आज के वैश्वीकरण की दुनिया में ताजपुर तेजी से कस्बा से शहर बनने की और अग्रसर है !!

Balendushekhar Mangalmurty
आज मधुकर दादा से मिला. काफी समय हो गए थे. घर से निकलने के लिए तैयार हुआ तो गाडी का पहिया पंक्चर निकला. रोड ब्लॉक कर रखा था, तो दूसरी गाडी नहीं निकाल सका. रस्ते में कल डीजे प्रोग्राम का 100 किलो का बाजा, चौकी सब हटाया. पर किस काम का?
 
मुसरीघरारी जाना था. ताजपुर से दस किमी की दूरी पर था. सोचा ऑटो पकड़ लूंगा. बस स्टैंड पहुंचा, तो न बस आ रही थी, न कोई ऑटो जाता दिख रहा था. सारे ऑटो वाले स्टैंड में रूककर आराम फरमाने में लगे थे. ऑटो का इन्तजार करते करते मेरी नज़र सामने LIC के सॅटॅलाइट ऑफिस पर गयी. “अच्छा, नया खुला है. ” मन में ख्याल आया. ताजपुर बदल रहा है. 1992 में जिस ताजपुर को छोड़कर मैं निकला था, वो ताजपुर बहुत बदल गया है. अपना ताजपुर तेजी से बिजनस हब के रूप में बदल रहा है.
देर से एक ऑटो आया. होली की खुमारी से अभी लोग नहीं निकले हैं. मै बैठ गया. ऑटो हाईवे पर चलने लगा. मजा आ रहा था. अभी तक ऑटो में शहर के अंदर बैठा था, पर हाईवे पर मार्च में जाते बसंत की खुमारी में हवा खाते हुए चलना एक अलग सुख की अनुभूति करवा रहा था. उर्दू शब्द “अलहदा” एक बार फिर,आज सुबह से दूसरी बार मन में उमड़ा। 10 किलोमीटर और 15 रूपये. बहुत खूब. अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करना चाहिए. बस समय पर अपना कण्ट्रोल नहीं रहता. यही दिक्कत है पब्लिक ट्रांसपोर्ट में. लोग दिन प्रतिदिन बिजी होते जा रहे हैं और। … ऐसे मंप ही लोग प्राइवेट ट्रांसपोर्ट की और मुड़ते हैं.
 
हाईवे की क्वालिटी अच्छी थी. रोड देखकर मन में ख्याल आ रहा था कि अगर लखनऊ के के लिए निकलूं, तो बस ढाबे पर चाय पीते हुए खाते हुए 10 घंटे में लखनऊ निकला जा सकता है. रोड पर divider नहीं है. रात में कई बार गाड़ियां आमने सामने आ जाती हैं. सुरक्षा के मानकों के प्रति हम कितने लापरवाह हो जाते हैं. कुछ नहीं तो कम से कम रिफ्लेक्टर तो जरूर लगाना चाहिए. हाईवे एक्सीडेंट्स पर कुछ कण्ट्रोल अवश्य होगा. मिनिमम कॉस्ट में.
 
