2019 का लोकसभा चुनाव हर दल को आत्म चिंतन करने पर मजबूर करेगा!!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

मिनिमम इनकम काम करके मिलेगा या सीधे एकाउंट में? अगर बिना कुछ किये देना है तो अमाउंट और बढ़ा दिया जाए, देश मे काम करने की नौबत ही न आये। ये कैसा रहेगा? पैसा कहां से आएगा? नोट छापिए और बांटते जाईये। फिलहाल इस बार का चुनाव आज़ाद भारत के इतिहास में रोचक है। गठबंधन ऐसा कि एक पार्टी का उम्मीदवार दूसरी पार्टी से खड़ा हो रहा है। अब ये समझ के परे है कि फिर सीट शेयरिंग का मतलब क्या हुआ? पोलिटिकल साइंस उलट पलट हो रहा है। नए तरीके एनालिसिस के खोजने होंगे। इस अकेले चुनाव ने ये साबित कर दिया।
आज़ाद भारत का सबसे अलग तरीके का चुनाव होने जा रहा। उस पर से सुन रहा हूँ कि कुछ करोड़ वोटर्स के नाम लिस्ट से गायब हैं और इनमें लगभग 80 फीसदी दलित और माइनॉरिटी हैं। पर इस पर बहस नहीं।

उस पर से कई बार evm मशीन के खराब होने की घटनाएं आ जाती हैं। ऐसे में कई वोटर्स वोट डालने के बाद भी अपने उम्मीदवार चुनने के हक़ से वंचित हो जाते हैं।

बिहार में चुनाव और भी रोचक है। वाम दल मंडल आंदोलन से मजबूत हुए दलों के सामने खुद को खड़े पा रहे हैं। बात सिर्फ एक सीट का नहीं, पर वाम दल फिर से उसी सवाल से जूझ रहे हैं, जिससे वे तीन दशक पहले हारे थे। सवाल फिर से मुंह बाए खड़ा है, वर्ग संघर्ष बनाम जाति संघर्ष। और वाम दल में नेतृत्व क्यों ब्रॉड बेस्ड नहीं है। उस समय वे हाशिये पर गए थे, आज भी उनके नेतृत्व में बदलाव नहीं है, इस सवाल पर वे चिंतन नहीं कर रहे। ऐसे में मंडल आंदोलन से सशक्त हुए राजनीतिक दल उनके मंसूबों पर शक जाहिर करते हैं।

अब सवाल है कि बिहार में क्या होगा? मुझे ये देखने मे रुचि है कि बेगूसराय में क्या होता है? एक तरफ है राजद, जिसका अपना वोट बैंक है, कह सकते हैं कि यादव, मुस्लिम, और भी पिछड़ी जातियां राजद के साथ हैं। कांग्रेस, हम, रालोसपा, के साथ होने से एक formidable combination बन गया है। इस बार पिछली बार की तुलना में राजद को ज्यादा वोट मिलने की संभावना है, तो दूसरी ओर भाजपा के गिरिराज सिंह हैं। ये अजीब सी स्थिति है कि आखिर गिरिराज सिंह बेगूसराय से लड़ने को नाराज बताए जा रहे हैं। भला क्यों? आखिर हम पहले से जान रहे थे कि उन्हें नवादा से बेगूसराय भेजा जाएगा। पिछले चुनाव में वे नवादा नहीं जाना चाह रहे थे और बेगूसराय से लड़ना चाह रहे थे। अंत मे गए। मोदी लहर में जीते।

गिरिराज सिंह अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं और अपने विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की पैरवी वे लगातार करते रहे हैं। भाजपा और वे दोनों जानते हैं कि वे नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांगेंगे। और वाम उम्मीदवार कन्हैया कुमार को डिस्क्रेडित करने के लिए वही पुराना शगूफा छोड़ेंगे। बेगूसराय बिहार का लेनिनग्राद कहा जाता है, हालांकि ये मजेदार है कि इसने भोजपुर, गया, जहानाबाद की तरह खूनी संघर्ष नहीं देखा। समृद्ध इलाका रहा है। और भोजपुर, गया के विपरीत बेगूसराय में कम्युनिस्ट नेतृत्व भूमिहार जाति के हाथ मे केंद्रित रहा। अब उन्होंने क्यों नहीं अन्य जातियों को नेतृत्व में शामिल किया, ये सोच और चिंतन का विषय है। सत्ता संघर्ष में जाति शामिल नहीं रही होगी, ये बिहार के राजनीतिक, सामाजिक ताने बाने को देखते हुए मानना थोड़ा मुश्किल है।

