सुरों के शहंशाह बड़े गुलाम अली खां, बंटवारे के बाद पाकिस्तान चले गये, पर मन नही लगा और हिंदुस्तान लौट आये

नवीन शर्मा 

इस तस्वीर में जो पहलवानों जैसा शख्स दिखाई दे रहा है वो कोई कुश्ती करनेवाला व्यक्ति नहीं है बल्कि हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का शहंशाह बड़े गुलाम अली खां साहब हैं। ये जैसा नाम वैसा काम की अनूठी मिसाल हैं। ये सिर्फ कद और काठी से ही बड़े नहीं थे बल्कि गायन में भी बेमिसाल थे। इनकी गायकी के मुरीद आम लोग ही नहीं बल्कि गायकी के बड़े बड़े नाम भी थी। सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर भी कहतीं हैं कि वे बड़े गुलाम अली खां साहब की तरह शास्त्रीय गायन करना चाहती हैं। उनकी इतनी इज्जत करती थीं कि उनके कहने पर भी उनके बगल बराबर में बैठ कर नहीं गाया।

एक गाने के लिए लिए 25000

फिल्म निर्देशक के आसिफ मशहूर फिल्म मुगल ए आजम बना रहे थे। वे फिल्म में एक गीत बड़े गुलाम अली खां से गवाना चाहते थे। उन्होंने संगीतकार नौशाद को खां साहब के पास भेजा। खां साहब फिल्मों में गायन से दूर रहते थे इसलिए उन्होंने नौशाद को टालने के लिए कहा की 25000 रुपये लूंगा। नौशाद ने जब ये बात के आसिफ को बताई तो उन्होंने कहा ठीक है मैं तो और ज्यादा सोच रहा था। खां साहब ने 25000 रुपये उस समय मांगे थे जब लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जैसे स्थापित प्लेबैक सिंगर महज एक गीत के लिए 500 रुपये लेते थे।
उनका जन्म अविभाजित भारत में लाहौर (अब पाकिस्तान) के पास स्थित कसूर में दो अप्रैल 1902 को हुआ था. अपनी सुरीली आवाज और अभिनव प्रयोगों के जरिये उन्होंने न सिर्फ अपने समय के श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया, बल्कि आज भी उनके प्रशंसकों की एक बड़ी तादाद मौजूद है।

संगीत विरासत में मिला

बड़े गुलाम अली खां साहब को संगीत विरासत में मिला था. संगीत के गुर उन्होंने अपने पिता अली बख्श खां, चाचा काले खां और दादा शिंदे खां से सीखे. अली बख्श खां कश्मीर के महराजा के दरबारी गायक थे और यह संगीत का कश्मीरी घराना कहा जाता था. बाद में ये लोग पटियाला आ बसे और घराने का नाम पटियाला घराना हो गया. यह भी दिलचस्प है कि खां साहब ने सारंगी वादन से अपने संगीत की शुरुआत की थी. उस्ताद आशिक अली खान भी उनके गुरू रहे।

1919 में पहचान बनी
बड़े गुलाम अली खां की आवाज को पहचान 1919 में लाहौर के संगीत सम्मेलन में मिली. इसके बाद कलकत्ता और इलाहाबाद में हुए ऐसे ही संगीत आयोजनों ने उन्हें मशहूर कर दिया. बड़े गुलाम अली खां को ठुमरी में उनके अभिनव प्रयोगों के लिए जाना जाता है. ठुमरी को परंपरा के दायरे से बाहर निकालकर उन्होंने इसे एक अलग अंदाज में ढाला. इस नए अंदाज में लोक संगीत की ताजगी और मिठास भी थी. दिखने में बेहद कड़क मिजाज और मजबूत डील-डौल वाले बड़े गुलाम अली ने सबरंग नाम से कई बंदिशें भी रचीं।

बंटवारे के बाद पाकिस्तान गए, फिर लौटे

1947 में भारत के बंटवारे के बाद बड़े ग़ुलाम अली खां पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन संगीत के इस साधक को वहां का माहौल रास नहीं आया. नतीजतन वे जल्द ही भारत लौट आए।
संगीत के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान मिले जिनमें 1962 में मिला पद्मभूषण भी शामिल है।23 अप्रैल, 1968 को हैदराबाद में उनका निधन हो गया।


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