साहब, बीबी और गुलाम: पतनशील ज़मींदारी संस्कृति के ढेर पर खड़ी एक बेमिसाल फिल्म

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

प्रसिद्द बंगाली कथाकार विमल मित्र के उपन्यास साहब बीबी गोलाम पर आधारित इंडियन सिनेमा की क्लासिक फिल्म साहब बीबी और गुलाम एक तरफ 20वी सदी के मध्य के दौरानबंगाल में जमींदारी व्यवस्था के पतन की दास्तान है, वहीँ प्रगतिशील और पारम्परिक समाज में स्त्री के स्थान, उसकी प्राथमिकताओं पर चर्चा है, और ये चर्चा चलती है साहब ( रहमान), बीबी ( छोटी बहु, मीना कुमारी) और गुलाम ( हवेली का नौकर, भूतनाथ, गुरुदत्त) के आपसी संबंधों के तानेबाने के इर्द गिर्द बुनी हुई.

फिल्म की शुरुआत होती है, एक हवेली के खँडहर को तुड़वाते हुए ओवरसियर भूतनाथ के साथ. ,भूतनाथ किसी ज़माने में इसी हवेली का नौकर था, जो नदिया जिले से कलकत्ते आया था. एकदम गंवार, भोला भाला. जिसे जिंदगी से बहुत कुछ नहीं चाहिए था, दो वक़्त भरपेट भोजन मिल जाए, कुछ पैसे मिल जाएँ. बस.
भूतनाथ सोच रहा है, किसी जमाने में क्या शान थी इस हवेली की !!

यहाँ से कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है.
भूतनाथ काम की तलाश में नदिया जिले से कलकत्ते आया है. चौधरी खानदान की आलीशान हवेली है. यहीं उसके जीजा टीचर के तौर पर नियुक्त हैं, हालाँकि वे पढ़ाना कब का छोड़ चुके हैं, पर उन्हें वेतन समय पर मिलता रहता है.
हवेली में नौकर चाकरों की भरमार है. समय तेजी से बदल रहा है, पर हवेली में मालिकों का जीवन एक खास शैली का अभ्यस्त पिछले कई दशकों से है. दिन भर सोना, रात में कोठे पर महफ़िल ज़माने के लिए निकल जाना, कबूतरबाज़ी, कुत्तों की शादी पर लाखों खर्च देना, गरीब किसानों की जमीनों को लगान समय पर न चुका पाने के एवज में हड़प लेना, विरोध करने पर अपने लठैतों से निपटा देना.

इसी हवेली में रहती है छोटी बहु. छोटे मालिक ( रहमान) की पत्नी। छोटी बहु एक गरीब परिवार से आयी है और उसके संस्कार उसे पति को देवता का दर्जा देने को ट्रेनिंग दिए हुए हैं. वो हवेली के तौर तरीकों से सामंजस्य नहीं बिठा पा रही है. पति के साथ के लिए तड़पती छोटी बहु हर रात अपने पति को कोठे पर जाने से रोकती है, पर असफल रहती है. छोटे मालिक उससे कहते हैं, तुमने चौधरियों को नामर्द समझ रखा है क्या?
इस हवेली में बड़ी बहु है, जो विधवा है और जमींदार समाज के नियमों के अनुसार परदे में तमाम वर्जनाओं के साथ रहती है, जीवन में कोई सुख नहीं, कोई मकसद नहीं. बस जिए जा रहे हैं अपने जीवन का बोझ उठाये. एक मंझली बहु है, मंझले मालिक ( सप्रू) की पत्नी, जिसने छोटी बहु के विपरीत परिस्थितियों से समझौता कर लिया है और घर गृहस्ती में मगन रहती है.

भूतनाथ मोहिनी सिंदूर के दफ्तर में काम करता है, मोहिनी सिंदूर के मालिक सुविनय बाबू (नाज़िर हुसैन) हैं, जो ब्रह्मसमाजी हैं और प्रगतिशील विचारों के मालिक हैं, उनकी बेटी जबा किशोरी है जो पढ़ी लिखी है, और सनातनी ब्राह्मण चौधरी खानदान की औरतों के विपरीत पर्दे में नहीं रहती और अपने पिता की बिजनस में मदद करती है. सनातनी ब्राह्मण भूतनाथ ब्रह्मसमाजियों को मलेच्छ समझता है और सुविनय बाबू के यहाँ भोजन में संकोच करता है. इस रूढ़िवादी विचार के लिए जबा उसे लज्जित करती है.

