यूपी में आरएसएस का दलित मुस्लिम गठबंधन पर चोट का वही सदियों पुराना द्रोणाचार्य, परशुराम वाला खेल !!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति
मै रह रहकर आरएसएस का साहित्य पढता रहा हूँ, मै इसके संकीर्ण, धुर दक्षिणपंथी विचारों का विरोधी रहा हूँ. जब जब मै इसे पढता हूँ, तो पाता हूँ कि प्रतिक्रियावादी है, एलिटिस्ट है. वही प्राचीन गुरुओं के लकीर पर चलने वाली संस्था: वही परशुराम, द्रोणाचार्य. दोनों की जिद कि इन्ही को शिक्षा देना है. egalitarianism तो बस एक सपना सा लगता है प्राचीन भारत में. वो तो शुक्र है बुद्ध आये, जिन्होंने इस व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठायी. बाद में इस परम्परा को आगे बढ़ाया कबीर, नानक,भक्ति संतों ने दक्षिण, पश्चिम, पूर्वी भारत, उत्तरी भारत हर दिशा में, आंबेडकर, उनसे पहले फुले, उनके समय में दक्षिण में पेरियार ने. इन महान हस्तियों ने देश को प्रगतिशील बनाया.
लिस्ट से जैसा कि जाहिर है इस महान मिशन में हर जाति, हर धर्म, हर सामाजिक तबके के लोग शामिल थे. हम ये नहीं कह सकते कि विचारों की लड़ाई पिछड़ों या दलितों ने ही लड़ी अकेली. ब्राह्मणों ने भी लड़ी. क्षत्रियों ने, वैश्यों ने लड़ी. सबने लड़ी.
 
तो फिर आरएसएस के ब्राह्मण अलग कैसे हैं? वे अलग इसलिए हैं क्योंकि महाराष्ट्र के चित्तपावन ब्राह्मणों की संस्था सिर्फ दलित और पिछड़ा विरोधी नहीं, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और हर उस वैश्य की भी विरोधी है, जो एक इंक्लूसिव इंडिया की संकल्पना लेकर चले. गांधी को गोली मारी गयी, नेहरू को दिन रात गाली दी जाती है, चरित्र हनन किया जाता है, गटर की भाषा का इस्तेमाल किया जाता है. ये आंबेडकर की तरह दलित नहीं थे. ये सवर्ण समाज से आते थे.
 
पर फिर भी निशाने पर रहे. क्योंकि इन्होने आरएसएस के ब्राह्मणवादी, मनुवादी समाज की पुनर्स्थापना के प्रयास की राह में रोड़े अटकाए. ये उस प्राचीन चिंतन के खिलाफ थे कि ब्रह्म ह्त्या सबसे बड़ा पाप है, ये न्याय को मानवीय धरातल पर स्थापित करने वाले लोग थे, जिसमे किसी भी इंसान की ह्त्या गलत है.
 
आरएसएस का लेखन उसके माइंड सेट को पढ़ने समझने के लिए जरुरी है. बचपन में मै आरएसएस की शाखा जा चुका हूँ. उन दिनों बस शाखा में खेल सूझता था. लोग सब आसपास के थे. किसी को मै चाचा कहता, तो कोई मेरे बचपन के दोस्त होते. विचार समझना उन दिनों कहाँ संभव था !!
 
छित्तपावन ब्राह्मणों की स्त्री, दलित, पिछड़ा विरोधी, जाति व्यवस्था को उसकी पवित्रता के साथ पोषित करने की चाह रखने वाली, राष्ट्र की संकीर्ण अवधारणा पेश करने वाली धुर दक्षिण पंथी संस्था आरएसएस अब यूपी में गुल खिला रही है. इसके समर्थन से खड़ी रिसर्च (?) संस्था इंडिया फाउंडेशन, जिसके डायरेक्टर राकेश सिन्हा हैं, ने बंगाल के दलित नेता जोगेंद्र नाथ मंडल के बहाने सपा बसपा गठबंधन को निशाने पर लिया है.
 
आरएसएस के एजेंडा में बढ़चढ़कर भाग ले रहे दलित नेताओं के चिंतन के दिवालियेपन को देखकर मुझे हंसी आती है. शेर का जबड़ा हम बकरियों के लिए अच्छा है, ठंडी छाँह है, यही आईये, ये सन्देश वे आरएसएस के चंगुल से बाहर के दलितों को देते हैं. आंबेडकर को उन्होंने जब्त करने का प्रयास किया है. आंबेडकर को अगर विचारों के साथ जब्त किया जाता, तब तो आरएसएस के अस्तिव्त्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता, तो कुछ नहीं, ऐसा करो. ऑफिस में तस्वीर टांग लो, माला चढ़ा दो. चार बार आंबेडकर की माला फेर दो. और विचार? वो जाय तेल लेने.
 
तो फिलहाल सिन्हा जी का अपनी संस्था के मार्फ़त जोर है कि जोगेंद्रनाथ मंडल ( जो कि बंगाल के दलित नेता थे, नेहरू की 1946 की कैबिनेट में मुस्लिम लीग के एकमात्र हिन्दू नेता थे, पार्टीशन के बाद पाकिस्तान चले गए, वहां की संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष बने, पाकिस्तान के पहले कानून और लेबर मिनिस्टर बने. फिर वहां की ब्यूरोक्रेसी से तंग आकर लियाकत अली खान की मिनिस्ट्री से इस्तीफा देकर 1950 में भारत आ गए. पर भारत में उन्हें राजनीतिक परित्यक्त की जिंदगी गुजारनी पड़ी. 1968 में बंगाल में एक गुमनाम मौत मरे.
 
तो यूपी में बसपा सपा के गठबंधन से सत्ता के हाथ से निकल जाने के भय से घबराये आरएसएस ने सिन्हा जी की संस्था इंडिया फाउंडेशन को कहा, काम करो तुम. हम पैसे की झड़ी बहा देंगे. जोगेंद्र नाथ मंडल के बहाने यूपी में दलित मुस्लिम गठबंधन की संभावना पर चोट करो. दोनों अगर मिल गए, तो फिर हम कहाँ होंगे? इस बार तो दलितों के घर में भोज खाने से भी काम नहीं चलेगा. कुछ नफ़रतीय लिख कर दिखाओ, जिसके हम सदियों से मास्टर रहे हैं. आखिर सारी बुद्धि हम अपने वर्चस्व को बढ़ाने में न लगाए तो क्या भारत को इंक्लूसिव सोसाइटी बनाने में लगाएं?

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