जाने अनजाने बहुत बड़े पैमाने पर फेक न्यूज़ फैलाया जा रहा है : गूगल ने रांची वर्कशॉप में कहा

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

रांची/12 मार्च: रांची प्रेस क्लब में गूगल ने आगामी लोकसभा चुनाव के कवरेज के दौरान फेक न्यूज़ के प्रचार, प्रसार पर रोक लगाने के उद्देश्य से एक दिन का वर्कशॉप किया, जिसमे गूगल का सहयोगी सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ झारखण्ड का मीडिया कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट था. इस वर्कशॉप में कुल 93 प्रतिभागी थे, जिसमे रांची के पत्रकार समेत सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ झारखण्ड के मीडिया विभाग के विद्यार्थी भी शामिल हुए.

फेक न्यूज़ को पकड़ने और उसे फैलने से रोकने की अपनी मुहीम में गूगल देश भर के लगभग 30 शहरों में इस तरह के प्रोग्राम कर रहा है, जिसमे रांची भी एक शहर के तौर पर शामिल था.

इस अवसर पर बोलते हुए यूनिवर्सिटी के मीडिया विभाग के प्रोफ़ेसर देवव्रत कह रहे थे कि Misinformation, ख़बरों से खिलवाड़ सत्ता और ताकतवर लोगों ने पहले से भी किया है, पर पिछले 5–7 सालों में इस तरह के माहौल में तेजी आई है. और ऐसा तकनीक के तेज गति से इस्तेमाल की वजह से संभव हो पाया है. तकनीक की वजह से आज ख़बरें बहुत तेज गति से फैलती हैं. मीडिया पर आज समाज का भरोसा कम हुआ है, ये बहुत बड़ी चुनौती है. मीडिया की साख बची रहे, इसके लिए बेहद जरुरी है कि हम फेक न्यूज़ को पहचानने की ताकत बढायें, न इसे फैलाएं, न इसे फैलने दें. उन्होंने न्यू यॉर्क टाइम्स का उदाहरण देते हुए बताया कि न्यू यॉर्क टाइम्स के संपादक ने इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ एक मुहीम चलाई WMD ( weapons of mass destruction) को लेकर. उनके रिपोर्ट्स के आधार पर अमरीकी राष्ट्रपति ने सद्दाम के खिलाफ जंग छेड़ दी. पूरा इराक तबाह हो गया. जब युद्ध के बाद भी वे जैविक हथियार न मिले, तो ये बात खुल कर आई कि न्यू यॉर्क टाइम्स ने झूठ को फैक्ट की तरह पेश किया. 2004 में फेक न्यूज़ के लिए न्यू यॉर्क टाइम्स को माफ़ी मांगनी पड़ी. इसी तरह पुलवामा अटैक के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत के तौर पर विडियो गेम चला दिए गये. उन्होंने चिंता जाहिर की कि वर्तमान परिस्थितियों में कितनों के पास स्किल है कि वे फेक न्यूज़ को पहचान सकें.

गूगल की ओर से ट्रेनर प्रोफ़ेसर उमेश आर्य ने वर्कशॉप की शुरुआत करते हुए कहा कि फैक्ट वेरिफिकेशन मीडिया सेक्टर में नए जॉब की तरह तेजी से उभर रहा है. उन्होंने बताया कि फेक न्यूज़ क्या है? ये झूठी और सेनशेसनल खबरे हैं जो न्यूज़ रिपोर्टिंग की आड़ में फैलाई जाती हैं. 

