बिहार की राजनीति में कब बाहुबली राजनेता बन बैठे पता ही नहीं चला/ भाग7: मुजफ्फरपुर में भूमिहार वर्सेज भूमिहार की जंग

प्रियदर्शन शर्मा 

1990 यानी बिहार में लालू अब सत्ता के केंद्र बिंदु हो चुके थे और जातिवाद का अश्वमेध दौड़ाकर सत्ता पर बने रहना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई बाहुबली तैयार कर लिए थे लेकिन मुजफ्फरपुर में सुलग रही क्रांति को यह मंजूर नहीं था, उसे तो अब सीधे सत्ता में भागीदारी चाहिए थी।

उस दौर में मुजफ्फरपुर में भूमिहार वर्सेज भूमिहार की जंग शुरू हो गई थी। एक तरफ पुराने मुंगेर और बेगूसराय अंचल से आए भूमिहारों का समूह था। वीरेंद्र सिंह, अशोक सम्राट से लेकर मिनी नरेश तक सभी इसी अंचल से आए दबंग थे। दूसरी तरफ तिरहुत अंचल के भूमिहार थे, जिसका प्रतिनिधित्व रघुनाथ पांडे, छोटल शुक्ला, भुटकुन शुक्ला जैसे दबंग कर रहे थे। भूमिहारों की इस आपसी लड़ाई का सबसे बड़ा फायदा उठाया बृजबिहारी प्रसाद ने। बृजबिहारी भी कैंपस की ही पैदाइश थे, लेकिन यह कैंपस लंगट सिंह कॉलज और बिहार यूनिवर्सिटी का कैंपस नहीं था। वह कैंपस था मुजफ्फरपुर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी का।

एमआईटी कैंपस से निकलकर बृजबिहारी ने पूरे बैरिया क्षेत्र में बेहद कम समय में अपनी दबंगई कायम कर ली थी। भूमिहारों की आपसी लड़ाई का सबसे अधिक फायदा बृज बिहारी प्रसाद ने ही उठाया। वह दलितों, पिछड़ों और बनियों का सबसे बड़ा मसीहा बन कर उभरा। तमाम पिछड़ी जातियों को उसने संगठित कर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया। शुक्ला बंधु हों या बृज बिहारी अब वे राजनीति में एंट्री चाहते थे। इस दौरान टाउन थाना के नजदीक छोटन शुक्ला पर हमला हुआ। गोलीबारी में वो बच गए, पर चंद दिनों बाद ही बृजबिहारी पर हमला हो गया। बृजबिहारी भी हमले में बच गए, लेकिन उनका बॉडिगार्ड पवन मारा गया। शुक्ला ब्रदर्श के ऊपर एलपी शाही और हेमंत शाही का हाथ था। वही एलपी शाही जो 1988 में राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में केंद्रीय शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री रहे जबकि हेमंत शाही वैशाली से विधायक थे। वहीं छोटन शुक्ला और बृजबिहारी भी अब राजनीति की तरफ पैरा बढा चुके थे। बृजबिहारी पर लालू का हाथ था। इसी बीच एक बड़ी वारदात ने बिहार की राजनीति में भूचाल ला दिया। वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड में एक टेंडर विवाद में गांव के ही पिछड़ी जाति के दबंगों ने एमएलए हेमंत शाही की दिनदहाड़े हत्या कर दी। इससे पूरा मुजफ्फरपुर जल उठा।

इसी बीच मुजफ्फरपुर में इंट्री हुई कोसी क्षेत्र के बाहुबली आनंद मोहन की। इन्हें साथ मिला शुक्ला ब्रदर्स का। 1980 में आनंद मोहन ने अपनी पार्टी का गठन किया था। नाम रखा था क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी। इसी पार्टी से उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा पर कभी चुनाव जीत न सके। 1990 में उन्होंने जनता दल से विधानसभा का चुनाव लड़ा और विजयी हुए। इसी दौर में वो छोटन शुक्ला के संपर्क में आए और तिरहुत क्षेत्र में अपनी पार्टी के साथ पांव जमाना चाहा। आनंद मोहन और छोटन शुक्ला की दोस्ती ने मुजफ्फरपुर के इतिहास में भूमिहार और राजपूत जातियों का मिलन हुआ। पहली बार भूमिहार और राजपूत एक साथ अपने अस्तित्व की लड़ाई में साथ आए।

