जब सारे नियम कानूनों को ताक पर रखकर अंग्रेज़ों ने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी…

मुकुटधारी अग्रवाल

23 मार्च, 1931 ई को संध्या 7 बजकर 33 मिनट पर लाहोर के सेंट्रल जेल मे सरदार भगत सिंह ,सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी.  जिस समय  भगत सिंह को फांसी हुई ,उस समय उनकी आयु मात्र साढ़े 23 वर्ष थी.  अपने मात्र 7 वर्ष के अल्पकालीन जीवन में क्रांतिकारी कार्यकर्ता, संगठनकर्मी ,चिंतक और सिद्ध लेखक के रूप मे सरदार भगत सिंह ने जो भूमिका निभाई और जिस शान के साथ वे फांसी के तख्ते पर झूल गए , उसकी मिसाल भारत मे ही नहीं , दुनिया के किसी देश मे अन्यत्र नहीं मिलती है.

भगत सिंह की लोकप्रियता का जिक्र करते हुये कॉंग्रेस के इतिहास के लेखक एवं कॉंग्रेस के बड़े नेता पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक मे लिखा है कि भगत सिंह की प्रसिद्धि महात्मा गांधी के बराबर जा पहुंची थी. यही कारण था कि उनकी लोकप्रियता से घबड़ायी ब्रिटिश सरकार ने फांसी के नियमो का उलंघन करते हुये 24 मार्च की सुबह की जगह 23 मार्च की संध्या मे ही तीनों को फांसी दे दी जबकि जेल मेनुयल मे सूर्यास्त के बाद फांसी देने पर रोक है.

शहीद ए आज़म भगत सिंह की भतीजी वीरेंद्र सिंधु ने अपनी पुस्तक “भगत सिंह के पत्र और दस्तावेज “ पुस्तक मे लिखा है कि एक जेल बार्डर ने भगत सिंह की जीवन के अंतिम क्षणो का वर्णन उनसे इस प्रकार किया था –‘ वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे जिसे उनके वकील प्राणनाथ ने दिया था.  उन्होने कुछ ही पन्ने पढे थे कि कोठरी का दरवाज़ा खुला और जेल का अफसर अपनी रोबीली वर्दी मे अंदर आया और बोला –सरदारजी , आपकी फांसी का हुक्म है. तैयार हो जाइए.  सरदार के बाएँ हाथ मे किताब थी.  किताब पर से बिना नज़र हटाये उन्होने अपना बायाँ हाथ बढ़ा दिया और बोले –‘रुक जाइए ,अभी एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है. ”  कुछ लाइन पढ़ने के बाद उहोने किताब बंद कर दी और बोले –आइये चलें.

कुछ इस प्रकार का दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू सरदार भगत सिंह से मिलने लाहोर जेल मे नहीं गए थे. मेरी कहानी ‘पुस्तक मे नेहरू जी ने भगत सिह से अपने मिलने का जिक्र करते हुये लिखा है कि भगत सिंह के साथ मेरी पहली मुलाक़ात थी.  भगत सिंह का चेहरा आकर्षक था और उसमे बुद्धिमता टपकती थी , वह निहायत शांत और गंभीर था.  उसकी दृष्टि और बातचीत मे काफी सुजनता थी.

गांधीजी पर कुछ लोगो द्वारा ऐसे आरोप लगाए जाते रहे कि उन्होने सरदार और उनके दोनों साथियो को फांसी से बचाने की दिशा मे कोई पहल नही की थी.  इसी सदर्भ मे “कांग्रेस का इतिहास “के लेखक पट्टाभि सीतारमैया ने अपनी पुस्तक मे लिखा है कि गांधी इरविन सम्झौता के दौरान सरदार भगत सिंह ,राजगुरु और सुख्देव की फांसी की सजा किसी अन्य सजा के रूप मे तब्दील करने के बारे मे गांधीजी और लार्ड इरविन के बीच बार –बार लंबी वार्ता हुई लेकिन लार्ड इरविन ने कोई वादा नहीं किया.

23 मार्च 1931 को संध्या न केवल इन तीनों क्रांतिकारिओ को नियम की अवहेलना कर फांसी दे गई बल्कि चोरी –छिपे उनका दाह संस्कार सतलज नदी के किनारे कर दिया गया. जेल के अधिकारियों ने जेल की पीछे की दीवाल में छेद किया और फिर वहां से तीनों शहीदों के शव को लेकर निकल गए. वहां से अंधेरे का फायदा उठाते हुए फ़िरोज़पुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित गंडा सिंह वाला गांव में लाश को जला दिया और फिर अधजली लाशों को सतलज नदी में फेंक दिया. अगली सुबह नज़दीक के गांव वालों को पूरी घटना की जानकारी हुई. उन्होंने शहीदों की अधजली लाशों को नदी से निकाला और फिर हुसैनीवाला में जहाँ आज तीनों शहीदों की समाधि बनी हुई है, वहां पर पुरे सम्मान के साथ दाह संस्कार किया.  सारा देश शोकाकुल हो उठा.

हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीदी स्मारक

भारत सरकार ने 1968 में शहीदे आज़म और उनकी साथियों की याद में भारत पाकिस्तान के बॉर्डर के 1 किलोमीटर के अंदर हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीदी स्मारक बनाया. यहीं पर तीनों शहीदों का अंतिम संस्कार हुआ था. यही 1965 में बटुकेश्वर दत्त का भी अंतिम संस्कार हुआ था. बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा थी कि उनकी समाधि उनके साथियों की समाधि के समीप बनायी जाए. यहीं भगत सिंह की माता का देहांत होने के बाद उनका अंतिम संस्कार किया गया.
समाधि स्थल दरअसल आज़ादी और देश के विभाजन के बाद पकिस्तान में चला गया था, पर पाकिस्तान को फाजिल्का के पास के 12 गांव के बदले भारत को समाधी स्थल लौटा दिया गया. 23 मार्च को समाधि स्थल पर शहीदी मेला लगता है हर साल. इतना ही नहीं,वाघा बॉर्डर की तर्ज पर रोजाना झंडा उतारने का कार्यक्रम भारतीय और पाकिस्तानी फौजों के द्वारा मिल कर किया जाता है.

आइये ,हम उन शहीदो को अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि दे !!


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