फेक न्यूज़ पर बीबीसी का सर्वे: 

फेक न्यूज़ पर गूगल ट्रेनर ने बीबीसी के एक सर्वे का जिक्र किया, जिसने अनुसार:

  1. फेक न्यूज़ तथ्य नहीं, भावनाओं से प्रेरित होती हैं.
  2. फेक न्यूज़ की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं.
  3. ढंग से जांच नहीं होती है, न्यूज़ शेयर करने से पहले,
  4. फेक न्यूज़ में इमेज को टेक्स्ट की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है.
  5. व्हात्सप्प सबसे प्रमुख चैनल हो गया है फेक न्यूज़ फैलाने का.
  6. प्राइवेट नेटवर्क पर लगभग सात फीसदी मेसेज मोदी पर केन्द्रित होते हैं.
  7. फेक न्यूज़ फैलाने के पीछे हमेशा दुर्भावना ही हो, जरुरी नहीं.
  8. फेक न्यूज़ फैलाने में दक्षिण पंथी संगठन ज्यादा organised हैं.
  9. भाजपा समर्थक नेटवर्क फेक न्यूज़ के ज्यादा करीब हैं, हालाँकि अन्य राजनीतिक दल भी इसमें शामिल हैं आदि.

7 तरीके के फेक न्यूज़: 

प्रोफ़ेसर उमेश आर्य ने बताया कि फेक न्यूज़ सात तरीके के होते हैं:

  1. Satire: इसका उद्देश्य नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि मुर्ख बनाना होता है.
  2. False Connection: इसमें हैडलाइन, विसुअल्स या कैप्शन कुछ और होते हैं और कंटेंट कुछ और.
  3. Misleading Content: इसके तहत इनफार्मेशन का इस्तेमाल जान बुझकर mislead करने या किसी व्यक्ति, देश को घेरने के लिए किया जाता है. जैसे पाकिस्तान की यूएन  में प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने भारत को घेरने के लिए पेलेट गन से घायल बच्ची की तस्वीर दिखाई, पर जांच करने पर पता चला कि वो तस्वीर सीरिया की थी. पाकिस्तान की भद पिटी.
  4. False Context: जब कोई विडियो या तस्वीर तो असली होती है, पर फाल्स इनफार्मेशन के साथ उसका कॉन्टेक्स्ट बदल दिया जाता है. जैसे दिल्ली में कुछ मुस्लिम युवकों को बाइक पर जाते दिखाया गया. इस विडियो के माध्यम से बताने की कोशिश की गयी कि ये युवक क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की भारत पर जीत को लेकर जश्न माना रहे हैं, पर जब इसे चेक किया गया, तो पता चला कि वे सिर्फ नाईट आउट कर रहे थे.
  5. Imposter Content: इसमें जेन्युइन सोर्स का इस्तेमाल गलत जानकारी शेयर करने के लिए की जाती है. जैसे बीबीसी का लोगो लगाकर न्यूज़ शेयर किया गया कि बीबीसी के सर्वे में बात आई है भारत का राष्ट्रीय गान नंबर वन घोषित किया गया, या फिर, बीजेपी दुनिया की चौथी सबसे भ्रष्ट पार्टी है, आदि.
  6. Manipulated Content: इसके तहत असली फोटो के साथ छेड़ छाड़ की जाती है. जैसे, नरेंद्र मोदी को हाफ़िज़ सईद के साथ हाथ मिलाते दिखाया गया, जबकि असली तस्वीर में वे नवाज शरीफ से हाथ मिला रहे हैं.
  7. Fabricated Content: इसमें कंटेंट सौ फीसदी झूठे होते हैं. जैसे, हाल में समाचार काफी शेयर किया गया कि सऊदी प्रिंस को अपनी छः पत्नियों को 350 मिलियन डॉलर देने पड़े.

कुल मिलाकर फेक न्यूज़ तीन broad category में आते हैं:

  1. Manipulation
  2. Wrong Context; and
  3. False Claims.

प्रोफ़ेसर उमेश आर्य ने बताया कि फेक न्यूज़ समाज के लिए हानिकारक है. इससे इनफार्मेशन डिसऑर्डर फैलता है. मष्तिष्क सही फैसले नही ले पाता.  सूचनाओं का गलत इस्तेमाल तीन तरीके से हमारे पास आता है:

  1. Disinformation: जब गलत सूचनाओं का जानबूझ कर प्रसार किया जाता है.
  2. Misinformation:जब गलत सूचनाओं का अनजाने में प्रसार होता है;
  3. Malinformation: जब सूचनाओं का रणनीतिक इस्तेमाल होता, किसी समूह, व्यक्ति, वर्ग, राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने के लिए.

