मातृ,शिशु व बाल पोषण में सुधार के लिए बिहार के पाँच मेडिकल कॉलेज के नर्स एवं चिकित्सक होंगे प्रशिक्षित

पटना/ 8 मार्च: मातृ, शिशु एवं बाल पोषण में सुधार के लिए राज्य में पाँच मेडिकल कॉलेज के तीन विभागों के चिकित्सकों को विशेष प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा. इसके लिए “Alive and Thrive”(“एलाइव एंड थराईव”) द्वारा दरभंगा, पटना, मुज्ज़फरपुर, गया के चिकित्सा महाविद्यालयों के साथ एम्स, पटना के चयनित चिकित्सकों को “प्रशिक्षक का प्रशिक्षण” दिया गया है. इसके बाद ये प्रशिक्षक राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षक के साथ मिलकर कुल 35 बैचों में इन पांच चिकित्सा महाविद्यालयों में शिशु, महिला एवं प्रसूति के साथ कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों एवं नर्सों को प्रशिक्षित करेंगे. 12-13 मार्च को श्री कृष्ण चिकित्सा अस्पताल मुजफ्फरपुर से प्रशिक्षण की शुरुआत होगी.

प्रशिक्षक के प्रशिक्षण हेतु राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षकों को दिल्ली के एम्स, विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से बुलाया गया. प्रशिक्षण के दौरान स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव डॉ कौशल किशोर ने भी प्रतिभागियों को मातृ, शिशु एवं बाल पोषण पर बल देने की आवश्यकता एवं आवश्यक कदम के बारे में जानकारी दी.

क्या है कार्यक्रम: Alive and Thrive (एलाइव एंड थराईव) एक अंतर्राष्ट्रीय हस्तक्षेप है जो भारत में और विशेषकर उत्तरप्रदेश और बिहार में मातृ, शिशु एवं बाल पोषण पर चिकित्सा महाविद्यालयों को तकनीकी सहयोग प्रदान करती है. इसके अंतर्गत चिकित्सा महाविद्यालयों के शिक्षण पाठ्यक्रमों में मातृ, शिशु एवं बाल पोषण को समावेशित कराने तथा इसपर दक्षता विकसित करने के लिए प्रयास कर रही है.

क्या कहता है सर्वेक्षण : “एलाइव एंड थराईव” ने वर्ष 2017 में बिहार एवं उत्तरप्रदेश के चिकित्सा महाविद्यालयों में मातृ, शिशु एवं बाल पोषण के बारे में जानकारी पर एक आधारभूत सर्वेक्षण करवाया जिससे पता चला कि मातृ पोषण के बारे में जानकारी की कमी है. सिर्फ 28 प्रतिशत स्नातक, 30 स्नातोकोतर एवं 17 प्रतिशत नर्सिंग के छात्रों को ही गर्भवती महिलाओं के खाद्य विविधता के बारे में जानकारी थी. इसी प्रकार गर्भावस्था के दौरान आयरन फोलिक एसिड के गोली की खुराक के बारे में जानकारी क्रमशः 17, 7 एवं 3 प्रतिशत थी. सिर्फ 40 प्रतिशत विभागाध्यक्षों ने कहा कि मातृ पोषण पर पर्याप्त शिक्षण हुआ है. इन चिकित्सा महाविद्यालयों के शिशु विभागों के सिर्फ 38 प्रतिशत नर्सिंग कर्मचारियों को यह जानकारी थी कि बच्चे का वजन अगर जन्म के समय 2.5 किलोग्राम से कम हो तो उसे कंगारू देखभाल की आवश्यकता होती है. ऐसे में यह स्पष्ट हो गया था कि जीवन के प्रथम हजार दिन पर जोर देना है तो चिकित्सा महाविद्यालयों में भी हस्तक्षेप करना होगा.

इन विषयों पर दिया जायेगा बल : मातृ, शिशु एवं बाल पोषण में सुधार को लक्ष्य बनाते हुए प्रशिक्षण मोड्यूल तैयार किया गया है. जिसमें एक घन्टे के भीतर स्तनपान, 6 माह तक सिर्फ स्तनपान, अनुपूरक आहार, प्रतिरक्षण, सुरक्षित प्रसव एवं प्रसव पूर्व देखभाल के साथ गर्भवती माता के पोषण पर सटीक सलाह को शामिल किया गया है. कुल मिलाकर जीवन के प्रथम 1000 दिन की कवायद को मजबूती प्रदान करने की दिशा में एक सशक्त कदम होगा यह अभियान.

मातृ, शिशु एवं बाल स्वास्थ्य में आयेगी सुधार : प्रशिक्षण के माध्यम से शिशु, महिला एवं प्रसूति के साथ कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों को शामिल किये जाने से स्वास्थ्य इकाइयों में होने वाली संस्थागत प्रसव की सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगी. साथ ही इसके माध्यम से मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल में ओपीडी में आने वाली महिलाओं को पोषण, एक घन्टे के भीतर स्तनपान के साथ 6 माह तक सिर्फ स्तनपान एवं 6 माह के बाद अनुपूरक आहार की जरूरत के विषय में सलाह प्रदान किया जाएगा.  इससे राज्य में महिलाओं के बीच रक्ताल्पता एवं बच्चों में कुपोषण में कमी आएगी जिससे मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम होगा.


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