कोयले की काली कमाई में कोयलांचल की धरती खून से लाल होती आई है…

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति 

21 मार्च, 2017. धनबाद के पूर्व डिप्टी मेंयर, युवा कोंग्रेसी नेता और मजदुर नेता नीरज सिंह और उसके तीन समर्थको की मंगलवार की शाम पेशेवर शूटरों ने हत्या कर डाली. धनबाद के व्यस्तम, भीड़ वाले इलाके स्टाइल गेट में पेशेवर शूटरों ने कम से कम 60 से 70 राउंड गोलिया चला कोयलांचल को थर्रा दिया. इस हत्या ने एक बार फिर लोगों का ध्यान कोयला माफिया के द्वारा संचालित कोयलांचल की रक्त रंजित राजनीति खींचा.

झारखंड में कोयले की काली कमाई में वर्चस्व को लेकर खून से धरती लाल रही है, पर सरकार एवं पुलिस इसे रोकने में पूरी तरह से असफल रही है. कोयले की अवैध कमाई में राजनेताओं के साथ ही पुलिस अधिकारी गठजोड़ को भी भारी-भरकम राशि मिलती है. बिहार, झारखंड के साथ-साथ उत्तरप्रदेश के भी अपराधी यहां अपना वर्चस्व कायम करने के लिए हिंसक वारदातों को अंजाम देते रहते हैं. पांच सौ करोड़ प्रतिवर्ष की अवैध कोयले की कमाई में वर्चस्व को लेकर हिंसा प्रतिहिंसा का दौर पिछले 50 वर्षों से चला आ रहा है, और निकट भविष्य में इसके थमने के आसार नज़र नहीं आ रहे.

दरअसल, पिछले पांच दशक में माफियाओं ने लेबर युनियन की आड़ में कोयलांचल में अपना वर्चस्व कायम कर लिया है. माफिया शब्द का पहली बार सरकारी भाषा में इस्तेमाल 1988 में हुआ था. बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद ने पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल किया. समय के साथ चेहरे बदलते गए. कोयले की काली धरती खून से लाल होती गई, लेकिन कोयलांचल की तकदीर नहीं बदली.

कोयलांचल के नाम से जाने जाने वाले झारखण्ड के धनबाद जिले में पिछले 50 सालों से कोयला माफिया, अपराधियों और राजनेताओं का गठजोड़ बना हुआ है. यह गठजोड़ यहाँ समान्तर सरकार चलाता रहा है और हमेशा ही सरकार और प्रशासन पर भारी पड़ता रहा है.

धनबाद के एमपी रहे माक्र्सवादी लीडर एके रॉय ने 80 के दशक में पार्लियामेंट में धनबाद के माफिया राज पर बहस के दौरान कहा था, हमारे धनबाद में आजकल  ए+बी+सी=डी हो गया है. उन्होंने इस एब्रीविएशन का खुलासा करते हुए आगे कहा था आरा+बलिया+छपरा =धनबाद. उनके कहने का मतलब था कि धनबाद में इन इलाकों के बाहुबलियों का राज चलता है.

1970 के दशक से गैंगवार की शुरुआत हुई: 

