दरभंगा लोकसभा सीट पर खींचतान जारी: राजद या कांग्रेस, किसके हिस्से जायेगी ये सीट?

पटना: दरभंगा सीट पर दावेदारी को लेकर महागठबंधन के दो घटकों कांग्रेस और राजद के बीच खींचतान जारी है. दोनों अपनी दावेदारी को लेकर अड़े हुए हैं. हालाँकि अभी इस बाबत कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है और महागठबंधन ने चुनाव के अलग अलग चरण में उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की नीति अपनायी हुई है. पर राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने मंगलवार को ये कहकर माहौल गरमा दिया कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी दरभंगा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ेंगे. भाई वीरेंद्र ने कहा “वास्तव में, आरजेडी पिछले लोकसभा चुनाव में बहुत कम अंतर से हारी थी. हमने पहले भी कई बार उस सीट पर जीत हासिल की है. यह कांग्रेस को तय करना है कि वे कीर्ति झा आज़ाद को कहां से मैदान में उतारेगी.”
कीर्ति आज़ाद हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं. बिहार के कद्दावर कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के पुत्र तथा मशहूर क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने 2009 और 2014 में भी जीत हासिल की. दोनों चुनावों में भी उन्होंने अशरफ फातमी को पराजित किया. बाद में भाजपा नेतृत्व से कीर्ति आजाद की ठन गई.
उल्लेखनीय है कि महागठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी भी इस सीट से चुनाव लड़ने की दावेदारी पेश की थी, लेकिन बाद में उन्होंने इस सीट का दावा छोड़ दिया. सूत्रों का कहना है कि सहनी अब खगड़िया से चुनाव मैदान में उतरना चाह रहे हैं.

लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में 29 अप्रैल को दरभंगा लोकसभा क्षेत्र में मतदान होना है. बिहार में कुल 40 लोकसभा सीटों पर मतदान 7 चरणों में होगा. बिहार में 11 अप्रैल, 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 6 मई, 12 मई और 19 मई को मतदान होगा.

2009 से दरभंगा लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत छह विधान सभा सीट आते हैं:
गौरा बौरम, बेनीपुर, अलीनगर, दरभंगा ग्रामीण, दरभंगा, बहादुरपुर.

क्या है दरभंगा लोकसभा सीट का इतिहास?
1952 में पहले लोकसभा चुनाव से लेकर 1972 के चुनाव तक इस सीट पर लगातार कांग्रेस का कब्ज़ा रहा. इस दौर के कोंग्रेसी सांसदों में नारायण दास, अनिरुद्ध सिन्हा, श्याम नंदन मिश्रा, ललित नारायण मिश्रा,रामेश्वर साहू और बिनोदानंद झा रहे. सबसे अधिक तीन बार सांसद चुने गए, श्री नारायण दास.
1977 में एंटी इंदिरा वेब में कांग्रेस को पहली बार हार मिली. और भारतीय लोकदल के सुरेंद्र झा जीते. 1980 में केंद्र में इंदिरा गाँधी की वापसी के साथ इस सीट पर भी कांग्रेस की वापसी हुई. और कांग्रेस के हरिनाथ मिश्रा जीते. 1984 में विजय कुमार मिश्रा लोक दल के टिकट पर जीते.

1989 से दरभंगा सीट तीन नेताओं के बीच ही सिमट कर रह गया. 1989 में जनता दल के शक़ीलूर रहमान को जीत हासिल हुई. पर 1991 से इस सीट पर मुहम्मद अली अशरफ फातमी या नहीं तो कीर्ति आज़ाद का कब्ज़ा रहा. फातमी लगातार 1991, 1996 और 1998 में जीते जनता दल और फिर राजद के टिकट पर. वहीँ कीर्ति आज़ाद पहली बार 1999 में भाजपा के टिकट पर जीते. 2004 में फातमी साहब ने फिर वापसी की और राजद के टिकट पर जीत हासिल की. 2009 और 2014 में कीर्ति आज़ाद को लगातार दो बार भाजपा के टिकट पर जीत मिली.

कीर्ति आज़ाद इस क्षेत्र में बड़ा नाम हैं. उनके पिता भगवत झा आज़ाद बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं. पर राजद ने पेंच यह कहकर लगा कि इस क्षेत्र में राजद का प्रभाव रहा है, और दूसरे कीर्ति आज़ाद को जीत भाजपा के टिकट पर मिली है, और अब वे भाजपा में नहीं हैं.

फिलहाल राजद अब्दुल बारी सिद्दीकी का नाम आगे कर रहा है. अब्दुल बारी सिद्दीकी राजद के वरिष्ठ और समर्पित नेता रहे हैं. महागठबंधन की सरकार में वे वित्त मंत्री थे. महागठबंधन के टूटने के बाद भाजपा के सुशील मोदी बिहार के वित्त मंत्री बने.


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