तो इसी भूमिहार जाती से वाम उम्मीदवार और भाजपा उम्मीदवार दोनो आते हैं। गिरिराज सिंह जैसे भी उम्मीदवार हों, पर बिहार में वे भूमिहारों के नेताओं में से एक हैं। भाजपा की चुनावी रणनीति हिंदुत्व की है, जिसमे नेतृत्व सवर्ण जातियों के हाथ मे रहे और दलित, पिछड़े इनके वोट बैंक बनें। तो ये मंडल आंदोलन से सशक्त पार्टियों के वोट बैंक की काट खोजने के लिए हिंदुत्व के अम्ब्रेला की बात करते हैं, पर जातिवादी गणित में ये माहिर हैं।

तो भूमिहार वोट को कौन साधेगा? गिरिराज या कन्हैया कुमार। लड़ाई तो वास्तव में त्रिकोणीय है, हालांकि कन्हैया कुमार इसे गिरराज सिंह से सीधी लड़ाई बता रहे हैं। ऐसा वे बोल रहे हैं ,तो फिर महागठबंधन के वोटर्स क्या करेंगे? आखिर राजद उम्मीदवार को गया एक एक वोट न केवल एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ है, बल्कि वाम उम्मीदवार के भी खिलाफ है।

तो ऐसे में एक दल के समर्थक क्रूशियल भूमिका निभा सकते हैं। गिरिराज सिंह जदयू के कार्यकर्ताओं के बीच बहुत पॉपुलर नहीं हैं, नीतीश कुमार के लिए भी रह रहकर परेशानी पैदा करते रहे हैं। तो ऐसे में एक जुट होकर वोट कर पाएंगे, इसमे संदेह है।
अब सवाल है कि अगर एक जुट होकर वोट नहीं करेंगे, तो वो वोट ( पचास हज़ार का हेर फेर हो सकता है) किसके खाते में जायेगा। जाहिर है, असंतोष में नोटा पर भी जाएगा। पर वाम या राजद? ये सोचने वाली बात है।

वाम का अगर इतिहास देखें, तो लंबे अरसे से वे बेगूसराय से नहीं जीते हैं। लगभग 50 साल हो गए उन्हें चुनावी जीत हासिल किए हुए और 2014 में भोला सिंह के वोट से भी वे ढाई से तीन लाख वोट दूर थे।

जबकि राजद उम्मीदवार दूसरे स्थान पर थे। तो क्या कन्हैया कुमार इस ढाई से तीन लाख वोट का गैप पाट पाएंगे। कन्हैया कुमार अच्छा बोलते हैं, उनकी राष्ट्रीय पहचान है, सोशल मीडिया में देश भर के अलग अलग एरिया के लोग उनके समर्थन में क्राउड फंडिंग में लगे हैं। हालांकि इस तरह का माहौल दिल्ली जैसे क्षेत्र या बिहार के शहरी लोकसभा क्षेत्र के लिए तो उपयुक्त है, पर बेगूसराय बिहार का ग्रामीण लोक सभा क्षेत्र है। सोशल मीडिया पर उनके समर्थक देश भर से आते हैं, वे उनके समर्थक तो हैं, पर वोटर नहीं। ऐसे में उनकी चुनौती दो है, एक जदयू के समर्थकों को अपने पक्ष में वोटिंग करवाना, दूसरे, भूमिहार वोट बैंक में सेंध लगाना और गिरिराज सिंह का वोट काटना। हालांकि हाल फिलहाल सवर्ण वोट बैंक भाजपा के साथ बेहद मजबूती के साथ खड़ा है।

और आजकल बिहार में कम से कम एक प्रवृति वोटर्स में देखने को मिल रही है कि वे सत्ता पक्ष के साथ दिखना चाहते हैं। लाभ पाने की लालसा में।

तो सोशल मीडिया पर शोर बनाम जमीनी लड़ाई। अभी वाम दलों को इससे दो चार होना है। चुनाव के बाद वाम दलों को लीडरशिप इशू पर ईमानदारी से आत्म चिंतन करना होगा।

कांग्रेस को भी करना होगा। संघ की जमीनी ताकत से कब तक गांधी परिवार के कैरिजमा के सहारे निपटें। अकेले लड़ें या गठबंधन बनाएं। भाजपा के धन बल, फ़र्ज़ी प्रचार से कैसे निपटें। भाजपा को भी चिंतन करना होगा, दक्षिण में कैसे फैले। बंगाल कब तक फतह होगा। कई सवाल हैं। हर विचारधारा के दल के लिए। कोई भाग नहीं सकता सवालों से। और चिंता न कीजिये। 2024 में भी चुनाव होंगे। साक्षी महाराज रहेगे या नहीं, ये भले दावे के साथ नहीं कह सकते।


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