किताबें बैन करना असभ्य और बर्बर परंपरा है !!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

किसी किताब के बारे में जजमेंट कभी भी अपने आइडियोलॉजी या मोरालिटी के ग्राउंड पर नहीं करना चाहिए. किताबें सिर्फ अपने सब्जेक्ट मैटर से न्याय कर पायी या नहीं, सिर्फ एकमात्र पैमाना ये होना चाहिए. अगर आप किसी किताब की मेरिट को अपने आइडियोलॉजी या मोरालिटी ( नैतिकता) के पैमाने पर खारिज करते हैं, या स्वीकार करते हैं, तो ये आपकी बौद्धिक अपरिपक्वता को दर्शाता है. किताब का मेरिट या ड़ेमेरिट नहीं.

देश में, विदेश में, कुछ सभ्यताओं में किताबों को बैन करने की परंपरा रही है. भारत में सैटानिक वेर्सेज बैन है, शिवाजी पर अमेरिकी विद्वान जेम्स लेन की किताब बैन कर दी गयी. पुणे की भंडारकार लाइब्रेरी को नुकसान पहुंचाया गया. तमिलनाडु के एक लेखक को इतना परेशां किया गया कि उन्होंने जीवनमे कभी भी नहीं लिखने की कसम खा ली. बस इसलिए कि उन्होंने प्राचीन नियोग व्यवस्था पर कलम चलाई.

ये तमाम किताबें बैन क्यों की गयीं? इसलिए कि भीड़ ने कहा कि हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचती हैं. अब समाज को लीड करने वाले विद्वानों, चिंतकों को भीड़ बताएगी कि आप ये न लिखें, वो न लिखें, क्योंकि हमारी भावनाओं को ठेस पहुँचती है. सभ्यता इस तरह आगे नहीं बढ़ी है. वो बढ़ी है चैलेंज करके, वर्तमान व्यवस्था को. ये नहीं कि ये एक लकीर है, हमारे पूर्वजों ने खिंची है, तो हम इसका सम्मान करेंगे, इसके आगे नहीं सोचेंगे, क्योंकि सोचने से हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं.

ये दिखाता है कि अभी कुछ सभ्यताओं में बौद्धिक चर्चा का वातावरण नहीं बन पाया है. ऐसी सभ्यताएं कभी भी लीड नहीं कर सकतीं. जो विरोध में हाथ उठाना पसंद करती हैं. अरब सभ्यता जिस समय अपने शीर्ष पर थी, और इस्लाम का परचम बेहद तेज गति से दुनिया में लहरा रहा था. स्पेन के कोरडोबा तक वे पहुँच गये थे. अफ्रीका में समुद्र ने उनका विस्तार रोका. तो उस समय वे लिबरल लोग थे. बग़दाद दुनिया का बौद्धिक केंद्र था. दुनिया भर के ग्रंथों का ट्रांसलेशन हो रहा था बग़दाद में. अरबी विद्वान दुनिया भर में घूम रहे थे ज्ञान की तलाश में. पर आज का अरब क्या उस मध्य काल के अरब की उंचाई छू सकता है? दुनिया को बौद्धिक नेतृत्व देने की सोच भी सकता है? उस समय प्राचीन यूनान और भारत अपनी बौद्धिक परंपरा को भूले बैठे थे. भारत में समुद्र पार करना पाप समझा जाता था, उसी भारत में जहाँ इंडस वैली के लोगों ने समुद्र पर चलकर दूर दुनिया से व्यापर किया था. सभ्यताएं इसी तरह उठती हैं, गिरती हैं.

पश्चिम क्यों आधुनिक सभ्यता के forefront पर है पिछले 500 सालों से? वे हमारी तरह किताबें बैन नहीं करते. वे हमारी तरह असुविधाजनक मुद्दों से मुंह नही फेरते !! किताबें बैन करना असभ्य और बर्बर परंपरा है. इसका विरोध होना चाहिए.

 


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