उधर, एमएलए हेमंत शाही की हत्या के बाद खाली हुई सीट पर दोबारा चुनाव हुए। खुले तौर पर लड़ाई भूमिहार और यादवों की थी। छोटन शुक्ला, आनंद मोहन की जोड़ी ने हेमंत शाही की पत्नी वीणा शाही को भारी मतों से चुनाव जितवाया। जनता दल से अलग होकर 1993 में आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी की स्थापना की। साल 1994 में आनंद मोहन ने वैशाली लोकसभा सीट के उपचुनाव में इसी पार्टी के बैनर तले अपनी पत्नी लवली आनंद को खड़ा किया। छोटन शुक्ला का इस क्षेत्र में पूरा दबदबा था। लवली आनंद को खुलकर समर्थन मिला। वो चुनाव जीत गई। दरअसल छोटन शुक्ला आनंद मोहन के जरिए राजनीति में आने की पूरी तैयारी कर चुके थे। भूमिहार और राजपूत जातियों के गठबंधन ने बिहार में सियासी भूचाल ला दिया था। सबसे अधिक परेशान लालू प्रसाद यादव थे। क्योंकि तिरहूत क्षेत्र में उन्हें अपनी स्थिति कमजोर लगने लगी थी और सामने1995 का बिहार विधानसभा था।

इस बीच 1994 में दो बड़ी घटना हुई। अशोक सम्राट भी राजनीति में कदम रखना चाहता था लेकिन 1994 में उसका एनकाउंटर हो गया। बिहार विधानसभा के चुनाव नजदीक थे। भूमिहार और राजपूत एकता ने यादवों की नींद उड़ा रखी थी। सबसे अधिक परेशान बृजबिहारी प्रसाद थे। मुजफ्फरपुर की राजनीति भूमिहार बनाम बनिया की होती है। 1985 से 1995 तक रघुनाथ पांडे ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। जबकि 1995 से 2010 तक विजेंद्र चौधरी विधायक रहे। विजेंद चौधरी ने बृजबिहारी के दम पर ही चुनाव जीता था। छोटन शुक्ला भी अब राजनीति में आने को तैयार थे। 4 दिसम्बर 1994 को जब छोटन शुक्ला अपने साथियों के साथ अपने विधानसभा क्षेत्र से चुनावी बैठक और प्रचार कर लौट रहे थे तो बृजबिहारी गली में चारों तरफ से घेरकर उनपर एके 47 की बौछार कर दी गई। छोटन शुक्ला के साथ उनके बॉडिगार्ड भी मारे गए। सीधा आरोप बृजबिहारी पर लगा। बताते हैं कि छोटन शुक्ला की हत्या के बाद शहर के एक छोर पर कई घरों में चूल्हा नहीं जला, जबकि बृजबिहारी के क्षेत्र में पटाखों की गूंज सुनाई दी। जश्न हुआ।