B P Sinha, trade union leader

धनबाद में कोयला पर राज करने के लिए 1970 के दशक से गैंगवार की शुरुआत हुई. उस समय वहां के कोयला कारोबार पर भूमिहार जाति के दबंग नेता  बी पी सिन्हा का राज था. दबदबा ऐसा कि उनकी बात पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी नहीं काट पाती थीं.  जब कोलियरी खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ तो सिन्हा ने 30 हजार लोगों को नौकरी दिलाने का काम किया. सुरक्षा के लिए सिन्हा ने बलिया से एक लठैत को बुलाया, जिसका नाम सूर्यदेव सिंह था. सन 1971 आते आते सूर्यदेव सिंह कोयला कारोबारियों के बीच अपनी गहरी पैठ बनाने में कामयाब हो गये. अपने बाहुबल और भाईयों की ताकत की बदौलत उन्हें लगने लगा था कि वह खुद अपनी अलग जमीन तैयार कर सकते हैं. धीरे धीरे उन्होंने बीपी सिन्हा की जड़ खोदनी शुरू कर दी. 1978 में बी पी सिन्हा की ह्त्या हो गयी और उसका इलज़ाम सूर्यदेव सिंह पर आया. पर कुछ समय के बाद सिन्हा हत्याकांड में अदालत ने उन्हें बरी कर दिया. धनबाद में कोयला, स्क्रैप के धंधे से लेकर ट्रेड यूनियन तक में माफिया स्टाइल की शुरुआत 1950 के दशक के आस-पास हुई, जब बी.पी. सिन्हा इस इलाके में ट्रेड यूनियन के सबसे बड़े नेता के रूप में उभर रहे थे. उन्होंने बिहार और यूपी के सीमावर्ती इलाकों से लठैतों और बाहुबलियों की एक फौज इस इलाके में ‘आयात’ की और ट्रेड यूनियन से लेकर स्थानीय राजनीति तक में लगभग दो दशकों तक अपना सिक्का कायम रखा.  सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाकेे में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी. 28  मार्च 1979 में सिन्हा की उनके आवास पर ही हत्या कर दी गई. इस हत्या में खुद उन्हीं की छाया में पले बाहुबलियों का नाम उछला था. दरअसल सिन्हा ने जिस माफिया स्टाइल की नींव डाली थी, उसके शिकार वो खुद बन गए.

वर्ष 1950 में सूर्यदेव सिंह (झरिया से भाजपा विधायक संजीव सिंह के पिता) यूपी के बलिया से नौकरी करने धनबाद आये थे. – उस समय बीपी सिंह कोयलांचल में सबसे दबंग व्यक्ति थे और इनके पास कई कोलियरियां और कोल माइंस का काम था. मजदूरों को काबू में रखने के लिए इन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बना रखी थी. इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे. 1970 के आसपास सूर्यदेव सिंह सबको पीछे छोड़ते हुए धनबाद के डॉन बन गए. उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई.

1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने. उनकी मौत के बाद बच्चा सिंह उस सीट से विधायक बने. उसके बाद सूर्यदेव सिंह की पत्नी कुंती सिंह और अभी उनके बेटे संजीव सिंह झरिया से विधायक हैं. 1977 से 2014 तक के विधान सभा चुनाव में झरिया विधान सभा सीट पर हमेशा सिंह मेंशन परिवार का ही कब्ज़ा रहा है. केवल 1995 में राजद के टिकट पर आबो देवी को इस सीट से जीत मिल सकी थी.
भारत के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के साथ सूर्यदेव सिंह के काफी गहरे ताल्लुकात रहे. नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे. उन्होंने सूर्यदेव सिंह की हवेली सिंह मेंशन में कुछ समय गुजारा था. उस समय सूर्यदेव सिंह अपने तीन भाईयों राजन सिंह, बच्चा सिंह और रामधीर सिंह के साथ सिंह मेंशन में रहते थे.  सूरजदेव सिंह का सरायढेला स्थित आवास सिंह मैंशन लंबे वक्त तक धनबाद कोयलांचल में कोयले के कारोबार से लेकर रंगदारी के धंधे और ट्रेड यूनियन के सेल्फ स्टाइल्ड सेक्रेटेरियट के रूप में मशहूर रहा.

उनके एक भाई विक्रम सिंह पैतृक घर बलिया में रहते थे. 1991 में सूर्यदेव सिंह की मौत के बाद सिंह मेंशन में बिखराव आने लगा. फिलहाल सिंह मेंशन के बारिस संजीव सिंह हैं. संजीव सिंह को उनके एक चाचा रामधीर सिंह का साथ मिला हुआ है.
सूर्यदेव सिंह की मौत के बाद उनके भाई बच्चा सिंह और राजन सिंह ने सिंह मेंशन से अलग होकर अपनी नयी हवेली रघुकुल बनायी. राजन सिंह के बेटे नीरज सिंह ने पिछले 6-7 सैलून में अपनी जमीन मज़बूत की और अपना दबदबा कायम किया. राजन सिंह की मौत के बाद उनके बेटे नीरज सिंह ने उनकी विरासत संभल ली.

