गुमनाम शायर की नामचीन शायरी: मधुकर की शायरी

आज चर्चा उस गुमनाम शायर की, जो नामचीन शायरों की तरह पहचान वाला नहीं, लेकिन जिसकी नज़्में नामचीन शायरों से क्वालिटी में कम नहीं. आईये आज जानें समस्तीपुर जिले के मुसरीघरारी में रहने वाले बेहतरीन शायर और बेहतरीन सोच के मालिक होमिओपैथ चिकित्सक और शायर डॉ आर वी मधुकर को !!

दो गज ज़मीन देना ,
मुट्ठी भर आसमान देना !
मेरे लिए फ़क़त
इंसानी मकान भर दे देना !!

मुद्दतों बाद आज उनका दीदार हो गया !
बातों-बातों में फिर उन्हीं से प्यार हो गया !!

ज़िन्दगी के कठिन राहों में ,
रफ्ता- रफ्ता चलो !
ऊँचे पहाड़ पर चढ़ना हो तो ,
सदा झुक के चढो !!

दीप और हवा का ज़द्दो-जेहद जारी है
अबतक हवा पर लौ भारी है !!!

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1.

घूमता शहर याकि घूम रहे हम ,
दारू है बड़ी चीज , खड़े झूम रहे हम !

धुएँ में डूब-डूब के , साँसें घुटे- घुटे ,
ज़िन्दगी को खो रहे मरहूम रहे हम !

तेरी वजह से आज मुझे ताज मिल गया ,
तुम भीड़ में ही खो गए , मशहूर रहे हम !

महफ़िल में जाम-ए-नोशी जब ढेर चल गई ,
तुम तो चले गए थे , मखमूर रहे हम !

जो भी बचा हुआ था , सब बाँध ले गए ,
ग़ुरबत सी ज़िन्दगी है , माज़ूर रहे हम !

दौलत का है पुजारी , गर्दन भी काट सकता ,
कुछ कर न सका मधुकर , मजबूर रहे हम !

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मरहूम—दिवंगत । मखमूर– मदहोश
माजूर – बेबश !

 

 

2.

बहारों का तोहफा सनम दे रहे हैं
तुझे आज पूरा चमन दे रहे हैं

अमन का वहम दे के वो आ गए थे
वही आज हमको वहम दे रहे हैं

भूखे मर जो सड़क के किनारे
उनके लिए हम कफ़न दे रहे हैं

अरे ! खौफ क्यों है मेरे अंजुमन में
आज , आतंकी विष वमन कर रहे हैं
माएँ भी डरने लगी कोख से ,
कहीं न आतंकी जनम दे रहे है

प्यासी नदियाँ मर चुकी देख लो
चहुंदिश प्रदूषण जनम ले रहे हैं

रिश्तों की भीड़ में खोने लगे है हम
एकला चलो रे ! चलन दे रहे हैं

फलक पे छाया हुआ धुन्ध क्यों है
बादलों का सा मधुकर वहम दे रहे हैं

 

3.

मेरी हर ग़ज़ल कोई गाता नहीं ,
क्योंकि , मुझे लिखने कुछ आता नहीं !

आप जो भी कहें , कह लें जनाब ,
अपनी ही ग़ज़ल मुझे भाता नहीं !

मैं पछवा गर्म हवा ही लिखता रहा ,
बादेसबा की तरह मुस्काता नहीं !

हर रात सितारे तोड़ लाता हूँ ,
मैं वो बादल हूँ , के इतराता नहीं !

मेरे दामन में भरे हैं रेत ओ-ग़ुबार ,
बात इतनी सी है कि , उसे उड़ाता नहीं !

कोई भी फूल चमन में कभी पूछता नहीं ,
अरे ओ मधुकर , कभी गुनगुनाता नहीं !

4.

पी ही नहीं शराब तो , ये नशा है क्यों ,
आया नहीं तूफान तो , ये हवा है क्यों !

खिड़कियाँ खुली हैं , दरवाज़े खुले हुए ,
के बार सुन रहा हूँ , ये सदा है क्यों !

अपनी जुबान चुप है , उनकी ज़ुबान बन्द ,
ये कौन सी वजह है , अंदाज़ बयां है क्यों !

उनकी हँसी बेबाक थी , बेबाक हँसे थे हम ,
मन्ज़र भी नाखतर था , आंखों में नमी है क्यों !

मेरा सजाया गुलशन , गुलज़ार भी रहा था ,
अब देखता हूँ ये क्या , बिखरा हुआ है क्यों !

पत्तों से भरी शाखें , कोयल भी कूकती थी ,
कुछ भी बचा न मधुकर , बंजर हुआ है क्यों !

5.

बात मोहब्बत की करो आहिस्ता-आहिस्ता
प्रेम पगे कदम बढ़ाओ आहिस्ता-आहिस्ता

यहां दीवारों के भी कान हुआ करते हैं
ज़मीन हमवार करो आहिस्ता-आहिस्ता

आँखों को ज़ुबान दे देना सनम
होंठों पे मुस्कान थिरके आहिस्ता-आहिस्ता

बादलों में छिपे माहताब की तरह
चेहरे से हटाना हिज़ाब आहिस्ता-आहिस्ता

आज तो चाँद भी मयखाने गया
लौटेगा वह कभी आहिस्ता-आहिस्ता

रातों की नींद उड़े तो उड़ जाये
ख्वाब आँखों में बसाना आहिस्ता-आहिस्ता

उल्फत की नगरी को रौशन किये रहना
दिल का कंदील जलाना आहिस्ता-आहिस्ता

इब्तदा-ए-इश्क क़ा लोगद कदीम है
वर्क-ओ-सफात उलटना आहिस्ता-आहिस्ता

मधुकर की बेताबी सऊर में लाकर
गले उनको लगाना आहिस्ता-आहिस्ता

 


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