छोटन शुक्ला की हत्या के बाद वह हुआ जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली गई। एनएच-24 होकर उनकी शवयात्रा उनके पैतृक गांव की ओर प्रस्थान कर रही थी। कहते हैं करीब 20 हजार की संख्या में छोटन शुक्ला के समर्थक इस शवयात्रा में शामिल थे। इसी बीच गोपालगंज के जिलाधिकारी DM जी. कृष्णैया की गाड़ी वहां से गुजर रही थी। साइड लेने के लिए ड्राइवर ने हॉर्न बजाया। आक्रोशित भीड़ और उग्र हो गई। किसी ने यह नहीं देखा कि कार में कौन बैठा है। बत्ती लगी गाड़ी देखते ही भीड़ ने हमला कर दिया। देखते-देखते चंद मिनट में गोपालगंज के जिलाधिकारी की भीड़ ने हत्या कर दी। उन्हें बेहद करीब से गोली मारी गई थी। बिहार में मॉब लिंचिंग की यह सबसे बड़ी घटना थी। पूरे बिहार में तहलका मच गया। इस हत्याकांड की गूंज दिल्ली तक पहुंच गई। स्पेशल टीम ने बिहार में कैंप किया। पूरे देश में अंडरवल्र्ड डॉन छोटन शुक्ला और जिलाधिकारी जी कृष्णैया की हत्या गूंजने लगी। जिलाधिकारी हत्या के मुख्य आरोपी भुटकुन शुक्ला, आनंद मोहन, लवली आनंद, मुन्ना शुक्ला को बनाया गया।

दरअसल बिहार विधानसभा चुनाव 2000 के दौरान जो दर्जन भर बाहुबली विधायक जीते थे और मोकामा वाले सूरजभान ने डंके की चोट पर नीतीश कुमार के समर्थन की घोषणा की थी, उसकी पटकथा 1990 से ही लिखी जा रही थी।

पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाले बृजबिहारी प्रसाद ने अपनी छवि रॉबिनहुड की बना रखी थी। इसीलिए कम समय में उनका वोट बैंक काफी मजबूत हो चुका था। यही कारण है कि वो लालू यादव के कोर टीम के हिस्सा था। लालू यादव की सरकार में बृजबिहारी प्रसाद की तूती बोलती थी। हालांकि १९९६ में एक घोटले के बाद लालू और बृज बिहारी में दूरी बढ गई। अपने खिलाफ सीबीआई जांच से परेशान बृज बिहारी तनाव के कारण बीमार हो गया था। उसे आईजीआईएमएस पटना में दाखिल कराया। और 13 जून 1998 को शाम 8.15 बजे अस्पताल में ही बृज बिहारी की एके 47 से हत्या कर दी गई। लालूराज में यह अब तक की सबसे बड़ी हत्या थी। उस रात पूरे मुजफ्फरपुर में जश्र मनाया गया।

हत्याकांड में मुजफ्फरपुर से मोकामा तक के कई बाहुबलियों के नाम आए। सूरजभान सिंह, श्रीप्रकाश शुक्ला, मुन्ना शुक्ला, मंटू तिवारी, राजन तिवारी, भूपेंद्र नाथ दूबे, सुनील सिंह, अनुज प्रताप सिंह, सुधीर त्रिपाठी, सतीश पांडे, ललन सिंह, नागा, मुकेश सिंह, कैप्टन सुनील उर्फ सुनील टाइगर जैसे नाम आए। बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। पटना की निचली अदालत ने 12 अगस्त 2009 में दो पूर्व विधायकों राजन तिवारी और विजय कुमार शुक्ला उर्फ मुन्ना शुक्ला, पूर्व सांसद सूरजभान सिंह सहित 8 अभियुक्तों को इस मामले में दोषी पाया था। इन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई। सभी ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। बाद में लंबी बहस के सबूतों के आभाव में पटना हाईकोर्ट ने बृजबिहारी हत्याकांड के सभी अभियुक्तों को 25 जुलाई 2014 को बरी कर दिया। न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति वीएन सिन्हा की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को पूरी तरह खारिज  कर दिया। हाईकोर्ट ने जेल में बंद राजन तिवारी, मंटू तिवारी और मुन्ना शुक्ला को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। जबकि, जमानत पर चल रहे पूर्व सांसद सूरजभान सिंह, मुकेश सिंह, ललन सिंह, कैप्टन सुनील सिंह को बेल बांड से मुक्त कर दिया।

बिहार की राजनीति में कब बाहुबली राजनेता बन बैठे पता ही नहीं चला/ भाग6:कहानी हेमंत शाही और रघुनाथ पाण्डेय की


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