जब आपदा धन उगाही का अनैतिक तरीका बन जाए और फिर आपदा के बने रहने में फायदा नज़र आने लगे…

Dinesh Mishra

मुजफ्फरपुर-सीतामढ़ी राष्ट्रीय राज मार्ग संख्या -77 सीतामढ़ी की जीवन रेखा है. इस सड़क के माध्यम से शिवहर का भी राजधानी पटना से संपर्क बनता है. इन दोनों शहरों के ठीक बीचो-बीच बागमती नदी इस सड़क को पार करती है. आज से कोई 20 साल पहले यहाँ बागमती नदी पर कोई पक्का और मजबूत और बारहमासी पुल नहीं था. जैसा भी पुल था उसकी अप्रोच रोड को अक्सर बरसात में नदी बहा ले जाती थी. यहाँ पुल का एक डाइवर्शन था जिसकी अप्रोच रोड के किनारे पर ईंट तथा झामा और मिटटी-बालू डाल कर उसे काम चलाऊ बना दिया जाता था. इस व्यवस्था में गाड़ियां तो इस पार से उस पार नहीं जा पाती थीं मगर पैदल यात्री आना-जाना कर सकते थे.1998 की बात है जब बरसात के मौसम में आई बाढ़ में अप्रोच रोड और पुल के बीच का कुछ हिस्सा बह गया जिससे नदी के दाहिने किनारे पर कटौन्झा और बायें किनारे पर भनसपट्टी के बीच में गाड़ियों और बसों का आना-जाना थम गया.

आसपास के कुछ लोगों ने इन गाँवों में बांस की चचरी लगा कर रास्ता बना दिया और दोनों तरफ से यात्रियों को पैदल पार करवाना शुरू कर दिया और इस सेवा के बदले में रुपया–दो रुपया नदी की पार कराई लेने लगे. उससे उनकी कुछ आमदनी होने लगी. समाज सेवा की शक्ल में शुरू किया गया यह काम धीरे-धीरे वसूली में बदलने लगा. इस आमदनी को देख कर भनसपट्टी से ले कर पितौंझिया तक के ग्रामीणों को भी कुछ कमाई कर लेने की सूझी और उन लोगों ने खस्ता हाल सड़क को मेहनत कर के काटा और वहाँ चचरी पुल बना कर वह भी यात्रियों से पैसा वसूलने लगे. इस तरह से जितनी चचरी पर से यात्री गुज़रेगा उतनी बार उसे चचरी बनाने वाले को पैसा देना पड़ेगा और अगर उसके पास सामान है तो उसका पैसा अलग से लगेगा. कमाई के इस तरीके का जब सीतामढ़ी जिला प्रशासन को पता लगा तब उसने वहाँ पुलिस की व्यवस्था कर दी. पुलिस ने यात्रियों की तरफदारी न कर के चचरी पुल बनाने वालों का साथ दिया और अपने लिए नेग का इंतजाम कर लिया. ऐसे में पार कराने का रेट बढ़ना ही था और इस तरह से यात्रियों को अब पहले से ज्यादा पैसा देना पड़ता था.

वह लोग जो आपदा प्रबंधन का जिम्मा लेते हैं उन्हें क्या यह सब बातें मालूम हैं?जो आपदा प्रबंधन की बात करते हैं या उसका जिम्मा लेते हैं उन्हें लूट-पाट की इन बारीकियों के बारे में पता है?मेरा मानना है की आपदा प्रबंधन की बारीकियां कुछ लोग विशेषज्ञों से बेहतर समझते हैं और वह इन आपदाओं को अपने हक़ में अवसर के तौर पर बदल सकते हैं और बदल भी लेते हैं. बुज़ुर्ग कहते हैं कि गिद्ध बहुत दूर तक देख सकता है जो सच है पर गलत यह भी नहीं है कि वह केवल लाशें देख सकता है.

दिनेश मिश्र ने बिहार में बाढ़ नियंत्रण, land reclamation पर दशकों काम किया है.


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.