 

वासेपुर की नींव रखने वाले शफी खान:

1986 में शमीम खान, 1984 में असगर और 1983 में शफी खान की ह्त्या कोयलांचल में दबदबा कायम रखने की कोशिश में हुई थी. शफी खान ने ही धनबाद के वासेपुर इलाके में गैंगवार का बीज रोपा था. इसी शफी खान का किरदार फिल्म में मनोज वाजपेयी ने सरदार खान के नाम से निभाया था. 1983 में शफी खान की हत्या उनके दुश्मनों ने बरबा अड्डा पेट्रोल पम्प पर कर दी थी. वासेपुर में आजकल शफी खान के बेटे फहीम खान के नाम का खौफ छाया हुआ है. उसे टक्कर देने वाला दूसरा गंग है साबिर अली का.  फिल्म ” गैंग ऑफ़ वासेपुर के दुसरे भाग में फहीम और साबिर अली गैंग की खुनी लड़ाई दिखाई गयी है. शफी खान द्वारा शुरू किये गए गैंगवार को उसके बेटों ने आगे बढाया. उसका बड़ा बेटा शमीम खान को 1986 में धनबाद सिविल कोर्ट कैंपस में ढेर कर दिया गया. 1989 में उसके छोटे बेटे छोटा खान को रांगा टांड ग्वाला पट्टी में पत्थरों और डंडों से पीट पीट कर मार डाला गया. 2003 में साबिर अली गैंग ने शफी खान के दुसरे बेटे फहीम खान के घर पर गोलियां बरसायीं. पर फहीम खान बच गया. 2010 में साबिर अली के भाई वाहिद आलम की रांची में हत्या कर दी गयी. इसके बाद से वासेपुर में फहीम खान और साबिर अली गैंग के बीच खुनी टकराव चल रहा है.

बी पी सिन्हा से सूर्य देव सिंह से वर्तमान पीढ़ी तक:

कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बीपी सिन्हा ने बनाई. पूरे कोयलांचल में सिन्हा का एकछत्र राज था. बरौनी निवासी बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा 1950 में धनबाद आए. भाषण की कला, हिम्मत, ताकत सबमें माहिर माने जाते थे. कोलियरी मालिकों के बीच उनकी जबरदस्त पैठ बनी. बीपी सिन्हा इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उभरे. युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूरजदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र पहलवान थे. इनका इतना दबदबा था कि इन्हीं की मर्जी से कोयला खदाने चलती थीं. लेकिन 29 मार्च, 1978 को अपने ही लोगों ने उनकी हत्या कर दी. हत्या का आरोप सूरजदेव सिंह और सकलदेव सिंह पर लगा. बीपी सिन्हा की हत्या के बाद सूरजदेव सिंह का नाम उभरा और कोयलांचल में सूरजदेव का राज कायम हो गया.

पूरे कोयलांचल में इनका आतंक था और इनका आवास सिंह मेंशन कोयलांचल की राजनीति और अवैध कमाई की धुरी बना. सिंह मेंशन के इशारों पर ही कोयलांचल में पत्ता हिलता था. वे अपने विरोधियों को बर्दाश्त नहीं कर पाते थे और उन्हें अपने रास्ते से हटाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते. चंद्रशेखर के करीब आकर कोयलांचल में उनका कद और बढ़ गया और पूरे कोयलांचल में सिंह मेंशन की तूती बोलने लगी. 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई. इसके कारण परिवार में ही गैंगवार छिड़ गया और एक दर्जन से ज्यादा लोगों की हत्या हुई.

कोयला माफिया के काम करने का तरीका:

कोयला कंपनियों द्वारा खनन के बाद बंद की गई कोयला खदानों को कोयला तस्कर एवं माफिया निशाना बनाते हैं. रैट होल के जरिए स्थानीय मजदूरों एवं कोयला चोरों को बंद खदानों में खनन के लिए भेजते हैं. इन बंद खदानों की सुरक्षा के लिए कोयला कंपनियां करोड़ों रुपए खर्च करती हैं, इसके बाद भी कोयला तस्कर बंद खदानों से प्रतिदिन लाखों टन कोयला निकालने में सफल होते हैं. इस कोयला की तस्करी कर इसे बनारस सहित देश की अन्य मंडियों में भेजा जाता है. हर पुलिस नाके पर एक निश्चित राशि तय होती है, जिसे कोयला माफिया ईमानदारी से पुलिस को पहुंचा देते हैं.

