उमराव जान का किरदार मानो रेखा के लिए ही बना था !!

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति
1972 में मीना कुमारी की अदाकारी से सजी फिल्म आयी थी, पाकीजा. पाकीजा ने वैश्याओं पर बनी फिल्मों के लिए एक मिसाल कायम की. न केवल मीना कुमारी की अदाकारी की चर्चा हुई, बल्कि गुलाम मुहम्मद के संगीत की भी काफी तारीफ हुई. गुलाम मुहम्मद का इस फिल्म के संगीत निर्माण के दौरान देहांत हो गया, जिसे नौशाद ने पूरा किया. हालांकि ये फिल्म संगीत के लिए फिल्म फेयर अवार्ड नहीं ले पायी और शंकर जयकिशन की बेहद औसत फिल्म बेईमान से पिछड़ गयी. पर पाकीजा का संगीत अमर है और साथ में अमर है मीना कुमारी का अभिनय .

लगभग एक दशक के बाद 1981 में मुज़फ्फर अली ने रेखा को लेकर उमराओ जान फिल्म बनायी. जिसके संगीत का जिम्मा संभाला मरहूम खैयाम ने.
खैय्याम कुछ इस तरह  उमराव जान के संगीत निर्माण की कहानी याद करते हैं, ‘पाकीज़ा’ की जबर्दस्त कामयाबी के बाद ‘उमराव जान’ का संगीत बनाते समय उन्हें बहुत डर लग रहा था. पाकीज़ा और उमराव जान की पृष्ठभूमि एक जैसी थी. ‘पाकीज़ा’ कमाल अमरोही साहब ने बनाई थी जिसमें मीना कुमारी, अशोक कुमार, राज कुमार थे. इसका संगीत गुलाम मोहम्मद ने दिया था और यह बड़ी हिट फ़िल्म थी. ऐसे में ‘उमराव जान’ का संगीत बनाते समय मैं बहुत डरा हुआ था और वो मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती थी. लोग ‘पाकीज़ा’ में सब कुछ देख सुन चुके थे. ऐसे में  उमराव जान के संगीत को खास बनाने के लिए मैंने इतिहास पढ़ना शुरू किया.”

आखिरकार खय्याम की मेहनत रंग लाई और 1982 में रिलीज हुई मुज़फ़्फ़र अली की ‘उमराव जान’ ने कामयाबी के झंडे गाड़ दिए. ख़य्याम ने कहा, “रेखा ने मेरे संगीत में जान डाल दिया उनके अभिनय को देखकर लगता है कि रेखा पिछले जन्म में उमराव जान ही थी।”

फिल्म के तीन हीरो हैं, खैय्याम, आशा भोंसले और उमराव जान के दर्द को परदे पर जी लेने वाली रेखा.

फिल्म 1905 में प्रकाशित उपन्यास ” उमराव जान अदा” पर आधारित है लखनऊ के एक कोठेवाली की कहानी कहती है.
फिल्म शुरू होती है फैज़ाबाद में. बैकग्राउंड में खैय्याम की पत्नी मशहूर गायिका जगजीत कौर और कोरस में एक पारम्परिक गीत से ” काहे को बियाहे विदेश बाबुल”
12-13 साल की किशोरी अमीरन अपने माँ बाप और छोटे भाई के साथ फैज़ाबाद में रहती है. 1840 का साल है. उसके पिता अपने पड़ोसियों के साथ कबूतरबाज़ी कर रहे हैं. अमीरन के अब्बा का अपने पड़ोसियों के साथ अनबन चल रही है. अमीराँ की जिंदगी ख़ुशी ख़ुशी बीत रही है. एक दिन अमीरन को अगवा कर लिया जाता है और उसे लखनऊ में खानम जान के कोठे पर बेच दिया जाता है. बेचारी अमीरन हुलस कर रह जाती है पर उसके पास उसी कोठे पर दिन गुज़ारने के सिवा कोई चारा नहीं.
खानम जान कहती है, जाने कहाँ कहाँ से बच्चियों को उठा लाते हैं. इन बच्चियों को नृत्य संगीत का प्रशिक्षण देकर लखनऊ के नवाबों और रईसजादों के मनोरंजन के लिए पेश किया जाता है. उनकी किस्मत में दोयम दर्जे की जिंदगी ही है. एक उदाहरण देते हुए खानम जान कहती है कि एक बार एक बांदी से नवाब की बेगम जलभुन गयी, फिर उसे सीखचों दाग दाग कर मार डाला था.

