रिजॉर्ट पॉलिटिक्स का जनक कर्नाटक

Priyadarshan Sharma

कर्णाटक में कुर्सी के लिए उठापटक ने निर्णायक रूप ले लिया है. कर्नाटक में पिछले 18 दिनों से जो लोकतंत्र का तमाशा हमारे सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने बनाया उसमें भले राजनीतिक दल जीत जाएं लेकिन अंतत: हार जनता की होगी। वैसे कर्नाटक के राजनीतिक इतिहास को देखेंगे तो यह ऐसा राज्य रहा है जहां बार बार सत्ता बचाने के लिए रिजॉर्ट पॉलिटिक्स यानी विधायकों की बाड़ेबंदी होती रही है।

पहली बार कर्नाटक में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की शुरूआत 1984 में हुई लेकिन तब आंध्र प्रदेश की सरकार को बचाने के लिए कर्नाटक से रणनीति बनाई गई थी। केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने 20 महीने पुरानी टीडीपी सरकार का तख्तापलट किया था, जो आंध्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 1984 को कांग्रेस के कहने पर टीडीपी के मंत्री एन. भास्कर राव ने खुद सीएम पद की शपथ ले ली। उस समय टीडीपी नेता और राज्य के सीएम एनटी रामा राव अमेरिका में बायपास सर्जरी करा रहे थे। कहा गया कि भास्कर राव को मुख्यमंत्री बनाने में तत्कालीन राज्यपाल राम लाल ने मदद की।

आंध्र में तख्तापलट की इस घटना ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के कान खड़े कर दिए। तब हेगड़े ने भी कर्नाटक में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनाई थी। उन्होंने आंध्र प्रदेश से टीडीपी 161 विधायक जो एनटीआर के समर्थक थे उन्हें हैदराबाद से बेंगलूरु बुलाया और नंदी हिल्स के पास एक रिजॉर्ट में कैद कर दिया। बाद में सभी विधायक कांग्रेस से अपनी सरकार बचाने वापस हैदराबाद गए।

रिजॉर्ट पॉलिटिक्स की इस घटना के बाद इसी प्रकार का दूसरा मामला 2002 में सामने आया। इस बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख ने कांग्रेस के विधायकों को एकजुट रखने के लिए कर्नाटक के तत्कालीन सीएम एसएम कृष्णा से मदद मांगी और महाराष्ट्र के सारे कांग्रेसी विधायकों को बेंगलूरु के बिड़दी के पास एक रिजॉर्ट में कैद कर दिया। उस समय पहली बार कांग्रेस के मौजूदा संकटमोचक डीके शिवकुमार का नाम इसी कारण से सुर्खियों में आया था क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र के विधायकों पर बेंगलूरु में पहरेदारी बैठाई थी। इसी प्रकार वर्ष २०१७ के गुजरात से राज्यसभा चुनाव के दौरान भी गुजरात के 78 कांग्रेसी विधायकों को मोदी-शाह की जोड़ी से बचाने के लिए कर्नाटक में शिवकुमार के हवाले किया गया था। उसी दौरान शिवकुमार के यहां सीआरपीएफ जवानों को साथ लेकर आयकर विभाग ने छापेमारी की थी।

रिजॉर्ट राजनीति में एक और कलंकित इतिहास जनवरी 2006 का है। उस समय एचडी कुमारस्वामी ने कांग्रेस के धरम सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया और अपने 42 विधायकों के साथ एक लक्जरी बस में सवार होकर राजभवन चल दिए। उस समय उस बस को कुमारस्वामी के खास विधायक जमीर अहमद खान खुद चला रहे थे जो इस समय कांग्रेस में हैं और उन्हीं की बस में सवार होकर कांग्रेस विधायक आजकल रिजॉर्ट से विधानसौधा आ जा रहे हैं। कुमारस्वामी ने उस समय भाजपा की मदद से सरकार बनाई और विधायकों को एकजुट रखने के लिए रिजॉर्ट में कैद कर दिया।

बाद के वर्षों में ऐसे कई मौके आए जब कर्नाटक में विधायकों को रिजॉर्ट में कैद कर सरकार बचाने और गिराने की साजिश चलती रही। मौजूदा राजनीतिक संकट में भी यही हो रहा है। कांग्रेस, जद-एस और भाजपा तीनों ने विधायकों को कैद कर रखा है।

विधानसभा चुनाव 2018 के समय 105 सीटें जीतकर भाजपा सरकार नहीं बना पाई थी और 37 सीटों वाले जद-एस के कुमारस्वामी सत्तालोलुप बनकर चिर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की मदद से सीएम बने थे.