ऑटो में बैठे बैठे ताजपुर के बाहर मोतीपुर सब्जी मंडी पर नज़र गयी. खाली खाली था. सब्जी मंडी में बहुत चहल पहल रहती है. सुबह मे आईये तो देखिएगा कि लोग अपने घर के लिए ४-५ किलो सब्ज़ी, फल खरीदने पहुंचे हुए हैं. पर इससे ज्यादा बड़ी बात. टाटा के मिनी ट्रक्स में सब्ज़ियां लदी जा रही हैं और पटना, मुजफ्फरपुर, बेगूसराय और अन्य सुदूर जिलों में सब्ज़ियां पहुचायी जा रही हैं. ताजपुर समस्तीपुर के समृद्ध इलाकों में गिना जाता है. ताजपुर के आसपास के इलाके में बड़े पैमाने पर सब्ज़ी उपजायी जाती है. किसान मेहनती हैं, मौसम सही है, जमीन उपजाऊ है और मैदानी इलाका है, रोड की स्थिति अच्छी है. तो दूर तक सब्ज़ियां जा रही हैं. इसी इलाके में राजेंद्र कृषि विश्विद्यालय पूसा है. जो आसपास के इलाकों में खेती के विकास में कर्णधार की भूमिका निभा रहा है.
20 मिनट में मुसरीघरारी पहुंच गया. थोड़ा पैदल चला. चौराहे की एक दूकान पर दादा बैठे हुए थे. बेंच पर. मोबाइल पर झुके हुए. अपनी नतिनी से वीडियो कालिंग में व्यस्त. दोनों मिलकर बहुत प्रसन्न हुए. एक घंटे हमने बातें की. चाय पी. फिर मै वहां से निकल आया. मन में ये ख्याल लिए कि महीने में एक बार ताजपुर जरूर आऊं. एक रेस है समय के खिलाफ. रेत की तरह मुट्ठी से फिसल रहा है वक़्त. मां को बार बार कहता हूँ: मां एकदम स्वस्थ रहो. सौ साल जियो.
ऑटो में बैठकर मन फिर ताजपुर के बारे में सोचने लगा. हॉस्पिटल चौक पर भीड़ देखी थी. काफी गाड़ियां हो गयी हैं. ताजपुर में. वक़्त कितना बदल गया है. एक समय था जब पिताजी ने छोटा सा घर बनाया था, तो पूसा जाने वाली सड़क सुनसान हुआ करती थी. एकाध ट्रक कभी कभी गुजरा करता था. लोगों के पास गाड़ियां नहीं हुआ करती थीं. सड़क एक बार बनी तो कई सालों तक ठीक रहती थी. गाड़ियां ही कम चलती थीं तो टूट फुट क्या होती !!
 
एक छोटा सा मस्जिद हुआ करता था. उससे सुबह शाम सुरीली अजान आयी करती थी. मौलवी साहब से हम बच्चे परिचित थे. इधर थाना चौक पर हनुमान मंदिर से घंटी, प्रार्थना की आवाज. सुबह सुबह आरएसएस की शाखा लगती थी, मै जाया करता था. खास अवसरों पर मुढ़ी, घुघनी खाने को मिलता था. व्यायाम हुआ करते थे. बाद में जाना छोड़ दिया. फिर कभी नहीं गया.
 
मस्जिद अब बड़ी बन गयी है. कई लाऊड स्पीकर्स लग गए हैं. यहाँ से काफी लोग गल्फ कन्ट्रीज में काम करने गए हैं. फंड्स आये तो मस्जिद का नव निर्माण हुआ है. यहाँ बाजार के पीछे एक गुरुद्वारा भी हुआ करता था, वो अभी भी है. बचपन में यहाँ एक दो बार घी से तर हलवा खाया था. बचपन में कई सिख परिवार ताजपुर में रहा करते थे यहाँ. उनसे अच्छी जान पहचान थी. बाद में सब अपना बिजनस समेट कर पंजाब चले गए. गुरुद्वारा की देखभाल कमजोर हो गयी. अब जीर्ण शीर्ण हालत में है.
 
ताजपुर एक विकसित कस्बा है. सड़क है, बिजली है, यहाँ हाई स्कूल है, कॉलेज है. यहाँ के हाई स्कूल में मेरे समय भी 12-13 किलोमीटर दूर से विद्यार्थी पढ़ने आते थे. आज स्कूल में विद्यार्थियों की संख्या बहुत बढ़ गयी है. लड़के लड़कियों के लिए अलग अलग शिफ्ट में स्कूल चलता है. इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्रेशर है, जबरदस्त.
हाईवे पर ऑटो अपनी रफ़्तार में चल रहा था. ताजपुर हाईवे पर स्थित है. एक तरफ मुज़फ़्फ़रपुर, दूसरी ओर बेगुसराई. एक तरफ चलते चले जाओ तो नेपाल पहुँच जाओ. दूसरी तरफ चले चलो, तो कोलकाता पहुँच जाओ. फिर पटना भी ज्यादा दूर नहीं. महज 70 किमी.
पर ताजपुर में रेलवे स्टेशन नहीं है. एक है 7 किमी दूर कर्पूरी ग्राम में. इसका इस्तेमाल मुख्यतः माल ढुलाई के लिए होता है. नगण्य संख्या में लोग आवाजाही के लिए इस्तेमाल करते हैं. मैन रूट में नहीं है. स्टेशन मैन रोड से बहुत दूर है. कनेक्टिविटी पुअर है. ताजपुर बाजार मुख्यतः रोड ट्रांसपोर्ट पर निर्भर करता है, हालाँकि बल्क कमोडिटी जैसे गिट्टी तो कर्पूरी ग्राम में गिरता है. गेहूं, सीमेंट आदि भी यहाँ और साथ ही पूसा रोड स्टेशन से होते हुए. काफी लम्बे समय से ताजपुर को हाजीपुर से जोड़ने वाली रेलवे लाइन की मांग की जा रही है. जाने कब पूरा होगा. ताजपुर का इलाका बेहद डेन्स है. जमीन अधिग्रहण में मामला उलझ कर न रह जाये. फिलहाल मांग जारी है.
 
