क्या राष्ट्रीय चुनाव सिर्फ राष्ट्रीय मसले रहते हैं? विजय रुपानी के विवादस्पद बयान के सन्दर्भ में

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

आज भाजपा नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ने एक बार फिर भाजपा और संघ के अजेंडे पर काम करते हुए विवादस्पद बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस जीतेगी तो पाकिस्तान में दिवाली मनाई जायेगी. उनकी बातों में एक तो उनके मन का भय जाहिर हो रहा था, पर मुख्य मुद्दा ये नहीं कि मोदी फिर से सत्ता वापसी करेंगे या नहीं, मुख्य मुद्दा ये है कि विजय रुपानी जो बोल रहे हैं, उसमे कितनी सच्चाई है.

और अगर सच्चाई है, तो फिर क्या चीजों को उसी तरह ली जाय, जिस तरह से विजय रुपानी चाहते हैं. मुझे याद है कि जब अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प जीते थे, तो भारत में भक्तों ने काफी ख़ुशी जाहिर की थी. हालाँकि हिलेरी क्लिंटन ने उस समय इस तरह से दुष्प्रचार किया था कि अगर ट्रम्प जीत जाएंगे तो भारत में दक्षिण पंथी खुशियां मनाएंगे, या पटाखे फोड़ेंगे.

सच्चाई ये है कि आज की वैश्विक दुनिया में हर देश अपना हित देखता है. जब बांग्लादेश में चुनाव होते हैं, तो हम शेख हसीना की जीत का स्वागत करते हैं, उन्हें और उनकी पार्टी को प्रो इंडिया माना जाता है. उनकी राजनीतिक विरोधी बेगम खालिदा जिया और उनकी समर्थक कट्टर इस्लामिक पार्टियां बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ विष वामन करते हैं इस मसले को लेकर. खालिदा जिया को पाकिस्तान समर्थक माना जाता है.

80 के दशक में जनरल जिया के दौर में भारत पाकिस्तान के सम्बन्ध बेहद कटु हो चले थे. जब जनरल जिया की विमान दुर्घटना में मौत के बाद बेनजीर भुट्टों पाकिस्तान की युवा प्रधानमंत्री बनी थीं, तो ऑक्सफ़ोर्ड एडुकेटेड युवा प्रधान मंत्री को लेकर भारत में भी शांति की उम्मीद जगी थी और भारत में बेनज़ीर भुट्टो के प्रधानमंत्री बनने का स्वागत किया गया था.

दरअसल आज के दौर में किसी देश के राष्ट्रिय चुनाव महज राष्ट्रिय मुद्दे नहीं रह गए हैं. दक्षिण एशिया में नेपाल में कम्युनिस्ट पावर में आ रहे हैं, कांग्रेसी आ रहे हैं या राजतन्त्र समर्थक सत्ता में वापसी करेंगे, इस पर भारत का राष्ट्रिय नेतृत्व अवश्य नज़र रखता है. प्रचंड के सत्ता में आने पर चीन और भारत की नेपाल में उपस्थिति पर क्या असर होगा, ये तो विदेश नीति का आवश्यक हिस्सा है.

दक्षिण एशिया में आज जरुरत है यूरोपियन यूनियन से सबक लेते हुए सार्क देशों के बीच विश्वास बहाली, आतंकवाद पर नियंत्रण, व्यापार, शिक्षा, टूरिज्म, मेडिकल सेक्टर, पर्यावरण सुरक्षा आदि तमाम मुद्दों पर एकजुटता दिखाने का. दक्षिण एशियाई देश मानव विकास सूचकांक के कई सूचकों पर अफ्रीकी देशों से भी पिछड़े हुए हैं और धरती के इस हिस्से पर मानव जनसंख्या का अत्यधिक दबाब है. यहाँ विकास की न केवल अत्यधिक सम्भावना है, बल्कि जरुरत भी है.

ऐसे में विजय रुपानी जैसे नेता सीधे सुलझे हुए मसलों को जान मानस में घृणा फैलाने की कोशिश में तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं. इस तरह के राजनीतिक व्यवहार की निंदा होनी चाहिए.


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