महादेवी छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक

पवन यादव

आज के रोज हिंदुस्तान की सबसे उज्जवल, विलक्षण, प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों में से एक महादेवी वर्मा जी का जन्म हुआ था। महादेवी जो कवियत्री थीं, चित्रकार थीं, महिला अधिकारों एवं प्रोत्साहन के लिए तत्पर नारीवादी थीं, देश के आम लोगों का भला सोचने वालीं राष्ट्रप्रेमी थीं, बौद्ध धर्म की ज्ञाता और स्वयं दार्शनिक थीं।

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में महादेवी छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक स्तंभ थीं। महादेवी हिंदी साहित्य के क्षेत्र में पुनर्जागरण लाने वालीं कवियत्री/लेखिका हैं, छायावाद के द्वारा जहाँ उन्होंने पुरातन परंपराओं को तोड़ा वहीं प्रयाग विद्यालय की प्रधानअध्यापिका की ज़िम्मेदारी संभालते हुए तमाम नई महिलाओं के लिए लेखन के दरवाज़े खोले।
महादेवी जी का जन्म फ़र्रुख़ाबाद में एक बेहद सामान्य घर में हुआ था। परिवार में पितृसत्तात्मक व्यवस्था थी दादा जी का वचन ही अंतिम था हर मसले में। जब महादेवी महज़ नौ साल की थीं तभी इनके दादा जी ने इनका विवाह करवा दिया।उम्र कम होने के कारण ये मायके में ही रहीं और शुरुआती पढ़ाई के लिए इलाहाबाद चली गईं। इलाहाबाद में crossthwaite girls school में पढ़ते वक़्त इनकी मुलाक़ात सुभद्रा कुमारी चौहान से होती है जो स्वयं आगे चलकर हिंदी साहित्य का एक बड़ा नाम बनती हैं।
स्नातक के बाद महादेवी वर्मा स्वयं को बुद्धिस्ट नन के रूप में देखना चाहती थीं और इसी वजह से उन्होनें अपने ससुराल जाने से मना कर दिया किंतु वह नन ना बन सकीं इसके बाद उन्होंने संस्कृत में परास्नातक की पढ़ाई की जिसमें उनका मुख्य विषय बौद्ध एवं पाली साहित्य रहा।

इलाहाबाद राजनैतिक रूप से काफ़ी सक्रिय ज़िला था पंडित नेहरू और तमाम अन्य कांग्रेस के बड़े नेताओं की वजह से इलाहाबाद में स्वाधीनता संग्राम, असहयोग आंदोलन से जुड़े काम ख़ूब होते रहते थे।

हालाँकि इसका कहीं ज़्यादा सबूत नहीं मिलता कि वो स्वयं सक्रिय रूप से असहयोग आंदोलन में भाग लीं थी किंतु अराजनैतिक और सामाजिक कामों को करने और बढ़ावा देने के ढेरों क़िस्से हैं।

गांधी जी के संपर्क में आने से पहिले ही वो गहने वग़ैरह पहनना छोड़ चुकी थीं बाद में वो अपनी साड़ी का सूत भी खुद कातने लगीं थीं।

महादेवी जीवन भर बेहद सादगी से रहीं अपने निबंधों में उन्होंने भारतीय लोक संस्कृति, यहाँ के बिल्कुल आम लोगों के बारे में लिखा। वो जिससे मिलती बिल्कुल परिवार की तरह मिलती ना कोई अभिमान ना कोई दिखावा। पंडित नेहरु से लेकर निराला तक सभी उनको अपने परिवार का सदस्य मानते थे।
नमन महादेवी जी को।

महादेवी जी की ये कविता बचपन में पढ़ी थी आप भी आनंद लीजिए।

मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!

मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।

मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.