उन्होंने बताया कि भारत से बाहर फेक न्यूज़ फैलाने के लिए कई पत्रकारों को सजा हुई है. हालाँकि भारत में अभी फेक न्यूज़ के लिए स्पेसिफिक लॉ नहीं हैं, पर पब्लिक डिसऑर्डर फैलाने, राष्ट्रों के बीच वैमनस्य फैलाने आदि के ग्राउंड पर इंडियन पेनल कोड में सजा का प्रावधान है. जल्द ही हम भारत में फेक न्यूज़ को रोकने के लिए कानून की उम्मीद कर सकते हैं. इसलिए पत्रकारों को काफी सावधान रहकर काम करने की जरूरत है. उनकी कोशिश होनी चाहिए कि वे फेक न्यूज़ न फैलाएं.

फेक न्यूज़ पहचानने के उन्होंने तरीके बताये: 

प्रोफ़ेसर उमेश आर्य ने न्यूज़ की सत्यता स्थापित करने के तरीकों पर भी चर्चा की.

आम तौर पर अवधारणा ये है कि जिस न्यूज़ को हम गूगल सर्च में सबसे ऊपर देखते हैं, उसी पर भरोसा कर लेते हैं, पर ऐसा नहीं है. सर्च कमांड में सबसे ऊपर न्यूज़ इसलिए होता है क्योंकि उसे सबसे अधिक बार पढ़ा गया. इसलिए जो न्यूज़ आये, उसे टेस्ट करने के लिए जरुरी है कि पैराग्राफ का एक दो सेंटेंस कॉपी करके डबल quote में  गूगल सर्च में पेस्ट किया जाए.

दूसरा तरीका ये है कि अगर उदाहरण के लिए न्यूज़ हिंदुस्तान टाइम्स के नाम से आया है, तो सेंटेंस को कॉपी करके “site:hindustantimes.com” SENTENCE गूगल सर्च में डाला जाए.

इसके अलावा और फ़िल्टर लगाईये न्यूज़ को चेक करने के लिए. की वर्ड्स डालिए. जैसे उदाहरण के लिए, site:thehindu.com” parliamentary democracy

इतने पर मत रुकिए. कस्टमाइज कीजिये डेट को. इससे पता चलेगा कि जिस समय का समाचार होने का दावा किया जा रहा है, उस समय का है या नहीं?

इस तरह किसी न्यूज़ को तीन फ़िल्टर से गुजारिये, ताकि उस न्यूज़ को सत्यापित किया जा सके:

  1. Double Quote
  2. Site
  3. Date

कई उदाहरण दिए हाल में सोशल मीडिया पर वायरल हुए फेक फोटोज के:

प्रोफ़ेसर उमेश आर्य ने हाल में सोशल मीडिया पर वायरल हुए कई तस्वीरों का जिक्र किया, जो वास्तव में फेक थे:

  1. गांधी और बचपन के दलाई लामा ( लन्दन में की साथ में तस्वीर)
  2. गांधी की एक युवती के साथ नाक सटाई तस्वीर,
  3. डांसर्स के साथ नेहरु की तस्वीर
  4. कांग्रेस के अरशद चिस्ती के द्वारा शेयर की गयी मोदी और हाफ़िज़ सईद की हाथ मिलाते हुए तस्वीर.
  5. एक तस्वीर जिसमे मोदी बीच में कुर्सी पर तने बैठे हुए हैं और अगल बगल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और अन्य विश्व नेता.
  6. बालाकोट एयर स्ट्राइक में 300 लाशें. ( हकीक़त में वो तस्वीर सीरिया की 2016 की निकली)
  7. पश्चिम बंगाल में जुलाई 2017 में बसीर हाट दंगों में एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमे एक महिला की साडी खिंची जा रही थी ( जो कि वास्तव में भोजपुरी फिल्म “औरत खिलौना नहीं” से सीन था)
  8. केरल के एक विधायक की कार पर पाकिस्तानी झंडा दिखाया गया ( जो कि वास्तव् में इस्लामी झंडा था)

तस्वीरों/ विडियो  की सत्यता को भी स्थापित करना चाहिए. 