लिहाजा अमीरन की जिंदगी भी इसी ढर्रे पर गुजरनी थी.अमीरन का नाम बदल कर उमराव जान रख दिया जाता है. समय के साथ संगीत, नृत्य और शायरी की शिक्षा पाकर उमराव जान एक सोफिस्टिकेटेड महिला के रूप में निखर जाती है और ऐसे में लखनऊ के रईसज़ादे उसकी ओर खींचे चले आते हैं.

महफ़िल सजी है. उमराव जान जलवा अफ़रोज़ है.
मुज़रा चल रहा है: दिल चीज ,क्या है, आप मेरी जान लीजिये; बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये. उमराव की अदाओ से नवाब और रईसज़ादे घायल हो रहे रहे हैं.
इन रईसजादों में उमराव को नवाब सुल्तान (फारुख शेख) से लगाव हो जाता है, कोठे पर ही रहने वाला और पलने वाला गौहर मिर्ज़ा ( नसीरुद्दीन शाह) भी उमराव के प्रति सॉफ्ट कार्नर रखता है, अपनी हैसियत के चलते नवाब और उमराव के बीच सन्देश लाने ले जाने का काम करता है.
नवाब और उमराव कोठे के अलावा अलग अलग जगहों पर मिलते हैं, उनका प्यार खिल रहा है. एक दिन जब लखनऊ के बाहर जंगल से लगी एक सुनसान हवेली में वे समय बिता रहे थे, उसी समय डाकुओं की एक टोली ने दल पर हमला बोल दिया और खानम जान की बेटी बिस्मिल्लाह को अगवा करके ले गए.

नवाब की शादी होने वाली है और इज़्ज़त का वास्ता देकर अब उसने उमराव् से मिलना जुलना बंद कर दिया है. उमराओ टूट जाती है. तब कोठे पर फैज़ अली ( राज बब्बर) आता है. फैज़ अली डाकू है, हालाँकि वो फैज़ अली की असलियत से नावाकिफ है. फैज़ अली से प्रभावित होकर और अपने अकेलेपन से परेशां होकर उमराओ जान फैज़ अली के करीब के करीब आ जाती है. एक दिन फैज़ अली के साथ लखनऊ से निकल भागती है, पर रास्ते में पुलिस से मुठभेड़ में फैज़ अली मारा जाता है.
उमराव जान एक बार फिर अकेली हो जाती है, वह कानपुर चली जाती है. कानपुर में उसकी मुलाक़ात एक बार फिर नवाब सुल्तान से होती है. कानपुर में रुकने का फैसला करती है और वही मुज़रे करने का फैसला करती है उमराव जान, लेकिन खानम जान के लोग उसे लखनऊ लिवा लाते हैं. एक बार फिर से जिंदगी पुराने ढर्रे पर आ जाती है.

इधर लखनऊ में राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है. ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार लखनऊ पर कब्ज़ा करने के लिए सिपाहियों को भेज देती है. शहर के लोगों में भगदड़ मच जाती है. वे शहर छोड़ कर भागने लगते हैं. उमराव जान भी जान माल की हिफाज़त की खातिर लखनऊ का कोठा खाली कर देती है.

