वर्ग संघर्ष से जाति संघर्ष का गवाह रहे जहानाबाद लोकसभा में इस बार किसका परचम लहराएगा?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

जहानाबाद 70 के दशक से नक्सल संघर्ष की भूमि रही है. इसे बिहार का स्टेलिनग्राद कह सकते हैं. जहानाबाद ने उचित मजदूरी, दलित अस्मिता, भूमि के उचित बंटवारे को लेकर शुरू हुआ खुनी वर्ग संघर्ष देखते देखते जाति संघर्ष में बदल गया. एक समय जहानाबाद में वामपंथियों का वर्चस्व था जिसे अंततः मंडलवादी ताकतों के उभार के सामने झुकना पड़ा.

यादव व भूमिहार बहुल इस क्षेत्र में ये दोनों जातियां राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में आमने सामने रही हैं. एक अनुमान के मुताबिक संसदीय क्षेत्र में साढे तीन लाख यादव, पौने तीन लाख भूमिहार, एक लाख मुसलमान, करीब पांच लाख अतिपिछड़ी जातियां और जनगणना के अनुसार19 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग हैं. इस बार जहानाबाद सीट जदयू के खाते में आया. जदयू ने यहाँ के पारम्परिक जाति समीकरण को दरकिनार करते हुए अति पिछड़ा समुदाय के चंदेश्वर चंद्रवंशी को खड़ा किया है. इससे यहाँ भूमिहार जाति में रोष है, पर एनडीए का हिस्सा होने, मोदी ब्रांड और सवर्ण आरक्षण और समाज का जातिगत आधार पर विभाजन रेखा होने के चलते भूमिहारों के पास एनडीए उम्मीदवार का साथ देने के अलावा कोई उपाय नहीं दिखता. राजद ने सुरेंद्र यादव को मैदान में उतारा है. गया के रहने वाले सुरेंद्र यादव की छवि एक बाहुबली नेता की है. वे पहले भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. हालाँकि मुकाबला इन्ही दोनों के बीच है, पर कुछ राजनीतिक हलकों में अरुण कुमार की संभावना भी देखी जा रही है. पिछली बार रालोसपा के टिकट पर विजयी रहे क्षेत्र के पुराने नेता रहे हैं. वे 1993 में ही विधान पार्षद बन चुके हैं. उन्हें उम्मीद है कि भूमिहार जाति अपना उम्मीदवार नहीं होने की स्थिति में इन्हे अपना वोट देगी. ऐसे में कुछ राजनीतिक विश्लेषक त्रिकोणीय मुकाबले की भी उम्मीद जता रहे हैं.

जहानाबाद लोक सभा सीट का इतिहास:

जहानाबाद संसदीय क्षेत्र तीन जिलों के विधानसभा क्षेत्रों से मिलकर बना है. जहानाबाद संसदीय क्षेत्र में अरवल जिले का अरवल और कुर्था, जहानाबाद जिले का जहानाबाद,घोसी और मखदुमपुर तथा गया जिले का अतरी विधानसभा क्षेत्र शामिल है. इनमें से मकदूमपुर सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं.पुराने जहानाबाद संसदीय क्षेत्र से पटना जिले का मसौढ़ी विधानसभा क्षेत्र निकल गया है और गया जिले का अतरी शामिल हुआ है. मसौढ़ी सुरक्षित क्षेत्र बन गया है. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 4 राजद ने, जबकि 2 सीटें जदयू ने जीतीं.

2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के डॉ. अरुण कुमार ने 3, 22, 647 वोट हासिल किये थे और 42, 340 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी. जहानाबाद लोकसभा सीट पर दूसरे स्थान पर राष्ट्रीय जनता दल के सुरेंद्र प्रसाद यादव रहे थे जिन्होंने 2,80, 307 वोट हासिल किये थे.  जनता दल (यूनाइटेड) के अनिल कुमार शर्मा 1 लाख 00 हजार 851 वोट पाकर तीसरे तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के रामाधार सिंह 34, 365 वोट पाकर चौथें स्थान पर रहे थे.

