी पड़ती है. अगर इस उपन्यास से आप इस अलंकरण को हटा दे तो 375 पन्नों का यह उपन्यास सौ से भी कम पृष्ठों में भी समा सकता है. इसी उपन्यास की शैली व शिल्प से बहुत हद तक प्रभावित अरूंधति राय का गाड आफ स्माल थिंग्स लगता है.


मार्केज इसमें अपने खानदानी इतिहास को आधार बनाकर इतिहास और कल्पना का एक अनोखा तानाबाना बुनते हैं. इसमें वे ‘माकोन्दो नाम के एक छोटे से गांव को अपना कथा का आधार बनाते हैं. ‘माकोन्दो की स्थापना मूलरूप से सबसे पहले कभी खोसे आर्कादियो बुएनदीया ने अपने 21 सहयोगियों के साथ की थी. यह एक आत्मनिर्भर और सुखी लोगों का गांव बन जाता है. जब यह गांव धीरे-धीरे बाहरी दुनिया के संपर्क में आता है, बंजारों के दल बाहरी दुनिया के आविष्कारों से माकोंदो वासियों को परिचित कराते हैं. वे चुंबक, आइना, मैग्नीफाइंग ग्लास जैसे नए नए उपकरण लाकर ग्रामीणों को हैरत में डालते हैं. इनमें से एक मिलकियादेस भी है जो काफी विद्वान है. उसकी बुएनदीया से मित्रता हो जाती है. वह अपने संस्कृत भाषा लिखे चर्मपत्रों को भी बुएदिनिया को देता है. इस परिवार के कई लोग इन गुढ़ श्लोकों को पढऩे व समझने में अपने कई कीमती वर्ष लगाते हैं.

औपनिवेशिक शासन प्रणाली वर्चस्व जमाना चाहती है. इसे लेकर लड़ाई शुरू हो जाती है जो ‘गृह युद्ध के रूप में बीस वर्षों तक चलती है. एक बड़े ‘गृह युद्ध के बाद वहाँ वर्चश्ववादी औपनिवेशिक शासन प्रणाली की ‘नगर पालिका स्थापित होती है. इस औपनिवेशिक वर्चस्व के स्थापित होने के बाद माकोंदो में बाहरी दुनिया की तकनीकों का प्रवेश तेजी से शुरू होता है. इसमें ट्रेन, यंत्र, बिजली, सिनेमा, ग्रामोफोन और टेलीफोन आदि धीरे-धीरे माकोंदो के वासियों और गांव को पूरी तरह से बदल कर रख देते हैं. एक तरह से गांव के मौलिक स्वरूप व उसकी संस्कृति व सभ्यता को तबाह कर देता है.

उपन्यास में बड़े ही विस्तार से लैटिन अमेरिकी समाज के सामाजिक और धार्मिक जीवन में विभिन्न बदलावों को बखूबी रेखांकित किया गया है. कैसे छोटे से गांव में जहां कोई पूजा घर नहीं था वहां औपनिवेशिक वर्चस्व के साथ-साथ चर्च का प्रवेश होता है.
मार्केज इस तरीके से लैटिन अमेरिका के औपनिवेशिक समाज के बदलाव का खाका हमारे सामने रखते है. ‘माकोन्दो पर अमेरिकन और स्पेनिश उपनिवेशों की स्थापना होती है.

यहाँ ऐतिहासिक परिवर्तन उस समय होता है जब उत्तरी अमेरिका की ‘केला कंपनी ‘माकोन्दो पहुँचती है.  इसी के बहाने मार्केज लैटिन अमेरिकी देशों में तानाशाहों की सत्ता पर कब्जे की ललक और बड़ी कंपनियों के लूटपाट और बर्बर नरसंहारों की घिनौनी हरकतों की पोल खोलते हैं. इसमें स्टेशन के पास सेना द्वारा आंदोलन कर रहे निहत्थे मजदूरों पर अंधाधूंध गोलीबारी का वर्णन है. इसमें हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं. उनके शवों को 200 डिब्बों वाली रेलगाड़ी भर कर कहीं भेज दिया जाता है. इतने बड़े नरसंहार को भी सत्ता पक्ष ढकने और छुपाने का प्रयास करता है. यह नरसंहार कुछ-कुछ भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड की झलक दे जाता है.

