जब रफ़ी साहब ने लंदन में अपने फैन की ख़ुशी के लिए टैक्सी में एक गीत गुनगुनाया…

Balendushekhar Mangalmurty

” आप इतने नरम और सॉफ्ट स्पोकन हैं, फिर माइक के सामने इतना बुलंद कैसे हो जाते हो?”
संगीतकार रवि मोहम्मद रफ़ी से अक्सर पूछा करते थे. 31 जुलाई 1980 को रफ़ी स्टूडियो में लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के संगीत निर्देशन में धर्मेंद्र और हेमामालिनी अभिनीत फिल्म “आसपास” के लिए एक गाने की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, “तू कहीं आसपास है दोस्त”. गाने की रिकॉर्डिंग होने के बाद रफ़ी साहब ने सीने में दर्द की शिकायत की और फिर आराम करने घर आ गये. उसी दिन हृदय गति रुकने से भारतीय उपमहाद्वीप का महानतम पुरुष गायक चला गया. उस समय उनकी उम्र महज 56 साल की थी. आज रफ़ी साहब के देहांत को 39 साल हो गए, पर रवि का वो सवाल बना रह गया. हिमालय की ऊंचाई की तरह विशाल रेंज और स्टूडियो के रिकॉर्डिंग रूम से बाहर बात करे तो सुनने के लिए पास जाना पड़े !! कैसे?

रवि अपने शुरूआती दिनों को याद करते हुए बताते हैं, मै दिल्ली से बॉम्बे गायक बनने का ख्याल लेकर आया था, आज़ादी का समय था और उस समय एक युवक अपने एक देशभक्ति गीत ” सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों बापू की अमर कहानी” के चलते पुरे हिंदुस्तान में छा रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि इसके सामने गायक बनने की सोचना एक असंभव ख्याल है. फिर मैं संगीत निर्देशन की ओर मुड़ गया. शुरुआत में मैं हेमंत दा के असिस्टेंट के रूप में काम करने लगा. 1955 में स्वतंत्र संगीतकार के रूप में मुझे पहली फिल्म मिली-वचन. उस समय तक वो युवा हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में सूर्य की तरह चमकने लगा था. मैंने तय किया कि अपनी फिल्मों में मुख्य आवाज रफ़ी साहब को रखूँगा. मेरे करियर का पहला गाना रफ़ी साहब ने ही गया था, “एक पैसा दे दे बाबू”

और संगीतकार रवि ने अपनी यादगार संगीत यात्रा में रफ़ी के साथ एक बेहद सफल संगीत जुगलबंदी की. हालाँकि एक दौर ऐसा भी आया, जब वे बी आर चोपड़ा के कैंप के संगीतकार थे और बी आर चोपड़ा के प्रिय गायक महेंद्र कपूर थे. इस पर चर्चा करते हुए रवि कहते हैं, महेंद्र कपूर के आदर्श रफ़ी थे और उन्होंने अपनी गायकी का अंदाज़ अपने आइडियल के सिंगिंग स्टाइल पर ढाला था. रफ़ी साहब और चोपड़ा साहब के बीच कुछ ग़लतफ़हमी के चलते रफ़ी साहब की आवाज का इस्तेमाल चोपड़ा साहब अपनी फिल्मों में नहीं करते थे. 1965 में वक़्त फिल्म के निर्माण के समय मै अड़ गया कि वक़्त का टाइटल सांग मैं रफ़ी साहब की आवाज में ही फिलमाउंगा। मेरी ज़िद के आगे चोपड़ा साहब झुक गए और उन्होंने एक ब्लेंक चेक देते हुए कहा, “जाईये, वे जो भी अमाउंट मांगे, दे दीजिये और उनसे गाना गवाईये”. वक़्त का टाइटल सांग तब रफ़ी साहब ने गाया था, “वक़्त से है दिन और रात” पर उन्होंने इस गाने के लिए अपना फीस लिया.

रवि अपने स्वर्णिम दौर को याद करते हुए खो से जाते हैं, जब मैंने राज कपूर की फिल्म “नज़राना” के लिए एक गाना कंपोज़ किया, “बाज़ी किसी ने प्यार की जीती या हार दी” तो राजकपूर ने अफ़सोस जाहिर करते हुए कहा कि काश बैकग्राउंड की जगह ये गाना मुझ पर फिल्माया जाता ! हालाँकि मुकेश राजकपूर की आवाज थे, पर राज कपूर मानते थे कि रफ़ी मुकेश की तुलना में ज्यादा दमदार गायक हैं.

एक बार एक स्टेज शो के सिलसिले में रवि और रफ़ी इंग्लैंड में थे. एक दोस्त के घर जाने के लिए दोनों ने टैक्सी किराए पर लिया. रास्ते में भारतीय टैक्सी ड्राइवर को रवि ने अपना परिचय “चौदहवी का चाँद” फिल्म के संगीतकार के रूप में दिया। टैक्सी ड्राइवर रफ़ी साहब का फैन था, उसने रवि से गुजारिश की कि रफ़ी साहब तक उनका प्रणाम पहुंचा दे और साथ ही चौदहवी का चाँद फिल्म के टाइटल सांग का दो शुरूआती लाइन गाकर रवि सुनाएँ. रवि के साथ पीछे की सीट पर बैठे रफ़ी इस वार्तालाप को हलके हलके मुस्कुराकर सुन रहे थे. तब रवि ने टैक्सी ड्राइवर से कहा, तुम जिसके फैन हो, वो तुम्हारी ही टैक्सी में बैठे हैं. इतना सुनते ही ड्राइवर ने एकदम से ब्रेक लगाकर टैक्सी रोकी, रफ़ी साहब को प्रणाम रिक्वेस्ट किया कि वे दो लाइन गाकर सुनाएँ. तब रफ़ी साहब ने दो लाइन गुनगुनाया. टैक्सी ड्राइवर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा.


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