कोयलांचल में पदस्थापित पुलिस अधिकारियों की कमाई करोड़ों में होती है और ये धंधा बेरोकटोक चलता है. इस अवैध कमाई में राजनेताओं और पत्रकारों का भी हिस्सा होता है. बंद पड़े खदानों से कोयला की तस्करी कर माफिया रातों-रात करोड़पति बन जाते हैं. अब उत्तर प्रदेश के माफियाओं सहित बिहार एवं कोयलांचल के माफियाओं की भी धमक है. छोटे-छोटे कोयला तस्कर इन लोगों द्वारा संरक्षण देने के एवज में एक मोटी राशि माफियाओं को देते हैं, ताकि धंधे में कोई रुकावट न आ सके.

ये छोटे गैंग स्थानीय लोगों से बंद पड़े खदानों से कोयला निकलवाते हैं और प्रति टन 600 रुपए उन्हें देते हैं, जबकि बाजार में इसी कोयले को 7000 रुपए में बेचते हैं. 

कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है. पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं. कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन. इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं. वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है,  हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है. पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है. इतनी हत्याओं के बाद भी कोयले की अवैध काली कमायी से लोगों का मोह भंग नहीं हो पा रहा है, अब तो गोरखपुर के भी माफिया डॉन कोयलांचल के माफियाओं के साथ मिलकर इस अवैध काली कमाई में लग गए हैं.

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 सिंह मैंसन 1977 से  कोयलांचल की राजनीति का केंद्रबिंदु रहा है:

Singh Mansion

सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा. सिंह मेंशन के सूरजदेव सिंह कई बार धनबाद से विधायक चुने गए. उनकी पत्नी कुंति सिंह भी झरिया से विधायक रही, अभी उनका पुत्र संजीव सिंह झरिया से भाजपा काविधायक है. सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही. धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगा. पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़ा हुआ था, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर, जीत संजीव की हुई, इससे परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया. नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई. माना जा रहा है कि कोयले की लोडिंग प्वाईंट पर आउटसोर्सिंग कंपनियों पर कब्जे को लेकर हत्या हुई. आउटसोर्सिंग पर वर्चस्व के लिए बात-बात पर खून की होली खेली जाती है. आउटसोर्सिंग से इन माफियाओं को भारी कमाई होती है. आउटसोर्सिंग कम्पनियां कमीशन के रूप में करोड़ों रुपए माफिया को देती हैं और इसके बदले माफियाओं द्वारा इनको सुरक्षा प्रदान की जाती है. कोयले और सियासत में नीरज सिंह की सक्रियता से कई दुश्मन बन गए थे.

 

Suryadeo Singh

राजनैतिक प्लेटफार्म के सहारे कोयले की काली कमाई पर वर्चस्व जमाने के क्रम में कोयलांचल की धरती खून से लाल होती रही है. धनबाद का इतिहास गवाह है, यहाँ गैंगवार में सार्वजनिक स्थलों पर ही दिनदहाड़े विरोधियो की हत्याए होती रही हैं. शूटर अत्याधुनिक हथियारों का ही इस्तेमाल करते रहे हैं. मजदुर राजनीति के सहारे कोयलांचल पर अपना दबदबा जमाए रखने के उद्देश्य से ही यहाँ गैंगवार होता रहा है. यहाँ बता दे की 80 के दसक से कोयलांचल में जारी गैंगवार में मजदुर नेता बी.पी.सिंह, विनोद सिंह, शकल देव सिंह, संजय सिंह, राजू यादव, गुरदास चटर्जी, प्रमोद सिंह, राजीव रंजन सिंह, गजेंद्र सिंह और सुरेश सिंह की हत्या हो चुकी है. हत्या की इस कड़ी में अब पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह का भी नाम जुड़ चुका है.