एक रात हवेली का विश्वस्त नौकर बंशी ( धूमल) भूतनाथ को छोटी बहु के कमरे में ले जाता है, भूतनाथ छोटी बहु के सौंदर्य, और व्यक्तित्व को देखकर मंत्रमुग्ध सा हो जाता है. छोटी बहु उससे मोहिनी सिंदूर की एक डिबिया ला देने का अनुरोध करती है, सिंदूर का भ्रामक प्रचार देखकर वो सोचती है कि वह अपनी गृहस्ती को बचा सकेगी. भूतनाथ उसके लिए सिंदूर की एक डिबिया लाकर देता है. पर सिंदूर बेअसर रहता है. छोटे मालिक हर रात कोठे पर जाते हैं और अहले सुबह शराब के नशे में धुत्त हवेली लौटते हैं.
छोटी बहु अपने पति को अपने पास रोकने के लिए अब अपने पति के कहने पर शराब पीने में पति का साथ देने लगती है. भूतनाथ अब चोरी छुपे छोटी बहु के लिए शराब लाने लगता है. भूतनाथ को मोहिनी सिंदूर के भ्रामक दावे से बहुत दुःख पहुंचता है और इस बात पर वो जबा और उसके पिता से उलझता है और नौकरी छोड़ देता है. उसे छोटी बहु से बहुत लगाव हो गया है और अपनी छोटी बहु का वो बहुत सम्मान करता है.
जबा के पिता जबा की शादी एक युवा ब्रह्मसमाजी सुपवित्र से तय कर देते हैं.
हवेली दिन प्रतिदिन पतन की ओर अग्रसर है. छोटे मालिक कुछ दिन अपनी पत्नी के पास समय बिताने के बाद फिर से कोठे पर जाने लगे हैं. इसी क्रम में कोठे पर एक दिन हिंसक झड़प होती है और सर पर चोट लगने से छोटे मालिक लकवाग्रस्त हो जाते हैं, बिस्तर पकड़ लेते हैं. इधर मंझले मालिक अब हवेली पर ही महफ़िल जमाने लगे हैं.

जबा की शादी तय होने से भूतनाथ दुखी होता है. वह एक ठेकेदार के यहाँ ओवरसियर की नौकरी पर मुंगेर चला जाता है. इस बीच कलकत्ते में घटना क्रम तेजी से करवट बदल रहा है. जबा के पिता की मृत्यु हो जाती है. पिता की मृत्यु के बाद जबा सुपवित्र से विवाह करने से इंकार कर देती है. हवेली में आय को बढ़ाने के लिए कोयले के खदान में निवेश करने का फैसला लिया जाता है. पर जमींदार बेहतरीन बिजनसमैन साबित नहीं होते. लापरवाही में लिया गया फैसला घातक साबित होता है. कोयले का खदान घाटे का सौदा निकल जाता है. चौधरी खानदान को काफी आर्थिक हानि उठानी पड़ती है. हवेली अब ज्यादा नौकर चाकर रखने की स्थिति में नहीं है. हवेली की पुरानी शान नहीं रह जाती.
कुछ महीनों के बाद भूतनाथ कलकत्ते लौटता है. आकर वह छोटी बहु की बिगड़ती स्थिति देखता है. अब छोटी बहु शराब की लती हो चुकी है, एक रात भी वो शराब के बगैर नहीं रह सकती. जबा से बात करने पर उसे पता चलता है कि बचपन में उसकी और जबा की मंगनी हो चुकी थी.
एक रात छोटी बहु फिर भूतनाथ को अपने कमरे में बुलाती है. छोटी बहु को शराब पीने से रोकने पर भूतनाथ और छोटी बहु में उग्र बहस होती है. इस बहस को मंझले मालिक सुन लेते हैं, उन्हें दोनों के बीच अवैध सम्बन्ध का शक होता है.
अगली रात भूतनाथ के साथ छोटी बहु एक मज़ार के बाबा के पास जाने के लिए घोड़ागाड़ी से निकलती है. मंझले मालिक अपने लठैतों को बुलाते हैं और उन्हें कुछ आदेश देते हैं.
रास्ते में घोड़ागाड़ी पर लठैतों का हमला होता है. हमले में भूतनाथ बेहोश हो जाता है. और छोटी बहु का अपहरण हो जाता है. भूतनाथ की सेवा शुश्रुषा जबा करती है , पर छोटी बहु का कहीं कुछ अता पता नहीं.