ताजपुर में पैसे आये हैं. दिखता है. पर ईटिंग आउट और मनोरंजन के साधन उस तरह नहीं बढ़े हैं. युवा अधिक संख्या में लिट्टी, कचौड़ी जलेबी तो खा रहे हैं, पर हाईवे पर दो ही रेस्टोरेंट हैं. उनमे बढ़ोत्तरी नहीं हुई. हालाँकि वे कस्टमर हाईवे ट्रैवेलर्स से भी ले सकते थे. ऐसे में उत्साही युवा समस्तीपुर भी चले जाते हैं. ईटिंग आउट के लिए. सिनेमा हॉल की दुर्दशा है. ॐ टाकीज बहुत पुराना है. याद है मुझे बचपन में पिताजी, माँ, भाइयों और कभी चचा जी के साथ गाय और गोरी, बाबाधाम, धर्मकांटा, शहंशाह, कर्मा, नागिन ( तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना) काफी सारी फ़िल्में देखी हैं. महावीर टाकीज बंद हो गया है. लोग समस्तीपुर चले जाते हैं फिल्म देखने के लिए.
सोचते सोचते मैं बस स्टैंड से आगे बढ़ आया. खैर चौक पर उतरा. फिर वहां से पैदल ही चल पड़ा. धुप में गर्मी काफी थी. बाज़ार भीड़ भाड़ वाला हो गया है. हॉस्पिटल कैंपस में चार मंजिला भवन बन रहा है.
 
ताजपुर में हिन्दू मुस्लिम लगभग 60-40 के रेश्यो में हैं. बाज़ार में भी यही रेश्यो दिखता है. ताजपुर कुल मिलाकर शांत इलाका कह सकते हैं, हालाँकि शरारती तत्व दोनों समुदाय में यहाँ मौजूद हैं, जो रह रह कर शांति भंग करने की कोशिश करते हैं. पर दोनों समुदाय के सीनियर सिटीजन् और पुलिस की चाकचौबन्दी से शांति बनी हुई है.
 
इधर कॉलेज के मैदान में काफी युवा दौड़ते हैं. आर्मी, पारा मिलिट्री फोर्सेज में जाने का लक्ष्य लिए. ताजपुर में हाल फिलहाल में रोजगार का ये नया सेक्टर बनकर उभरा है.
ताजपुर की सीमा पर मोतीपुर से सटे एक छोटी सी नदी बहा करती थी. पर अब सूख गयी है. लोगों ने और प्रशासन की बेरुखी ने इसे मार दिया है. कई लोगों ने तो एन्क्रोचमेंट करते हुए इसकी पेटी में घर बना लिया है.
ताजपुर अपना है. यहाँ घर है, जान पहचान के लोग हैं, बचपन की यादें हैं. ताजपुर तरक्की कर रहा है. इंटरनेट, बढ़ता बिजनस, ताजपुर के लोगों की बढ़ती मोबिलिटी, समाज के नीचे तबके के युवकों का भी दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, बंगलोर आदि की तरफ मूवमेंट ( सिर्फ रोजगार के लिए नहीं, बल्कि पढ़ने के लिए भी) के चलते ताजपुर तेजी से बाहरी दुनिया से जुड़ रहा है.
आज के वैश्वीकरण की दुनिया में ताजपुर तेजी से कस्बा से शहर बनने की और अग्रसर है.
 
ताजपुर के बारे में जितना सोचूं कम है, पर पैदल चलता हुआ राजधानी रोड, हॉस्पिटल चौक, फिर थाना चौक होता हुआ मै घर पहुँच चुका था. विचारों श्रृंखला बाधित हुई. फिलहाल अपने ताजपुर के बारे में फिर कभी.

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