डिप्टी मेयर नीरज सिंह और झरिया से भाजपा के विधायक संजीव सिंह के बीच वर्षो से अदावत चल रही थी. नीरज सिंह और संजीव सिंह सगे चचेरे भाई भी है. संजीव सिंह के पिता और झरिया के दबंग विधायक रहे स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह ने जनता मजदुर संघ नामक मजदुर संगठन बनाया था. अभी नीरज और संजीव दोनों ही जनता मजदुर संघ पर अपना दावा ठोके हुए हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने झरिया से संजीव सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया था, तो नीरज सिंह झरिया से ही कोंग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर संजीव सिंह को चुनौती दे रहे थे. यही नहीं नीरज और संजीव समर्थको के बीच कोल्यारी क्षेत्रो में पचासो बार हिंसक झड़प हो चुके हैं.

 

गैंग्स ऑफ वासेपुर और सिंह मैंशन के बीच तो वर्षो से छत्तीस का आंकड़ा है:

गैंग्स ऑफ वासेपुर और सिंह मैंशन के बीच तो वर्षो से छत्तीस का आंकड़ा है. 80 के दशक में जेल के अंदर फहीम खान के पिता शफी खान और झरिया के तत्कालीन विधायक सूर्यदेव सिंह के बीच विवाद हुआ था. बाद में शफी खान की जीटी रोड पर तोपचांची में हत्या कर दी गई थी. इस हत्या के लिए गैंग्स ऑफ वासेपुर सूर्यदेव सिंह को जिम्मेवार मानता है. इस समय जेल में सूरजदेव सिंह के पुत्र विधायक संजीव सिंह और शफीक खान की तीसरी पीढ़ी के इकबाल खान अपने फुफेरे भाइयों के साथ बंद हैं.

सिंह मेंशन का बलिया से लेकर धनबाद तक कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक दबदबा रखने वाले इस परिवार की हमेशा से ही सियासत में बड़ी भूमिका रही है. नीरज के पिता स्व. राजन सिंह के बड़े भाई स्व. सूर्यदेव सिंह  लगातार  कई साल तक धनबाद के विधायक रहे. उनके निधन के बाद उनकी पत्नी कुंती सिंह भी झरिया से विधायक रहीं. राजन सिंह के एक अन्य भाई बच्चा सिंह झारखंड में बाबू लाल मरांडी की सरकार में नगर विकास मंत्री भी रहे। सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह कि धनबाद के मेयर की कुर्सी पूरी तरह परिवार के कब्जे में रही. नीरज सिंह की चाची व रामधीर सिंह की पत्नी इंदू सिंह मेयर थीं तो खुद नीरज सिंह ने धनबाद से पिछला विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था. हालांकि खास बात यह की खिलाफ में उनके ही चचेरे भाई संजीव सिंह ही थे. इससे परिवार के बीच का विवाद सामने आया.

कोयलांचल की चर्चित हत्याएं

वर्ष व मृतक
1967 रामदेव सिंह, 1967 चमारी पासी, 1977 श्रीराम सिंह, 1978 बीपी सिन्हा, 1983 शफी खान, 1984 मो असगर, 1985 लालबाबू सिंह, 1986 मिथलेश सिंह, 1987 जयंत सरकार, 1986 अंजार,1986 शमीम खान, 1988 उमाकांत सिंह, 1989 मो सुल्तान, 1989 राजू यादव,1994 मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 विनोद सिंह, 1999 सकलदेव सिंह, 2000 रवि भगत, 2001 जफर अली, 2001 नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी, 2002 सुशांतो सेनगुप्ता, 2003 प्रमोद सिंह
2003 राजीव रंजन सिंह, 2006 गजेंद्र सिंह, 2009 वाहिद आलम, 2011 इरफान खान, 2011 सुरेश सिंह, 2012 इरशाद आलम उर्फ सोनू , 2014 टुन्ना खान, 2017 रंजय सिंह

भूमिहार जाति के दबंग नेता  बीपी सिन्हा की हत्या की खबर राष्ट्रीय सुर्ख़ियों का विषय बना था:

29 मार्च, 1978 को धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में वीपी सिन्हा रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे. बगल के कमरे में उनकी अपाहिज सास लेटी थी. घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे थे. अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये. इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी. कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी. साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश कर गये. शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं. इतने में साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार कर देता है. करीब सौ गोलियां चलती है. साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती है. साहेब खून से लथ पथ होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं. उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल होगी. गोलियां चलाते हुए हत्यारे सफेद रंग की एम्बेसडर कार में बैठ कर भाग निकले. पूरे धनबाद जिले में कोहराम मच गया. वीपी सिन्हा की मौत उस समय पूरे देश-दुनिया की सबसे बड़ी खबर बनी थी.