ऐसा नहीं है कि सरकार बनाने के खेल में पहली बार कर्नाटक में भ्रष्ट राजनेताओं का कलंकित चेहरा दिख रहा है। कर्नाटक की पूरी राजनीति ही पिछले पांच दशक से भ्रष्टाचार में डूबी है।

कर्नाटक की राजनीति में भ्रष्टाचार का लंबा इतिहास रहा है। देश के अन्य राज्यों की तुलना कर्नाटक में 1970 के दशक के आरंभ में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया्र वह भी भूमि सुधारों के नाम पर। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तब गरीबी हटाओ का नारा दिया था। उनके इस सपने को साकार करने के लिए कर्नाटक के तत्कालीन सीएम देवराज अर्स ने राज्य में भूमि सुधार लागू किया जिसमें बड़े पैमाने पर धांधली की शिकायत हुई। हालांकि अर्स पिछड़ी जाति से आते थे और भी राज्य के पिछड़ी जाति के नेता अर्स को बड़ा समाजसुधारक बताते हैं जिन्होंने पिछड़ों को सत्ता के द्वार तक पहुंचाया लेकिन इन सबमें अर्स के शासनकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार पर आज कोई नहीं बोलता। 1972 से 1977 तक सीएम रहे अर्स ने राज्य में दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक गठजोड़ बनाकर सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब रहे थे.

बाद के वर्षों में जब कर्नाटक में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी और रामकृष्ण हेगड़े मुख्यमंत्री बने तब उन्हें मूल्य आधारित राजनीति करने वाले नेता के रूप में देखा गया। नि:संदेह हेगड़े के 1983 से 88 के सीएम कार्यकाल के दौरान राज्य में बड़े स्तर पर प्रशासनिक सुधार देखा गया जिसमें ग्राम पंचायतों को सशक्त करना सबसे महत्वपूर्ण निर्णय रहा। वैसे हेगड़े का कार्यकाल भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रहा और भूमि अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगे। हेगड़े पर विपक्ष के साथ ही अपने मंत्रिमंडल सदस्यों के फोन टेपिंग कराने का भी आरोप लगा। हालांकि इन तमाम आरोपों के बाद भी हेगड़े की छवि मिस्टर क्लीन की रही। पर जैसा कि मैंने ऊपर जिक्र किया है, हेगड़े ही वह शख्स रहे जिन्होंने देश में रिजॉर्ट राजनीति की शुरूआत की।

इसी दौर में वीरेंद्र पाटिल जब सीएम बने तब उन्होंने राजनीतिक आदर्श कायम किया। अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करने के साथ उन्होंने अपने अन्य विधायकों को भी ऐसा करने कहा। मात्र 11 सदस्यीय मंत्रिमंडल बनाने वाले पाटिल के बारे में कहा जाता है कि वे अपना इस्तीफा अपनी जेब में लेकर चलते थे। पाटिल को लिंगायतों को कांग्रेस के पक्ष में एकजुट करने वाला अंतिम नेता कहा जाता है जब कंाग्रेस ने 177 विधानसभा सीटों में जीत हासिल की। हालांकि तब के पीएम राजीव गांधी दंगों के बाद बेंगलूरु आए और अस्पताल में दाखिल पाटिल को बिना बताए सीएम पद से हटाने का निर्देश दे दिया। कर्नाटक में यह कांग्रेस के लिए ताबूत में कील वाला निर्णय बना और उसी समय से लिंगायतों का कांग्रेस से मोह भंग होकर भाजपा की ओर झुकाव हुआ। अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 36 सीटों पर सिमट गई। बाद में कभी भी कांग्रेस के अच्छे दिन कर्नाटक में नहीं आए।

भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक आरोप एम वीरप्पा मोइली के सीएम कार्यकाल में लगा। 1993 जब केंद्र में नरसिह्म राव की सरकार को बहुमत साबित करना था उस समय मोइली पर केंद्र सरकार को बचाने के लिए एक करोड़ रुपए नकदी भेजने का आरोप लगा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसद शिबू सोरेन सहित तीन सांसदों तब नरसिह्म राव सरकार बचाने के लिए रिश्वत देने का आरोप लगा। मोइली के मंत्री ए रामलिंगा रेड्डी और एचएम रेवण्णा कर्नाटक से नकदी लेकर दिल्ली जाने के सूत्रधार कहे गए। इस घटना ने पूरे देश में राव सरकार के साथ ही कर्नाटक के भ्रष्टाार को सुर्खियों में लाया। हालांकि बाद में मोइली को इस मामले बरी कर दिया।

कांग्रेस के ही मुख्यमंत्री बने एस. बंगारप्पा भी भ्रष्टाचार के आरोपों से बच नहीं पाए। उन पर कम्प्यूटर घोटाला, रिश्वत, आय से अधिक संपत्ति, डेंटल कॉलेज खोलने की अनुमति के लिए रिश्वत के कई आरोप लगे जिसमें 90 के दशक में बंगरप्पा पर सैंकड़ों करोड़ की बेनामी संपत्ति बनाने का आरोप रहा। इसी प्रकार देवगौड़ा के पीएम बनने के बाद जनता दल सरकार में सीएम बने जेएच पटेल का कार्यकाल भी विवादों में रहा। उन्होंने यहां तक कहा था कि ‘मैं औरत और शराब’ शौकीन व्यक्ति हूं। अब समझिए जो औरत और शराब का शौकीन हो वह और किन किन चीजों का शौकीन हो सकता है।

इस बीच एसएम कृष्णा जब 1999 से 2004 तक सीएम बने तब उन्होंने जरुर बेंगलूरु को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और देश की आइटी राजधानी का गौरव मिला। इस दौरान भ्रष्टाचार का कोई ऐसा मामला नहीं आया जिसे लेकर ज्यादा बवाल हो। बाद में धरम सिंह और एचडी कुमारस्वामी की सरकार बनने और गिरने तक सीमित रही।

भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक खेल भाजपा के सीएम बीएस येड्डियुरप्पा के कार्यकाल में उभरा। बल्लारी में रेड्डी बंधुओं ने लौह अयस्क खनन में ऐसा भ्रष्टाचार किया कि उसे ‘रिपब्लिक ऑफ रेड्डी बंधु’ कहा जाने लगा। येड्डियुरप्पा को भ्रष्टाचार के मामले में सीएम की कुर्सी गंवानी पड़ी और जेल जाना पड़ा। कहा गया कि येड्डियुरप्पा शासन में कर्नाटक में सर्वाधिक भ्रष्टाचार और घोटाले हुए।

वहीं, 2013 में सीएम बने कांग्रेस सिद्दरामैया भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रहे। उन्हें तोहफे में 70 लाख रुपए की घड़ी मिलती थी। लाखों का चश्मा और जूते ही नहीं एक अंग्रेजी दैनिक ने यहां तक लिखा कि वे 15 से 20 हजार का कुर्ता धोती पहनते हैं। एक बार पत्नी के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से 1.5 लाख की साड़ी खरीदी। तो समझिए पैसे कहां से आते होंगे? और मौजूदा सीएम एचडी कुमारस्वामी तो सरकार बचाने के लिए पहले दिन से ही संघर्ष कर रहे हैं।

रिजॉर्ट की राजनीति में करोड़ों रुपए हर दिन स्वाहा कर रहे हैं। पैसे कहां से आते हैं?


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