महिला दिवस तभी सार्थक जब महिलाएं को उनकी ख्वाहिशों, चाहतों और सपनों के साथ जीने दिया जाये

रजनीश आनंद* 

आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. इस अवसर पर सभी को शुभकामनाएं. यह कहने की जरूरत नहीं कि महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुकी है और उन क्षेत्रों में भी अपनी जगह बना चुकी हैं, जो कभी उनके लिए पूरी तरह बंद थे और जिनमे पुरुषों का एकाधिकार माना जाता था. महिलाएं आज आर्थिक रूप से भी काफी सशक्त हुईं हैं, बावजूद इसके अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि महिलाओं की सफलता उनका सशक्तीकरण बहुत सतही है.

दरअसल उसे अभी काफी संघर्ष करना है. अभी महज आधे रास्ते का सफ़र तय हुआ है. मंजिल अभी भी दूर है. मूल मुद्दे आज भी अनछुए हैं. निर्णय करने की स्थिति में महिलाएं आज भी नहीं हैं. एक इंसान के तौर पर महिला पुरुष से भिन्न है, इसलिए दोनों की तुलना बेमानी है. हम पुरुषों से मुकाबला क्यों करें, हमारी अपनी पहचान है और हम उसी के साथ जीना चाहते हैं. एक स्त्री को स्त्री ही रहने दें, उसकी ख्वाहिशों, चाहतों और सपनों के साथ. लेकिन हमारे ऐसा कहते ही पितृसत्तामक समाज के अभिमान को चोट पहुंचती है.

हमारे यहां कानून और परंपराएं भी एक से बढ़कर एक हैं, जो एक महिला के अस्तित्व को सवालों के घेरे में खड़ा करती है. यहां कॉलेज के अध्यापकों को महिलाओं की वर्जिनिटी पर सवाल खड़े करने होते हैं, पुरुषों के नहीं. ऐसे शब्द ही महिलाओं को अपमानित करने के लिए गढ़े गये हैं. बात अगर हालिया प्रसंगों की हो, तो सबरीमाला एक उदाहरण है. यहां 10-50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध है. अरे ऐसे कौन भगवान हैं, जो महिलाओं के छूने या उसकी छाया पड़ने से अपवित्र हो जाते हैं, ऐसे भगवान के दर्शन करना मैं तो बिलकुल नहीं चाहती. मैं पवित्रता की ऐसी खोखली धारणाओं से डरती हूं.

अभी हाल में एक खबर आयी थी कि अलग रह रहे पति-पत्नी को शारीरिक संबंध बनाने का आदेश दिया जा सकता है और सुप्रीम कोर्ट में इसपर सुनवाई हो रही है. यानी कि एक महिला का अपने शरीर पर हक नहीं, उसे कानून द्वारा मान्यताओं द्वारा यह आदेश दिया जा सकता है कि उसे किसके साथ और कब सेक्स करना है. मेरा सवाल है उसकी मर्जी बेमानी क्यों? हलाला जैसी बेतुकी रिवायतें यहां मौजूद हैं. महिलाएं अपनी मर्जी से कैरियर नहीं चुनतीं, अपनी मर्जी का पहनती नहीं, अपनी कमाई पर अपना हक नहीं रखतीं, अपनी मर्जी से कहीं आती-जाती नहीं हैं. क्या कैरियर के क्षेत्र उसे यह कहकर कमतर बता दिया जाता है क्योंकि वह महिला है?

यह कुछ मुद्दे हैं जिनपर विचार करने की जरूरत है. कम कपड़े पहनकर और पांच-दस पुरुषों के साथ संबंध बनाकर कोई महिला सशक्त नहीं होती, वह तो खुद को शोषण के लिए प्रस्तुत करती है, यह बात हमें समझनी होगी, खासकर युवा पीढ़ी को. महिलाओं की वर्जिनिटी पर चर्चा आम पर पुरूषों राजनीति में आपकी पैठ नहीं 545 में से आज तक सौ सीटों पर आपको जगह नहीं मिली. कुछ उदाहरण देकर यह कह देना कि महिलाएं सशक्त हैं मुझे किसी भी तरह सही नहीं लगता. बस इतनी चाहत है समाज से हमें इंसान समझ लो, सारी समस्याएं मिट जायेंगी…

#InternationalWomen’sDay

*साभार रजनीश आनंद के फेसबुक वाल से.


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