तारकेश्वरी सिन्हा: कांग्रेसी सांसद जिन्होंने वाकचातुर्य और सौंदर्य से अपने दौर पर खासा असर छोड़ा

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

उन्हें ग्लैमरस गर्ल ऑफ पार्लियामेंट कहा जाता था. वो तारकेश्वरी सिन्हा थीं. महज 26 साल की उम्र में लोक सभा सांसद. उनके बारे में कहा जाता है कि वह देखने में जितनी खूबसूरत थीं उतनी ही बेहतरीन वह एक वक्ता के रूप में थीं.  कहा जाता था कि उस समय बहुत से सांसद लोकसभा में आते ही केवल इसलिए थे कि वह तारकेश्वरी को देख सकें या बोलते हुए सुन सकें. फ़िरोज़ गांधी से उनके अफेयर के किस्से मीडिया में गॉसिप बनते थे. इंदिरा गाँधी से उनकी बनती नहीं थी. 1971 के लोक सभा चुनाव में जब कांग्रेस के उम्मीदवार धर्मवीर सिन्हा ने उन्हें हरा दिया, तो इंदिरा गाँधी ने खुश होकर धर्मवीर सिन्हा को अपने कैबिनेट में मंत्री बना दिया.

14 अगस्त 2007 को उनका देहांत हो गया. उनके निधन की खबर अखबारों की सुर्खियाँ नहीं बनीं. जिस महिला ने अपने दौर पर अपनी खूबसूरती और वक्तृत्व कला से अपना असर छोड़ा था, उसे मीडिया ने अंतिम समय में भुला दिया था.

तारकेश्वरी सिन्हा का जन्म 26 दिसम्बर 1926 को हुआ था. उन्होंने आज़ादी के आन्दोलन के दिनों में भारत छोडो आन्दोलन में भाग लिया. 26 साल की उम्र में वे पटना ईस्ट लोक सभा सीट से चुनी गयीं. इसके बाद 1957, 1962 और 1967 में लगातार तीन बार कांग्रेस के टिकट पर बाढ़ लोक सभा क्षेत्र में विजयी रहीं. नेहरु की कैबिनेट में वे 1958 से 1964 तक वे डिप्टी फाइनेंस मिनिस्टर भी रहीं.

गुलज़ार की फिल्म  “आंधी” की वे प्रेरणा थीं: 

कहा जाता है कि गुलज़ार की आंधी” फिल्म इंदिरा गाँधी के अलावा उनकी जिंदगी से भी प्रभावित रही थी. हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी गुलज़ार की यादों के अनुसार उन्होंने 69 से 71 के बीच तारकेश्वरी को अपने शहर लुधियाना में देखा था, वह डॉ. निजलिंगप्पा और मोरारजी देसाई के साथ देशभर का दौरा कर रही थीं, वो उस कैंप में थीं, जो इंदिरा का विरोधी था. इसमें कुछ हैरानी की बात इसलिए थी क्योंकि ज्यादातर युवा नेता इंदिरा के साथ थे. ऐसे में युवा तारकेश्वरी का इन लोगों के साथ होना. इसीलिए क्योंकि उन्हें मालूम था कि इंदिरा एक क्षण के लिए भी उनका साथ पसंद नहीं करने वाली.

मोरारजी देसाई के संग रोचक संस्मरण:

वर्ष 1957 के आम चुनाव होने वाले थे. कांग्रेस के केंद्रीय प्रेक्षक बन कर मोरारजी देसाई पटना पहुंचे थे. गांधीवादी मोरारजी अन्य बातों के अलावा उम्मीदवारों के पहनावे के बारे में भी कड़ाई से पूछते थे. सन 1952 में सांसद चुनी जा चुकीं तारकेश्वरी सिन्हा एक बार फिर उम्मीदवार थीं. मोरार देसाई ने उनसे पूछा कि ‘तुम लिपस्टिक लगाती हो, कीमती कपड़े पहनती हो?’

यह सुनकर तारकेश्वरी जी को गुस्सा आ गया. उन्होंने कहा कि ‘हमारे यहां चूडि़यां पहनना अपात्रता नहीं बल्कि क्वालिफिकेशन माना जाता है. आप जो शाहहूश की बंडी पहने हैं, इसकी कीमत से मेरी 6 कीमती साड़ियां आ सकती हैं. उसके बाद तारकेश्वरी सिन्हा ने जवाहरलाल नेहरू को चिट्ठी लिखी कि आप कैसे-कैसे प्रेक्षक भेजते हैं?

तारकेश्वरी सिन्हा के अनुसार, ‘मोरारजी को देख कर पंडित नेहरू हमेशा कहते थे कि तारकेश्वरी ने मोरारजी को लकड़ी के कुंदे से इंसान बना दिया. तारकेश्वरी सिन्हा ने एक बार कहा था कि ‘रात के अंधेरे में भी मोरारजी के कमरे में जाकर कोई जवान और सुंदर महिला सुरक्षित वापस लौट कर आ सकती है.’

एक बार डॉक्टर राम मनोहर लोहिया संसद में स्टालिन की बेटी स्वेतलाना को भारत में शरण दिए जाने की मांग कर रहे थे. कांग्रेस सांसद तारकेश्वरी सिन्हा ने कहा, “लोहिया जी आप तो बैचलर हैं, आपने शादी नहीं की, आपको औरतों के बारे में क्या मालूम.” लोहिया जी तपाक से बोले, “तारकेश्वरी तुमने मौका ही कब दिया.”