प्रोफेसर उमेश आर्य ने बताया कि व्हात्सप्प पर हमें कितनी ही तस्वीरें मिलती हैं. और हम अनजाने में इसे फॉरवर्ड कर देते हैं बिना जांचे परखे कि इन तस्वीरों के पीछे की हकीक़त क्या है. उन्होंने बताया कि गूगल क्रोम में रिवर्स इमेज सर्च को एक्सटेंशन के रूप में ऐड कर लें. फिर तस्वीरों को उनकी सत्यता के लिए सर्च करना चाहिए.

फेक वीडियोज को भी पहचाने जाने की जरुरत है फॉरवर्ड करने से पहले. हाल के समय में मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ी हैं और इन अमानवीय घटनाओं में फेक वीडियोज की बड़ी निर्णायक भूमिका रही है.  इसके लिए एक सॉफ्टवेर का इस्तेमाल करना चाहिए.

Invid EU Chrome Download

विडियो से एक तस्वीर लें फिर रिवर्स इमेज सर्च करें.

उन्होंने कॉमन सेंस पर काफी जोर दिया. विडियो को चेक करते समय उच्चारण, चेहरे के हाव भाव, बैकग्राउंड में चीजें, आदि सभी चीजों पर गौर फरमाएं. ऐसे में टूल्स की जरुरत कम ही पड़ेगी. इसके अलावा विडियो पर आये कमेंट्स भी पढ़ें. कमेंट्स भी कई बार फेक वीडियोज की पोल खोल देते हैं.

उन्होंने एक विडियो दिखाया जिसे व्हात्सप्प पर पेश किया गया कि लड़की को बंगलौर में छेड़ा गया था, पर वास्तव में वो विडियो मलेशिया का था.

उन्होंने स्क्रीन शॉट के द्वारा भी फेक न्यूज़ फैलाने पर अपनी चिंता जाहिर की. उन्होंने राहुल गाँधी के ऑफिसियल ट्वीटर अकाउंट को खोला और उसमे कंटेंट को चंगे करके दिखाया और फिर उसका स्क्रीन शॉट लिया. उन्होंने बताया कि क्या अब भी आप स्क्रीनशॉट पर यकीं करेंगे? मैंने जिस तरह किया, इससे ऑफिसियल ट्वीट में बदलाव नहीं आयेगा, पर आम लोग नहीं जानते और अफवाह फैलाने वाले आम लोगों की जानकारी की कमी का फायदा उठाते हैं.

डिजिटल सिक्यूरिटी और यू ट्यूब के मुद्दे:

इसके अलावा उन्होंने डिजिटल सिक्यूरिटी और यूट्यूब के मुद्दे भी उठाये. उन्होंने बताया कि आने वाला वक़्त यूट्यूब का है. फिलहाल भारत में हर महीने औसतन 25 करोड़ एक्टिव यूजर हैं. जिनकी संख्या निकट भविष्य में बहुत तेजी से बढ़ेगी.

उन्होंने कुछ लिंक्स भी शेयर किये, जिन पर जाकर और जानकारी जुटाई जा सकती है:

g.co/newstraining

उन्होंने जानकारी दी कि अगर आपके न्यूज़ साईट पर अटैक्स हो रहे हैं, तो आप इस निचे दिए गये लिंक पर जाकर अपने साईट को रजिस्टर करें.

apply now: g.co/shield

गूगल के एक दिवसीय वर्कशॉप में चार गेम्स भी खेले गये, जिसका प्रतिभागियों ने पूरा लुत्फ़ उठाया. शाम के 5 बजे वर्कशॉप समाप्त हुआ.


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