मार्केज के उपन्यासों में जिस प्रकार से चरित्रों के जीवन में अनगिनत गृहयुद्धों, सामाजिक हिंसा के अनुभव उपस्थित हैं, वह यह अहसास दिलाते हैं कि किस प्रकार कोलंबिया जैसे देश में मनुष्यता के लिए जीना दूभर हो जाता है. कोलंबिया में तानाशाहों ने बर्बर हिंसा के माध्यम से लोगों की अभिव्यक्ति को बाधित कर रखा था और अभिव्यक्ति की नई शैलियाँ ईजाद करना अनिवार्य हो गया था. ऐसे ही दौर में मार्खेज ने लेखन व यथार्थवाद की मौलिक शैलियों का प्रयोग कर कोलंबिया के वास्तविक हालात से लोगों को अवगत कराया.

मार्खेज एक तरह से माकोंदो के बहाने अपने परिवार नाना कर्नल निकोलस मार्खेज की कथा को ही विस्तार देते हैं. वे उपन्यास के नायक कर्नल बुएदिनिया की तरह सेना में कर्नल थे, वे उदारवादी विचारों के थे. उन्होंने कोलंबिया में 1899 से 1902 के बीच चले वार आफ थाउसेंड डेज के नाम से प्रसिद्ध रूढि़वादियों व उदारपंथियों के बीच के लंबे युद्ध में हिस्सा लिया था. इस युद्ध ने कोलंबिया की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था.

उपन्यास की पृष्ठभूमि में भी कोलंबिया के हिंसक गृहयुद्धों का वर्णन है जिसमें ढेरों लड़ाइयाँ लोकतांत्रिक-उदारवादियों और दक्षिणपंथियों के मध्य लड़ी गईं. उपन्यास का मुख्य पात्र कर्नल ओरिलियानो बुएदिनिया भी उदारपंथी समुदाय की ओर से इन लड़ाइयों में शामिल रहा लेकिन वह सभी लड़ाइयों में पराजित होते हैं.
मार्केज खुद पत्रकार थे वे बेबाक टिप्पणी करने से भी नहीं चूकते और ना ही पूंजीवाद और औपनिवेशक व्यवस्था को बेनकाब करने से.

उपन्यास में बुएनदिया परिवार के ही सौ वर्षों के इतिहास में छह पीढिय़ों के लोगों का वर्णन है. इसमें एक जैसे मिलते जुलते नामों का मकडज़ाल है. आर्कादियो व औरलेयानो भरे पड़े हैं. कई बार पाठक कन्फूज हो जाता है कि वो कौन से औरलेयानो को पढ़ रहा है. इसमें बुएनदिया परिवार के एक अलग तरह के सनकीपन, एकांतप्रियता तथा परिजनों के साथ ही शारीरिक संबंधों की घटनाओं की भरमार है.

मार्केज ने उपन्यास में मजबूत इरादों और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली स्त्रियों को चित्रित किया है. खासकर उर्सूला कमाल की महिला है जो करीब सौ साल के जीवन में तमाम उतार चढ़ाव को बखूबी झेलती है. वो हार नहीं मानती. पुरुषों की तुलना में वो ज्यादा कर्मठ और अपने परिवार को जोड़े रखने की मजबूत कड़ी के रूप में दिखाई देती हैं.  इसी तरह से अमारांता भी उसी की अगली कड़ी के रूप में सामने आती हैं.

हालांकि मैंने जो किताब पढ़ी है वो मूल स्पेनिश से सोन्या सुरभि गुप्ता ने अनुवाद किया है लेकिन मूल भाषा के भावों को बिना गति बाधित की रोचक ढ़ंग से पेश करना अनुवाद के लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. शायद मूल पुस्तक को पढ़नेवाले लोगों ने इसका रसास्वादन ज्यादा किया हो. इस नोबेल पुरस्कार (1982)प्राप्त उपन्यास की करीब दो करोड़ प्रतियां बिकी है.


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