क्या विद्रोह का बिगुल बजा कर तेजप्रताप यादव ने उत्तराधिकार की लड़ाई में अपनी राह कठिन बना ली है?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

सत्ता खून के रिश्ते नहीं देखती. जब दाँव पर बिहार का नेतृत्व हो, तब तो और भी नहीं. जो आज सतह पर आ गया है, इसकी नींव तो उसी दिन पड़ गयी थी, जिस दिन 2013 में लालू यादव ने अपने दोनों बेटों- तेजस्वी और तेज प्रताप को अधिकारिक तौर पर राजनीति में लांच किया था.बिहार की राजनीति में लालू यादव का दखल 1990 से शुरू हुआ और ये पंद्रह साल चला, जब तक कि वे 2005 में अपने पूर्व साथी और बाद में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन गये नीतीश कुमार ने उन्हें सत्ता से बेदखल नहीं कर दिया. समता पार्टी के गठन के बाद से ही नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ हाथ मिलाकर अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य पर निगाहें गड़ाएं रखीं. पंद्रह सालों के लालू राबड़ी शासन में हालाँकि लालू हमेशा प्रत्यक्ष रूप से सत्ता में हमेशा नहीं रहे, बल्कि 1997 में चारा घोटाले में अभियुक्त सिद्ध होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.  पर फिर भी भले वे कुर्सी पर रहे, नहीं रहे या जेल की सलाखों के पीछे रहे, उन्होंने बिहार की राजनीति और प्रशासन को प्रभावित करना जारी रखा.

पर लालू की उम्र बढती जा रही थी और राबड़ी भी एक्टिव पॉलिटिक्स में पहले की तरह दखल नहीं दे रही थीं. ऐसे में लालू यादव ने 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में अपने बेटों- तेज प्रताप यादव् और तेजस्वी यादव को चुनावी अखाड़े में उतारा. बिहार में जदयू, राजद और कांग्रेस का अभेद्य गठबंधन था. इसके सामने भाजपा और उसके सहयोगी दल पत्ते की तरह उड़ गये. तेज प्रताप महुआ विधान सभा सीट से विजयी हुए, वहीँ तेजस्वी यादव राघोपुर विधानसभा सीट से.

सरकार गठन के समय लालू यादव ने अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव पर ज्यादा भरोसा दिखाया और उन्हें राजद की कमान सौंपी, बल्कि उपमुख्यमंत्री पद भी मिला. जबकि तेज प्रताप यादव को स्वास्थ्य मंत्रालय मिला. बड़े बेटे को ये बात रास नहीं आई. वहीँ से राजद में नेतृत्व की लड़ाई की बीज बोई जा चुकी थी. हालाँकि लालू यादव ने इसे कम करके आंकने की कोशिश की.

कहा जाता है कि तेजस्वी यादव जहाँ अपने पिता के करीब हैं, वहीँ तेज प्रताप यादव अपनी माँ राबड़ी देवी के.

तेज प्रताप यादव की बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री भोला प्रसाद राय के खानदान में शादी भी समस्यायों का अम्बार लेकर आई. राजद के सूत्र कहते हैं कि तेज प्रताप की पत्नी ऐश्वर्या राबड़ी देवी की व्यक्तिगत पसंद हैं और उन्होंने काफी सोच समझकर बिहार के दो शक्तिशाली राजनीतिक परिवारों के बीच गठजोड़ किया. ऐश्वर्या के पिता चंद्रिका राय लालू यादव के कैबिनेट में मंत्री रह चुके हैं और एक कद्दावर नेता रहे हैं.

पर एमबीए पास ऐश्वर्या और नवी कक्षा पास तेज प्रताप यादव के बीच मेल नहीं हो सका. नतीजा तेज प्रताप ने शादी के महज 6 महीने के अन्दर ऐश्वर्या से तलाक की अर्जी दे दी. फिलहाल मामला कोर्ट में विचाराधीन है, पर परिवार इस मुद्दे पर तेज प्रताप यादव के साथ खड़ा नहीं है. परिवार के सभी सदस्यों की सहानुभूति ऐश्ववर्य के साथ है. तेज प्रताप भी तलाक को लेकर अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और विरोध प्रदर्शन के तौर पर वे घर से दूर दूर वृदावन, मथुरा आदि जगहों पर रहे. रांची में कैद  पिता ने भी अपने बड़े बेटे को समझाने की बहुत कोशिश की, पर वे नाकामयाब रहे.

परिवार में सब ठीक नहीं चल रहा है, इस बात को खुद मीसा भारती ने भी स्वीकारा था, हालाँकि उन्हें परिवार के दबाब के बाद अपने बयान से पीछे हटना पड़ा.

