संघ की हरकतों पर नियंत्रण में हाथ सिर्फ लालू का नहीं, बल्कि नीतीश जैसे राजनेताओं का भी है !!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

मुझे लगता है अक्सरहां कि इंडिया में पोलिटिकल साइंस में हमने Overgeneralized theories अपना रखे हैं और इसके चलते मुगालते ज्यादा पाले जाते हैं और चीजों की समझ आधी अधूरी रह जाती है। मैं इसे उदाहरण से समझाना चाहूंगा। एक बिगड़ैल बच्चा होता है, शैतानी करता रहता है, उधम मचाये रहता है, पड़ोस के लोग चाहते हैं कि अगर ये कंट्रोल में रहता, अनुशासित रहता, तो हम सब राहत की सांस लेते। तो अब सवाल ये है कि उस पर नियंत्रण कैसे हो? दो तरीके हो सकते हैं। एक, पड़ोसी अपना विरोध दर्ज करवाएं। दूसरा, उसके घर के लोग उसके व्यवहार पर नियंत्रण लगाएं। मतलब दो फ़ोर्स लग सकते हैं। अंदरूनी और बाहरी बल। एकदम विज्ञान की थ्योरी पर। अब हम फिजिक्स की इस थ्योरी को पोलिटिकल साइंस में ले चलेंगे। मैं यहां पर स्पष्ट कर दूं, इकोनॉमिक्स में कई थ्योरी फिजिक्स से आई हैं। थ्योरी ऑफ एक्विलिब्रियम उदाहरण के तौर पर।

तो अब संघ का उदाहरण। संघ का राष्ट्र दर्शन संकीर्ण है और बिल्कुल नाजीवाद, फासीवाद की तरह उग्र है, देश जोकि बहु भाषा भाषायी और बहुधर्मी है, उसके खिलाफ है। तो हमें संघ के राष्ट्र दर्शन से विरोध है। हम भारत का विकास ऐसे नहीं चाहते।

सत्तर के दशक में संघ के सर संचालक बाला साहब देवरस ने विजन रखा था कि संघ के लोगों को हर दल में जाना चाहिए और उसे प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। अब ये थ्योरी ओरिजिनल है या क्या, मैं इसमे नहीं जाना चाहूंगा। हालांकि मैं आपका ध्यान इस ओर जरूर खींचना चाहूंगा कि संघ ने जरूर कांग्रेस का गहन अध्ययन किया होगा, खासकर नेहरू और कांग्रेस के अंदर समाजवादियों की रणनीति पर। मैं आज़ादी से पहले की बात कर रहा हूँ, जब कांग्रेस के अंदर समाजवादियों का प्रभावशाली ग्रुप था, और जो कांग्रेस के अंदर दक्षिणपंथियों का जो ग्रुप था, जिसमे पटेल, पंत, प्रसाद थे, का विरोध कर रहा था। समाजवादियों में नेहरू, बोस, लोहिया, जेपी, अच्युत पटवर्धन, मीनू मसानी, आचार्य नरेंद्र देव जैसे तमाम लोग थे। इन लोगों ने कई बार चर्चा की क्या हमें कांग्रेस से बाहर निकल जाना चाहिए, पर अंत मे राय यही बनी कि नहीं। कांग्रेस के अंदर रहकर कांग्रेस को समाजवादी दिशा देनी है। समय के साथ समाजवादियों के प्रयास से कांग्रेस का एजेंडा उग्र हुआ। 40 के दशक में गांधी ने भी अपने कई पुराने विचारों को revise किया।

तो संघ जब कांग्रेस को अपनी पूरी ताकत से बढ़ते देख रहा होगा, तो जरूर इसके अंदर चल रही वैचारिक अंतर्द्वद्व को देख, समझ रहा होगा। तो मेरा ख्याल है कि 70 के दशक में बाला साहब देवरस ने इस दूसरे दलों में घुस कर उनके विचारों को प्रभावित करने के बारे में राय दी होगी। आज ये दावे से कहा जा सकता है कि जो भाजपा से परे दूसरे दलों में हैं, वे संघी नहीं हैं अपनी सोच में, तो ये हमारी अधूरी सोच होगी।

पर मैं यही पर रुकना नहीं चाहता। बल्कि संघ के लीडर की सोच को सिर के बल पलट देना चाहता हूं। मैं कहना चाहता हूं कि संघ का पोलिटिकल आर्म है भाजपा। तो भाजपा के अंदर भी गैर संघियों को जान चाहिए और उन्हें उसकी नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए। अब आप कहेंगे, ये कैसे होगा? तो मैं कहूंगा चिंतन को एकदम सरल बनाने के अपने खतरे हैं, तो जीवन की तरह जटिलता में उतरिये।

मैं कहूंगा कि 1989 में आडवाणी रथ यात्रा क्यों कर सके, इसकी जो राजनीतिक वजहें हैं, वी पी सिंह, मंडल आयोग, वो तो हैं ही, मैं अब इससे आगे बढ़ना चाहता हूं। वो चिंतन की एक दिशा हुई। एकपक्षीय। एकपक्षीय इसलिए क्योंकि वो सिर्फ बाह्य प्रभाव या फिजिक्स के शब्दों में बाह्य बल का अध्ययन करता है।

आडवाणी इसलिए अपने मनसूबे पर काम कर सके क्योंकि उन पर नियंत्रण नहीं था। वे विपक्ष में थे। उनके सहयोगी नहीं थे, जो कहते कि ये गलत है।

पर सत्ता में बीजेपी आयी, सत्ता से बाहर भी रही, पर अब उसके पास सहयोगी थे, जो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के प्लेटफार्म पर साथ आये। वे बिल्कुल इस बात के खिलाफ थे कि साम्प्रदायिक दंगे भड़का कर वोटों का ध्रुवीकरण करके जीत हासिल की जाए। अगर हम हाल फिलहाल नीतीश कुमार के वक्तव्य सुनें, तो हम पाते हैं कि उन्होंने संघ के पेट एजेंडा पर लगातार भाजपा को आगाह किया और भाजपा को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।

बिहार में लालू यादव और उनका राजद एन्टी संघ है, और इसने आवाज उठायी है, समाज के एक बड़े वर्ग को सम्प्रदायिकता की धुरी में आने से रोका है। सत्ता में थे, तो पुलिस और प्रशासन की मशीनरी का इस्तेमाल करके बिहार में साम्प्रदायिक दंगे नहीं होने दिया।

पर यही काम तो नीतीश कुमार ने भी किया। नीतीश ने भी भाजपा को स्पष्ट सन्देश दिया है।

अब ऐसे में सवाल ये है कि संघ की मशीनरी किससे रुकेगी? विरोध करने वालों का अपना ऑडियंस है, उसकी आवाज की अपनी भूमिका है, इसकी तारीफ हुई है, पर हक़ीक़त ये है कि संघ इसकी बात को अनसुनी करेगा। क्योंकि वे संघ के ऑडियंस नहीं हैं। वहां जंग है। पर संघ का हाथ अपने पीठ पर पाए भाजपा को अपने समर्थकों जैसे नीतीश कुमार आदि की बात सुननी होगी।

तो मैं ये कहना चाहता हूं कि संघ के कम्युनल एजेंडा की राह में रोड़े सिर्फ लालू नहीं बल्कि नीतीश जैसे लोग भी हैं। हमनें अध्ययन का दायरा विस्तृत करना होगा। बिगड़ैल बच्चा सिर्फ पड़ोसी की आवाज से नहीं डर रहा, बल्कि बिगड़ैल बच्चे पर घर के अंदर चाचा लोग भी नियंत्रण लगा रहे हैं।


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