जहानाबाद लोकसभा सीट से पहले दो चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार सत्यभामा देवी विजयी रही थीं. फिर अगले दो चुनाव , 1967 और १९७१ में भाकपा उम्मीदवार चंद्रशेखर सिन्हा विजयी हुए. ये वही दौर था जब भोजपुर से कृषक संघर्ष जहानाबाद पसरना शुरू हुआ और इसका प्रतिबिम्ब बदलते हुए राजनीतिक नेतृत्व के रूप में देखने को मिला. केंद्र की राजनीति का असर यहां भी हुआ. 1977 के चुनाव में इंदिरा विरोधी लहर में भारतीय लोकदल के हरिलाल प्रसाद सिन्हा विजयी हुए. 1980 में केंद्र में इंदिरा गाँधी की वापसी हुई. यहाँ भी कांग्रेस के टिकट पर महेंद्र प्रसाद विजयी हुए. फिर 1984,1989 और 1991 में लगातार तीन बार कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रामाश्रय प्रसाद सिंह विजयी हुए. 1996 और 1998 में राजद के टिकट पर सुरेंद्र प्रसाद यादव विजयी हुए. इसके बाद वामपंथियों का असर चुनावी प्रतिनिधित्व में लगातार कम होता गया. 1999 में अरुण कुमार जदयू के टिकट पर लोकसभा पहुंचे. 2004 में राजद के गणेश प्रसाद यादव ने जीत कर इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. 2009 में ये सीट एक बार फिर जदयू के खाते में गयी जब जगदीश शर्मा विजयी हुए. 2014 में मोदी लहर पर सवार अरुण कुमार ने रालोसपा के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की.

जहानाबाद का सामाजिक समीकरण:

जहानाबाद आर्थिक दृष्टिकोण से एक पिछड़ा जिला है, वर्षा आधारित कृषि, उद्योग धंधों का अभाव, बड़े पैमाने पर लोगों का पलायन जातिगत समीकरण के चलते मुद्दे नहीं बन पाए. फिलहाल जहानाबाद का जातीय समीकरण 2014 से बदला नज़र आ रहा है. जहाँ भूमिहार उम्मीदवार पशोपेश में हैं, हालाँकि मोदी फैक्टर के चलते उनके एनडीए उम्मीदवार चंदेश्वर चंद्रवंशी के समर्थन करने की बात सामने आ रही है, वहीँ दूसरी ओर यादव वोटर्स एक जुट होकर राजद उम्मीदवार सुरेंद्र प्रसाद के पक्ष में वोटिंग करेंगे. अरुण कुमार भूमिहार वोट काटेंगे, इसमें शक नहीं.
कुशवाहा जाति के ज्यादातर वोटर महागठबंधन को वोट देने की बात कहते है। वही यादव जाति के वोटरों का अभी भी लालू यादव पर भरोसा है. यहाँ मुस्लिम वोटर्स की संख्या कम है; लगभग 1.30 लाख, कुशवाहा और कुर्मी वोट 1.10 लाख के आसपास है, अत्यंत पिछड़ा वोट 2.10 लाख के आसपास. दलित और महादलित वोटर्स लगभग 3 लाख के आसपास. सबसे अधिक यादव वोटर्स. लगभग 3.50 लाख के आसपास. दूसरे स्थान पर भूमिहार वोटर्स हैं. 3.10 लाख के आसपास. महादलित वोटर्स पर महागठबंधन नेता जीतन राम मांझी का भी प्रभाव है, वहीँ नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग और शराब बंदी दलित महिलाओं में स्वीकार्यता के चलते एनडीए उम्मीदवार को भी इस वर्ग का वोट मिलेगा.
फिलहाल अगर भूमिहार वोटर्स एकजुट होकर एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में वोट करते हैं, तो दोनों पक्षों के बीच काफी कठिन मुकाबला होने की सम्भावना है.


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