13 पॉइंट रोस्टर अब अतीत की बात: केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये इलाहबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटा

आखिरकार देश भर में व्याप्त आक्रोश को देखते हुए केंद्र सरकार ने अध्यादेश के जरिये 13 पॉइंट रोस्टर को हटा दिया है और उसकी जगह पुरानी 200 पॉइंट रोस्टर को मान्यता दे दी है. इस व्यवस्था से अब सुनिश्चित हो सकेगा कि यूनिवर्सिटी में शिक्षकों की बहाली करते हुए आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन न हो और दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों के कैंडिडेट्स को समुचित प्रतिनिधित्व मिल सके.

ज्ञात हो कि 13 पॉइंट रोस्टर के विरोध में 5 मार्च को देश भर में बंद का आवाहन किया गया था. इसके अलावा इलाहबाद हाई कोर्ट के फैसले के बाद से देश भर से असंतोष व्याप्त था.

200 पॉइंट रोस्टर: 

दो सौ प्वाइंट रोस्टर में विश्वविद्यालय की सभी नियुक्तियां एक साथ निकलती थीं.  उसमे ये सुनिश्चित किया जाता था कि अगर 200 पोस्ट की वैकेंशी निकली है तो 99 सीट अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित रहते थे. और 101 सीट अनारक्षित रहते थे. इस सिस्टम में एक डिपार्टमेंट में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की कमी दुसरे डिपार्टमेंट में अधिक भरती से पुरी की जाती थी. इस तरह पुराने सिस्टम में आरक्षण की संविधानिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाती थी.  वहीं नये 13 प्वाइंट रोस्टर में विभागीय स्तर पर नियुक्तियां निकलती हैं. उसी आधार पर आरक्षण दिया जाता है.

इलाहबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले से 13 पॉइंट रोस्टर लागू करने का निर्देश दिया था: 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल 2017 में यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) की 2006 में जारी की गई गाइड लाइन के एक प्रावधान को खत्म कर दिया. सात अप्रैल, 2017 को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने विवि  में शिक्षकों की नियुक्ति में 13 प्वाइंट रोस्टर  सिस्टम लागू करने का आदेश दिया था.  इसके खिलाफ  यूजीसी और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने याचिका दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट  ने 22 जनवरी, 2019 को खारिज कर  दिया. इसके बाद केंद्र सरकार ने रिव्यू पिटीशन दायर किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को खारिज कर दिया.
200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम पर यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 22 जनवरी, 2019 को खारिज कर दिया. आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2017 के फैसले को बहाल रखा था, जिसमें आरक्षित पदों को भरने के लिए डिपार्टमेंट को यूनिट माना गया था न कि यूनीवर्सिटी को. इस मामले में सरकार की रिव्यू पीटिशन को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था.
इस मुद्दे पर अप्रैल 2017 में इलाहाबाद हाई कोर्ट और 22 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले की वजह से उच्च शिक्षा केंद्रों में अनुसूचित जाति/जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के आरक्षण के जरिए प्रवेश का काफी रास्ता काफी हद तक अटक गया है.
विश्वविद्यालय की जगह डिपार्टमेंट यूनिट माना गया :
पहले विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के अनुसार नियुक्ति होती थी. इसमें विवि व कॉलेजों एक यूनिट माना जाता था. इसके तहत 49.50% सीटें  एससी-एसटी व ओबीसी के लिए आरक्षित रहती थीं, जबकि शेष सीटें सामान्य वर्ग के  लिए होती थीं. अगर किसी विभाग में चार पदों के लिए वैकेंसी निकली, तो  इनमें दो सीटें अनारक्षित और दो आरक्षित होती थीं. लेकिन नये 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम में विवि की जगह विभाग/विषय को यूनिट माना जायेगा.
इसके अनुसार अगर किसी विवि के किसी विभाग में वैकेंसी आती है, तो चौथा, आठवां और 12वां कैंडिडेट ओबीसी होगा. मतलब कि एक ओबीसी कैंडिडेट विभाग में आने के लिए कम-से-कम चार वैकेंसी होनी चाहिए.
सातवां कैंडिडेट एससी कैटेगरी का होगा. मतलब कि एक एससी कैंडिडेट विभाग में आने के लिए कम-से-कम सात वैकेंसी होनी ही चाहिए. 14वां कैंडिडेट एसटी होगा. मतलब कि एक एसटी कैंडिडेट को कम-से-कम 14 वैकेंसी का इंतजार करना ही होगा़  बाकी 1,2,3,5,6,9,10,11,13 पोजिशन अनारक्षित पद होंगे.
उच्च शैक्षणिक संस्थानों में विभाग को एक इकाई माने जाने पर आरक्षण पूरी तरह बेअसर हो जाता है. इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं- किसी एक विभाग में अगर 3 प्रोफेसर, 3 एसोसिएट प्रोफेसर, 3 असिस्टेंट प्रोफेसर के पद खाली हैं तो कुल 9 पद होते हुए भी इनमें से एक भी पद (अलग-अलग कैडर होने के कारण) आरक्षण के दायरे में नहीं आएगा क्योंकि ओबीसी के लिए किसी एक कैडर में कम-से-कम 4 पद, अनुसूचित जाति के लिए 7 पद और जनजाति के लिए 14 पद होने चाहिए.

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