समाजवादियों से दूरी बनाकर रखने वाले, ब्राह्मणों के वर्चस्व वाले बक्सर लोकसभा सीट से इस बार कौन?

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

ब्राह्मणों के वर्चस्व वाला क्षेत्र, मिनी बनारस कहा जाने वाला बक्सर. 1984 के बाद कांग्रेस को मौक़ा नहीं देने वाला बक्सर. लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण में बक्सर में चुनाव होने जा रहे हैं. कुल 15 प्रत्याशी चुनावी अखाड़े में हैं, पर यहाँ सीधा मुकाबला भाजपा उम्मीदवार अश्विनी चौबे और राजद के दिग्गज नेता जगदानंद सिंह के बीच है. पटना विश्वविद्याालय से जूलॉजी में स्नातकोत्तर करने बाद सक्रिय राजनीति में कूदे अश्विन चौबे छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के करीब रहे हैं और गिरिराज सिंह के साथ जुगलबंदी में बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की आँख की किरकिरी.  अश्विनी चौबे बक्सर से भाजपा के टिकट पर दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं. इससे पहले वह भागलपुर विधानसभा से पांच बार विधायक रह चुके हैं. कुछ समय पहले की ही बात है जब हवा में जोरों से चर्चा उछल रही थी कि नीतीश कुमार यहाँ से जदयू ने नए नए शामिल हुए पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को ब्राह्मण वोटरों के बीच पार्टी की पैठ बनाने के लिए उन्हें यहाँ से पार्टी उम्मीदवार बनाएंगे. पर पार्टी की अंदरूनी लड़ाई में फिलहाल प्रशांत किशोर आर सी पी सिंह से हारकर शांत हो गए हैं और हैं इस चुनाव में वो किसी भी तरह की अहम् भूमिका नहीं निभा रहे हैं.

इस बार के लोकसभा चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या 1811992 हैं. इनमें पुरुषों की संख्या 855028, महिलाओं की 956937 और सर्विस वोटरों की संख्या 9557 है.

बक्सर लोक सभा सीट का इतिहास :

बक्सर लोकसभा क्षेत्र में छह विधान सभा सीट आते हैं, ब्रह्मपुर, बक्सर, डुमराव, राजपुर, दिनारा, और रामगढ़. राजपुर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. जदयू के हिस्से दिनारा, डुमराव और एक सुरक्षित सीट राजपुर कुल मिलाकर तीन सीट हैं, राजद के हिस्से एक -ब्रह्मपुर; भाजपा के हिस्से एक- रामगढ, और कांग्रेस के हिस्से एक- बक्सर सीट है.

सासाराम में क्या मीरा कुमार बाबू जगजीवन राम की विरासत बचा पाएंगी या छेदी पासवान चौथी बार विजयी होंगे?

पहले चुनाव में इस सीट को शाहाबाद उत्तर पश्चिमी के नाम से जाना जाता था. 1952 और 1957 में कांग्रेसी लहर में कमल सिंह इंडिपेंडेंट उम्मीदवार के रूप में विजयी हुए. इसके बाद 1962,1967 और 1971 में लगातार तीन चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवार विजयी हुए, पर 1977 में इंदिरा विरोधी लहर में यह सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गयी और भारतीय लोकदल के रामानंद तिवारी विजयी हुए. 1980 और 1984 में कांग्रेस के पक्ष में लहर का फायदा बक्सर में भी हुआ और कमलकांत तिवारी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे. 1989 और 1991 में बक्सर के वोटरों ने सीपीआई के उम्मीदवार तेज नारायण सिंह को मौका दिया. फिर 1996 में भाजपा ने पहली बार इस सीट से जीत हासिल की जब लालमुनि चौबे इस सीट पर विजयी हुए. फिर 1998, 1999, और 2004 में लालमुनि चौबे लगातार विजयी हुए. 2009 में जीत का क्रम टूटा राजद उम्मीदवार जगदानंद सिंह विजयी हुए. पर २०१४ में वोटरों ने एक बार भाजपा में भरोसा करके अश्वनी चौबे को अपना प्रतिनिधि बनाकर लोकसभा भेजा. 2014 लोकसभा चुनाव में अश्विनी चौबे को 3,19,012 वोट मिले थे, जबकि दूसरे स्थान पर रहे 1,86,674 वोट. हालाँकि तीसरे स्थान पर रहे बसपा उम्मीदवार ददन पहलवान 1,84,788 वोट ले जाने में सफल रहे थे. चौथे स्थान पर जदयू उम्मीदवार रहे थे 1,17,012 वोटों के साथ.

बिहार के राइस बाउल काराकाट लोकसभा क्षेत्र से इस बार किसका प्रतिनिधित्व होगा?

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी रहे लाल मुनि चौबे बक्सर सीट से 4 बार सांसद चुने गए. 1996, 1998, 1999 और 2004 में वे यहां से चुनकर लोकसभा पहुंचे. 2009 लोकसभा चुनाव में वे राजद प्रत्याशी जगदानंद सिंह से महज 2,000 वोट से चुनाव हार गए थे. 2014 में भाजपा की तरफ से टिकट कटने के बाद लाल मुनि चौबे ने राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया.

2019 का चुनावी परिदृश्य:
बक्सर को सवर्ण बाहुल्य सीट कहा जाता है और ब्राह्मण वोटरों की अच्छी संख्या है. बक्सर की क़रीब 18 लाख आबादी में से ब्राह्मणों और यादवों की हिस्सेदारी लगभग बराबर है. साढे तीन लाख के आसपास ब्राह्मण मतदाता हैं. लगभग इतने ही यादव भी हैं. राजपूतों की संख्या कम है, पर उनका प्रभाव अपनी संख्या के अनुपात में ज्यादा है. राजपूत क़रीब एक लाख 68 हज़ार हैं. लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में लोगों ने अधिकांशत: किसी सवर्ण या ब्राह्मण उम्मीदवार को जिताया है और अश्विनी चौबे बाहरी होने के बावजूद इस सीट से सांसद बन पाए. इस चुनाव में बीजेपी-जदयू साथ-साथ हैं जिसकी वजह से राजद की परेशानी बढ़ गई है.
चुनाव में स्थानीय मुद्दे गायब हैं और यहां एक ही फैक्टर है मोदी.  एक तरफ भाजपा प्रत्याशी अश्विनी कुमार चौबे प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे पर मैदान में हैं वहीं महागठबंधन उम्मीदवार जगदानंद सिंह एनडीए सरकार की नाकामियों और जातीय मुद्दों पर गोलबंदी की कोशिश में जुटे हैं. जनतांत्रिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे अनिल कुमार भी काफी सक्रिय हैं. रामगढ़, दिनारा, राजपुर और डुमरांव में उनकी अच्छी पकड़ है. वे मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में लगे हैं.

वर्ग संघर्ष से जाति संघर्ष का गवाह रहे जहानाबाद लोकसभा में इस बार किसका परचम लहराएगा?

फिलहाल जदयू और भाजपा के एक साथ आ जाने से और बसपा उम्मीदवार ददन पहलवान के जदयू में आ जाने से अश्विनी चौबे की स्थिति मज़बूत दिख रही है. बक्सर में ऊंट किस करवट बैठता है, इसके लिए 23 मई का इन्तजार करना होगा.

कायस्थों के गढ़ पटना साहिब लोक सभा सीट में “शॉटगन” का निशाना लगेगा या चतुर वकील रविशंकर प्रसाद की चालें?


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.