चलते चलते उमराव का काफिला रात में आराम को ठहरता है. उमराव की चर्चा लखनऊ तक ही सीमित नहीं, उसके जलवे के चर्चे दूर दूर तक हैं. रात में मुज़रे का आयोजन होता है.
उमराव गा रही है: ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है !
लोग झूम रहे हैं.
उमराव को याद आ रहा है. यहीं तो उसका घर था जहाँ से उसे अपने माँ बाप और भाई से दूर ले जाकर बेच दिया गया था.
उमराव तड़प उठती है. उसके कदम अपने घर की ओर बढ़ जाते हैं.
वर्षों बाद उमराव अपनी माँ से मिलती है. दोनों गले मिलकर आठ आठ आंसू बहा रही हैं. ये ख़ुशी के आंसू हैं.
तभी पीछे से भाई की आवाज गूंजती है, ” ये अमीरन नहीं, लखनऊ की मशहूर तवायफ उमराव जान है. ”
उमराव चौंक कर पलटती है. बचपन का वो छोटा भाई क्या अब इतना बड़ा हो गया है?
भाई बोले जा रहा है, ” खूब खानदान का नाम रोशन किया है. हम तो समझे थे तुम मर चुकी हो. बेहतर होगा तुम यहाँ से चली जाओ.

उमराव अब नहीं रूकती है. लखनऊ वापस अपने कोठे पर लौटती है. पाती है, कोठा उजर चुका है.
फिल्म इस दृश्य के साथ ख़त्म हो जाती है. दर्शक मन में सवालों के साथ सोच में पड़ जाते हैं, उमराव का फिर क्या हुआ? उमराव जीवन में कितनी अकेली रही? दर्द बांटने वाला कोई नहीं, हुस्न के प्रशंसक और उस पर अशर्फियाँ लुटाने वाले ढेर सारे रईसज़ादे मिले.

फिल्म ने रेखा के लीजेंड को क्रिएट करने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी है.

रेखा ने फिल्म में उमराव जान के दर्द, उसकी शोखियों को बेहद प्रभावशाली अंदाज़ में उभारा है. फिल्म ने रेखा के लीजेंड को क्रिएट करने में बहुत बड़ी भूमिका निभायी है. हालाँकि फिल्म व्यवसायिक रूप से सफल नहीं हुई, पर हिंदी सिनेमा का एक क्लासिक है, उमराव जान.
रेखा को जहाँ बेस्ट एक्टिंग का नेशनल अवार्ड मिला वहीँ खैय्याम को संगीत का नेशनल अवार्ड और फिल्म फेयर अवार्ड दोनों मिला. आशा भोंसले को प्लेबैक का नेशनल अवार्ड मिला. फिल्म निर्देशक मुज़फ्फर अली को निर्देशन के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला.

फिल्म के गीत लिखे हैं शहरयार ने. इस फिल्म में आशा भोंसले के गाये मशहूर ग़ज़लों जैसे दिल चीज क्या है, ये क्या जगह है, इन आँखों की मस्ती में, के अलावा तलत अज़ीज़ की आवाज में एक ग़ज़ल ” जिंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें” , उस्ताद मुस्तफा खान और शाहिदा खान निज़ामी का गया एक गीत “झूला किन्ने डाला” और जगजीत कौर की आवाज में अमीर खुसरो ” काहे को बियाहे बिदेस बाबुल” बहुत सराहे गए.

अगर कुछ इस तरीके से कहें तो नाइंसाफी नहीं होगी.
एक तरफ पाकीजा में लता; तो उमराव जान में आशा; पाकीजा में मीना कुमारी, उमराव जान में रेखा; पाकीजा में गुलाम मुहम्मद साहब तो उमराव जान में खैय्याम साहब ! दो छोर पर खड़ी एक विषय पर दो बेमिसाल फ़िल्में. तीसरा तो कोई किनारा ही नज़र नहीं आता. उमराव जान न होती तो रेखा का लीजेंड कैसे क्रिएट होता !! ये अदा ये अंदाज़, ये खूबसूरती और वो दर्द !!

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