लोक सभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनज़र तेज प्रताप यादव उपेक्षित महसूस कर रहे थे. हालाकि तेज प्रताप यादव ने खुद को कृष्ण और तेजस्वी यादव को अर्जुन समय समय पर कहा है और ये घोषणा की है कि वे तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनायेंगे, फिर भी समय समय पर उनका सार्वजनिक व्यवहार इस बात की गवाही नहीं देता कि वे इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि उत्तराधिकार की लड़ाई में वे तेजस्वी से हार चुके हैं. गांधी मैदान में उन्होंने रैली के दौरान तेजस्वी यादव से पैर छुआए. राजद कार्यालय में लालू यादव की कुर्सी पर बैठे. उनके इन व्यवहार से संकेत मिल रहे थे, पर उन्हें नेगलेक्ट किया जा रहा था.

पर लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर तेज प्रताप का आक्रोश उभर कर सामने आ गया है. उनकी आवाज को अनसुना करना, उनके पसंद के उम्मीदवारों के दावों को अनसुना करना, ससुर चंद्रिका राय को सारण से टिकट मिलना आदि ऐसे कारक थे, जिसके चलते तेज प्रताप यादव ने विद्रोह का बिगुल फूंक डाला. उन्होंने सोमवार शाम पटना में एक प्रेस कांफ्रेंस करके लालू राबड़ी मोर्चा का गठन का एलान किया. उन्होंने जहानाबाद और शिवहर से अपने उम्मीदवार खड़े करने की घोषणा कर दी. उन्होंने ये भी बताया कि शिवहर से अंगेश कुमार और जहानाबाद से चंद्र प्रकाश उनके मोर्चे के उम्मीदवार हैं. उन्होंने ये भी कहा कि सारण की सीट लालू की पारंपरिक सीट रही है और वे अपनी माता राबड़ी देवी से अनुरोध कर रहे हैं कि वे वहां से चुनाव लड़ें, ऐसा नहीं होने पर उन्होंने वहां से खुद को चुनाव मैदान में उतारने की बात कही.

फिलहाल तेज प्रताप के सामने चुनौतियों का अम्बार खडा है: 

तेज प्रताप ने छात्र राजद के संरक्षक की अपनी जिम्मेवारी से इस्तीफा दे दिया है. राजद के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार मैदान में उतार दिया है. राजद को इस आसन्न संकट से निपटना है. पिता लालू यादव के जेल में रहने से स्थिति और बिगड़ गयी है. तेजस्वी यादव लालू यादव के बाद राजद के नेता के तौर पर स्थापित हो चुके हैं. तेजस्वी को लालू यादव का समर्थन और आशीर्वाद हासिल है. तेज प्रताप परिवार में अलग थलग पड़ गये हैं.

अब ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि तेज प्रताप का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? 

तेज प्रताप और तेजस्वी की कार्यशैली अलग है. तेज प्रताप की कार्यशैली, उनके भाषण के लहजे में पिता की झलक मिलती है, वे गरीब जनता से तुरंत कनेक्ट हो जाते हैं. हाल फिलहाल में उनकी ऐसी तस्वीरें सामने आई थीं, जिसमे वे महादलित बस्तियों में उनके चापाकल पर नहा रहे थे, उनके साथ बैठकर भोजन कर रहे थे. तेजस्वी यादव हालाँकि तेज प्रताप की तरह जनता से तुरंत कनेक्ट नहीं हो पाते. पर उन्होंने अपनी समझदारी से, प्रचार के नए माध्यमों से परिचय दिखाते हुए कम समय में राजनीतिक परिपक्वता हासिल की है.

तलाक के मुद्दे को लेकर तेज प्रताप अपने ताकतवर ससुरालवालों की सहानुभूति भी खो चुके हैं. और राजद में भी नेता खुलकर उनके समर्थन में नहीं आ रहे. वे हवा के रुख को देख रहे हैं जो फिलहाल तेजस्वी यादव के पक्ष में बहती दिख रही है.

ऐसे में सवाल ये है कि तेज प्रताप का राजनीतिक भविष्य क्या होगा. ऐसा महसूस हो रहा है कि अगर तेज प्रताप ने अपने कदम समय रहते पीछे नहीं खींचे, तो उन्हें राजनीतिक निर्वासन में जाना पड़ सकता है. वे अभी महज 30 साल के हैं और उन्होंने महज 5 साल के राजनीतिक अनुभव के बाद ही सत्ता संघर्ष में अपना पांसा फेंक दिया है. बेहतर ये होगा कि फिलहाल वे तेजस्वी यादव के साथ हाथ से हाथ मिलाकर राजद को मज़बूत करें, पार्टी को सत्ता में लायें, जनता के बीच भरोसा जीते. अपने समर्थकों की फ़ौज खड़ी करें और फिर जब उचित समय आये, तो वे लालू यादव के उत्तराधिकारी के तौर पर अपना दावा पेश करें. इस बात की पूरी सम्भावना है कि अगर वे अपनी जिद पर अड़े रहें, तो उनका हश्र गांधी परिवार में मेनका गांधी की तरह हो जाएगा.


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