‘सर, यह क्या बात है! जहां कहीं अफेयर की बात चलती है, स्त्री अवश्य होती है.’

खैर यह तो पहली मुलाकात थी. चुनाव के बाद नेहरू जी ने एक दिन संसद में नयी मंत्री तारकेश्वरी का परिचय कराते हुए कहा कि ‘ये इकाॅनोमिक अफेयर की मंत्री हैं.’ इस पर फिरोज गांधी ने उठकर तपाक से सवाल किया, ‘सर, यह क्या बात है! जहां कहीं अफेयर की बात चलती है, स्त्री अवश्य होती है.’

तारकेश्वरी सिन्हा बांकीपुर गर्ल्स कॉलेज जो अब मगध महिला कॉलेज के नाम से जाना जाता है, की विद्यार्थी रही थीं. वे बिहार स्टूडेंट कांग्रेस, जिसका गठन AISF से टूटकर हुआ था, की प्रेसिडेंट भी रही थीं.

फ़िरोज़ गाँधी से उनके अफेयर की ख़बरें इंदिरा गांधी के कानों में पड़ती रहती थीं, और मीडिया में भी मसाला खबर के रूप में जगह पाती थीं. इस पर तारकेश्वरी सिन्हा का कहना था, ” अगर एक मर्द और औरत साथ में लंच भी कर लें, तो अफेयर की अफवाह उड़ने लगती है…. मैंने एक बार इंदिरा से पूछा था कि क्या वह अफवाहों में यकीन करती हैं, चूँकि मै शादी शुदा थी और मेरा खुद का परिवार और आत्मसम्मान था, उन्होंने कहा था कि वह अफवाहों में यकीन नहीं करतीं.”

इंदिरा पर जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रेंक ने अपनी किताब इंदिरा में लिखा, किसी जमाने में फिरोज गांधी का अफेयर खुलेआम तारकेश्वरी से चला था. इंदिरा ने कभी इसे पसंद नहीं किया, यही वजह थी कि जितना नापसंद एक ज़माने में उन्होंने तारकेश्वरी को किया, उतना शायद किसी महिला को किया हो.

इंदिरा गांधी के खिलाफ मोरारजी देसाई का साथ देने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा: 

तारकेश्वरी सिन्हा मोरारजी देसाई के करीब मानी जाती थीं और जब इंदिरा गाँधी और मोरारजी देसाई के बीच सत्ता का संघर्ष हुआ, तो उन्होंने मोरारजी देसाई का पक्ष लिया. जब मोरारजी देसाई और उनके समर्थकों ने कांग्रेस से निकल कर अलग पार्टी बनायी, तो तारकेश्वरी सिन्हा भी इसमें सम्मिलित हुईं. लेकिन1971 के चुनाव में बंगलादेश युद्द में विजयी होने के बाद देश भर में इंदिरा गाँधी की लहर चल रही थी, ऐसे में तारकेश्वरी सिन्हा बाढ़ से कांग्रेसी उम्मीदवार धर्मवीर सिन्हा से हार गयीं. ये उनकी पहली चुनावी हार थी. अगले साल उन्होंने विधान सभा चुनाव में जोर आजमाईश की, पर यहाँ भी हार मिली. फिर वे इंदिरा गाँधी के साथ आ गयीं. लेकिन किस्मत देखिये. जब 1977 में वे बेगुसराई से लोक सभा चुनाव लड़ीं तो उस समय इमरजेंसी के चलते इंदिरा गाँधी के विरोध में देश भर में लहर थी और नतीजा तारकेश्वरी सिन्हा को एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा. अगले साल 1978 में वे समस्तीपुर से लोकसभा उपचुनाव लड़ीं, पर फिर से एक बार हार मिली. अंत में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया और अपने आप को समाज सेवा में लगा दिया.

भारतीय राजनीति में अमूल्य 19 साल बिताने के बाद तारकेश्वरी सिन्हा ने जब राजनीति से संन्यास ले लिया तब उस वक्त जब भी लोग उनसे पूछते कि, ‘संसद में नहीं रहने के बाद आप क्या कर रही हैं?’, तो वह कहती थीं कि “जी चाहता है उन्हें उत्तर दूँ कि संसद में नहीं हूँ, झख मार रही हूँ।”

उनके पिता उन्हें राजनीति से दूर नहीं रख पाए:

तारकेश्वरी के पिता पटना में सर्जन थे.  बहुत युवा उम्र में ही उनकी शादी छपरा के जाने- माने भूमिहार जमींदार परिवार में तय कर दी गई. पति निधिदेव सिंह तब बड़े वकील थे और राज्य सरकार के मुकदमों को लड़ते थे. पति के साथ वह कोलकाता की शानदार पैतृक हवेली में रहने लगीं. लेकिन शायद राजनीति से दूर रहना उनका शगल नहीं था. वह फिर से स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कूद पड़ीं. इस बीच लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से वो इकोनॉमिक्स में एमएससी करने चली गईं. हालांकि उन्हें पढाई बीच में ही छोड़कर लौटना पड़ा.

तारकेश्वरी सिन्हा ने अपने भाई कैप्टेन गिरीश नंदन सिंह जो एयर इंडिया के पायलट थे और हवाई दुर्घटना में जिनकी मौत हो गयी थी, की याद में तुल्सीगढ़ में एक अस्पताल की स्थापना की. इसके अलावा उन्होंने नालंदा में चंडी और हरनौत से अपने गाँव को जोड़ने के लिए सड़क बनवाई.

उनके बाद उनके परिवार से कोई राजनीति में नहीं आया.


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