तुम्हें चाहना हृदय में नागफनी के फूल उगाने जैसा: पढ़िए अनामिका सिंह की कवितायेँ

अनामिका सिंह मूलतः भागलपुर की रहने वाली हैं. उन्होंने जीवन के विभिन्न रंगों पर कवितायेँ लिखी हैं. उनकी कविताओं में प्रेम, दर्द, विरह, ईर्ष्या हर भाव पर गहराई से लेखन दिखता है.

अपने अक्स से घबराते हैं लोग
आईने से इस क़दर कतराते हैं लोग !!

 

  1. आत्ममुग्धा
    —————-

घने काले धुँए में
सत्य खोया है

भ्रम के कोहरे से
अंबर भरा है

चट्टानों के नीचे सूरज की लाश
दबी है

झूठ की बूँदें
धरती पर बरसी है

दुनिया की नदियों में
विष भरा है

लोगों से पसीने से
नमक चू रहा है

मित्रता की रीढ़ में
खंजर फंसा है

इंसानों की खाल पर
लिप्सा पुति है

कवि के ख़्यालो में
काँटा चुभा है

कवयित्री ने जूड़े में
झूठ खोंसा है

अलसाई कविता अब
ऊँघ रही है

इन दृश्यों पर आत्ममुग्धा गर्विता की हँसी
व्यंग्य कसती है !

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2. एक निर्दय किस्म के कवि हो
तुम

कलाकार नहीं हो
किसी किरदार की गुलामी नहीं कर सकते

तुम्हें प्रेम हो सकता है
कई बार
अपनी हर कविता से पूर्व

तुम शिकार कर सकते हो
शिकारी नहीं हो सकते
परिंदे से तुम्हारा मोह रहेगा तबतक
जबतक तुम्हारी कविता अधूरी है

तुम शराब पीते हो
पीकर बहक नहीं सकते
शराब का मतलब खराब करने से
मतलब है तुम्हें

जख़्म की ओर ध्यान देने से
बीमारी शरीर में बैठ जाया करती हैं
तुम्हारा यही मानना है

नींद में नींद प्रिय है तुम्हें
सपनों में सपना देखने की अभ्यस्त हैं
तुम्हारी आँखें

तुम कवि हो !!

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3.स्त्री 

स्त्री तुम जी सकती हो
बिन पर्दा , बिंदास
आत्मा की आँख खुली रखो
मन की जकड़न धरती को सौंप दो
किसी का यकीन न करो
सिवाए खुद के

रम सकती हो तुम
जीवन के हर रास रंग संग
बस रंगों के संयोजन में कोई विरोधाभास न हो
धुलने न देना अपना रंग
मौसम से बेख़बर
चाहे कितने मौसमों की बारिश में भीगो
स्मिता का रेनकोट सम्भाले रखना

गर जीवन का उद्देश्य है अानंद
बन जाओ कोई छोटा बच्चा
जो समुद्र की लहरों से खेलता
किनारे पर सीप और रंगीन पत्थर इकठ्ठा कर आनंदित होता है
क्या बता सकोगी इसके पीछे क्या उद्देश्य है?

यह वर्जित है
वर्जित शब्द में गज़ब की कशिश होती है
क्या है तुम्हारी वर्जना ?
यह तुम्हें तय करना है
अगर ज़िन्दगी को बेपर्दा जीना है !!

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4. कोई जाकर भी थोड़ा रह जाता है !!

कोई जाकर भी थोड़ा रह जाता है

जैसे पहली बारिश हवा में
मिट्टी की सौंधी महक घोल आती है

जैसे रात की थोड़ी चाँदनी
भोर की पहली किरण से लिपटी होती है

जैसे घास के गुच्छे में
ओस की बूँदें उलझी होती है

जैसे शाम की गोधूलि में
दिन का आलस समाया होता है

जानेवाला कई जगहों पर
थोड़ा थोड़ा खुद को छोड़ आता है !

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5. यात्रा
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कुछ यात्राओं की कोई मंजिल नहीं होती
सफ़र की कशिश से लोग यात्रा में शामिल होते हैं

यात्रा अपने यथास्थितिवाद से विद्रोह है
यह मनुष्य मात्र का स्थानांतरण नहीं है
अपितु खुद को जानने समझने की प्रक्रिया और कई कथासूत्रों का वाहक है

बेमक़्सद आरम्भ किए सफ़र
भ्रमाते और थकाते हैं
निरूद्देश्य भटकन
विषयवस्तु से भटकाता है

यात्रा की मंजिल है
भटकन की कोई मंजिल नहीं
निरूद्देश्य भटकना
अपने से दूर होना

यात्री के जूते पहनकर
कोई यात्री नहीं हो सकता
मुसाफ़िर हो तो मंजिल सुनिश्चित करो
नहीं कर सके तो
अपनी यायावरी में भटकते फिरो !


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