28 मार्च, 1978 में वीपी सिन्हा की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गंठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी. बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखनेवाले वीपी सिन्हा की हत्या में उनके करीबी रहे और झरिया से विधायक बने सूर्यदेव सिंह का नाम आया था. वीपी सिन्हा के बाद पूरे कोयलांचल में सूर्यदेव सिंह का सिक्का चल पड़ा. कोयलांचल में सिंह मैंशन के रूप में मजबूत राजनीतिक घराने की नींव रखी.

बीपी सिन्हा के अलावा 1983 में शफी खान, 1984 में असगर, 1986 में शमीम खान से लेकर 2003 में सुशांतो सेन गुप्ता तक कई ऐसी जिंदगियां बंदूक से खामोश होती रही, जिन्हें बंदूक पर भरोसा था.

आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी.

15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी.

25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले. हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई. सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी. जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी. दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी. अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया.

 

सिंह मैंशन के बड़े युवराज व विधायकजी सूर्यदेव सिंह के बड़े पुत्र राजीव रंजन सिंह के साथ भी बाहुबल व बंदूक की ताकत रही. विनोद सिंह हत्याकांड, सकलदेव सिंह हत्याकांड, मणिंद्र मंडल हत्याकांड, रवि भगत हत्याकांड में राजीव रंजन का नाम आया. तीन अक्तूबर, 2003 में प्रमोद सिंह हत्याकांड में अभियुक्त बनाये जाने के बाद राजीव रंजन सिंह फरार हो गये. करीब 10 वर्षों तक राजीव रंजन की गुमशुदगी रहस्यमय रही. चर्चा होती रही कि सुरेश सिंह ने उत्तर प्रदेश के माफिया डॉन ब्रजेश सिंह के सहयोग से राजीव रंजन की हत्या करा दी. बाद में पुलिस जांच में भी यह खुलासा हुआ.

अपवाद रहे सूर्यदेव सिंह

बंदूक के बल जीने और बंदूक से मरने के मामले में कुछ अपवाद भी रहे. इनमें सबसे प्रमुख नाम है झरिया के विधायक सूर्यदेव सिंह का. उनकी मृत्यु हृदयाघात से हुई थी. इसी तरह सूर्यदेव सिंह के कट्टर विरोधी व जानेमाने मजदूर नेता एसके राय की मृत्यु भी हृदयाघात से हुई थी.

बीपी सिन्हा के पोते ने बनाया झारखंड श्रमिक संघ

बी पी सिन्हा के  एकमात्र पुत्र राजनीति प्रसाद सिन्हा ने भी राजनीति में घुसपैठ की कोशिश की. मगर, सफल नहीं हो पाए. सिन्हा साहब के बूते राजनीति में मुकाम पाए मंत्री रहे एसपी राय ने ही इस परिवार पर नकेल कस दी. बाद में राजनीति प्रसाद सिन्हा की पतोहू डा. उर्मिला सिन्हा ने भी धनबाद नगर निगम के मेयर का चुनाव लड़कर राजनीति में जगह बनाने की कोशिश की. मगर, काफी पूंजी लगाकर भी वह इसमें नाकाम रहीं. सिन्हा साहब का मशहूर व्हाइट हाउस और अंग्रेजी मैम इतिहास की बात है. अब तो वहां टेस्ट ऑफ एशिया नाम का रेस्टोरेंट है, जिसे डा. उर्मिला सिन्हा के  पुत्र बैभव सिन्हा चलाते हैं. कुछ वर्षों से बैभव सिन्हा  रेस्टोरेंट के साथ कांग्रेस के नेता के रूप में राजनीतिक उड़ान भरने की कोशिश कर रहे हैं, पर सिंह मैंसन और रघुकुल के दबंग राजपूतों के बीच वे पिस गये दीखते हैं.


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