लालू प्रसाद के उत्थान के बाद भागलपुर लोकसभा की राजनीति बदल गयी

प्रोफ़ेसर योगेंद्र

लालू प्रसाद के उत्थान के बाद भागलपुर लोकसभा की राजनीति बदल गयी. भागवत झा आजाद कई टर्म यहाँ से सांसद रहे. वे बिहार के मुख्यमंत्री भी रहे. जनता पार्टी की ओर से दो ढाई वर्षों के लिए डा रामजी सिंह सांसद रहे. फिर माई का काल आया. माई यानी यादव और मुस्लिम गंठजोड. हालाँकि लालू यादव ने मंडल आंदोलन की लहर पर सवार होकर बिहार में सत्ता हासिल की और पिछडों के नेता बनकर उभरे. पर समय के साथ जनता दल के अंदर मतभेद उभरते गए. रामबिलास पासवान, नीतीश कुमार, आदि नेता एक एक करके लालू यादव से अलग होते गए और उन्होंने अपनी पार्टियां बनायीं और लालू यादव के राजनीतिक प्रतिद्वंदी बनकर उभरे. पर तमाम जोड़ तोड़ के बावजूद लालू यादव के समर्थन में माय समीकरण मज़बूती से खड़ा रहा. माय यानि यादव और मुस्लिम का कॉम्बिनेशन. जो अगले 15 सालों तक बेहद मज़बूत गठबंधन साबित हुआ. इसने रामबिलास पासवान को बिहार की राजनीति से निकलकर केंद्र की राजनीति करने पर मज़बूर कर दिया. ऐसे में लोजपा के नेता, जो दुसाद जाति के निर्विवाद नेता थे, अपने पोलिटिकल सर्वाइवल के लिए केंद्र में कभी एनडीए तो कभी यूपीए सरकार के साथ तालमेल बिठाने में लग गए. वहीँ लालू यादव के माय समीकरण ने नीतीश कुमार को लम्बे समय के लिए राजनीतिक निर्वासन में भेजा. हालाँकि लालू के वर्चस्व के कठिन दौर में नीतीश केंद्र में मंत्री रहे, पर वे बिहार को भूले नहीं. और लगे रहे. अंत में 2005 में उनका संघर्ष रंग लाया.

फिर से भागलपुर लौटते हुए. चुनचुन यादव लगातार कई टर्म सांसद रहे और रिकार्ड मत से जीतते भी रहे. बीच बीच में बीजेपी ने भी सेंध मारी. प्रभाष चंद्र मिश्र ,सुशील कुमार मोदी,शाहनवाज हुसैन सांसद हुए. धीरे धीरे बीजेपी अपना आधार मजबूत कर रही थी कि बुलो मंडल आये. उनके पीछे यादव ,मुस्लिम और गंगोता का गंठबंधन था. वे नौ हजार से अधिक वोटों से जीते.बीजेपी के पक्ष में वैश्य और सवर्ण जातियाँ रही हैं।कुछ हद तक कुशवाहा भी.

इस बार सीट शेयरिंग में भागलपुर की सीट भाजपा ने जदयू के खाते में डाली है. कयास लगाए जा रहे थे कि इस बार भी पिछली बार की तरह शाहनवाज़ हुसैन भी एनडीए के उम्मीदवार होंगे. वे पिछली बार राजद के बुलो मंडल से मामूली अंतर से हारे थे और हार के बावजूद भागलपुर की जनता के साथ खड़े थे. पर फिलहाल स्थिति ये है कि शाहनवाज़ हुसैन रेस से बाहर हैं और जदयू ने अजय मंडल को राजद के बुलो मंडल के मुकाबले खड़ा किया है.

जदयू ने अजय मंडल को खड़ा किया है ,यह सोचते हुए कि अगर गंगोता दरक जाये और वोट बंट जाये तो जदयू जीत सकता है. वैश्य ,कुर्मी और सवर्ण कहाँ जायेंगे ? नोटा वोटा करते हुए अंततः वोट डालेंगे ही. मुझे लगता है कि अजय मंडल को खड़ा कर जदयू ने अतिरिक्त खतरा मोल लिया है. बुलो मंडल के पक्ष में यादव,मुस्लिम और गंगोता भी होंगे और साथ में कुशवाहा भी. छोटी छोटी जातियों का भी जोड़ तोड़ होगा. सदानंद सिंह की वजह से कुर्मी वोट का कुछ हिस्सा बुलो मंडल को जा सकता है. इसलिए फिलहाल राजद के बुलो मंडल का ही पलड़ा ज्यादा मजबूत लगता है.


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