दिन बढ़ते जाते हैं. कहानी एक बार फिर फ्लैशबैक से वापस वर्तमान में आ जाती है. हवेली के खँडहर को ढहाया जा रहा है. अचानक मज़दूर भूतनाथ को आवाज देते हैं, भूतनाथ साइट पर पहुँचता है. एक कंकाल मिला है, कंकाल के हाथ में सोने के कंगन को देखकर भूतनाथ के मुंह से बेसाख्ता निकलता है: “छोटी बहु !!”
अंतिम दृश्य में भूतनाथ बग्घी पर जबा के साथ चल पड़ता है. जबा और भूतनाथ अब पति पत्नी हैं. फिल्म इस मोड़ पर आकर खत्म हो जाती है.

29 जुलाई 1962 को साहब, बीबी और ग़ुलाम फिल्म रिलीज़ हुई.
कागज़ के फूल फिल्म की व्यवसायिक असफलता ने गुरु दत्त को तोड़कर रख दिया था. उन्होंने इसके बाद कोई फिल्म डायरेक्ट नहीं की. वहीदा रहमान कागज़ के फूल को करते हुए कहती हैं कि गुरु दत्त अपनी फिल्मों को लेकर बड़े फिलोसोफिकल थे. उन्हें इस फिल्म की असफलता का कुछ अंदेशा हो गया था. वे कहा करते थे, ” ये फिल्म इतनी बड़ी बनी है, शायद नहीं चलेगी.” फिल्म का निर्देशन उनके मित्र और लेखक अबरार अल्वी ने किया है, पर फिल्म पर गुरु दत्त की इतनी स्पष्ट छाप है कि 6 दशक बीतने के बाद भी विवाद का अंत नहीं हुआ है कि आखिर किसने किया। गुरु दत्त ने सार्वजनिक प्लेटफार्म पर हमेशा अबरार अल्वी को इस फिल्म के निर्देशन का क्रेडिट दिया। वहीदा रहमान ने भी हमेशा अपने इंटरव्यूज में इसी बात की तस्दीक़ की, वैसे गुरु दत्त की फिल्म थी, तो स्वाभाविक था कि वे फिल्म से अलग नहीं रह सकते थे, और उन्होंने अबरार अल्वी को समय समय पर सलाह दी. खुद अबरार अल्वी ने माना कि गुरु दत्त ने गानों का निर्देशन किया, हालाँकि बाकी फिल्म का निर्देशन उन्होंने किया.

साहब, बीबी और ग़ुलाम ऑस्कर के लिए भेजी जाने वाली चौथी फिल्म थी पर ऑस्कर कमिटी ने गुरुदत्त को चिट्ठी लिखकर इस फिल्म में शराब पीने वाली औरत के चित्रण के लिए आलोचना की कि ये भारतीय संस्कृति के मानकों के खिलाफ है. इसने 4 फिल्म फेयर अवार्ड जीते और इसे बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में गोल्डन बियर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था.

साहब बीबी और ग़ुलाम में छोटी बहु का किरदार वहीदा रहमान प्ले करना चाहती थीं, पर गुरु दत्त की नज़र में वे पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं थीं. इसलिए गुरु दत्त ने वहीदा रहमान को सेकंड लीड जबा का रोल दिया. 1958 में फिल्म के शुरू होने के समय से मीना कुमारी छोटी बहु की भूमिका के लिए प्रथम चॉइस थी, लेकिन उनके पति कमाल अमरोही को मीना कुमारी का फिल्मों में काम करना बहुत पसंद नहीं था. ऐसे में कमाल अमरोही के दबाब में मीना कुमारी ने ये रोल करने से इंकार कर दिया, फिर ये रोल नरगिस को ऑफर किया गया, पर नरगिस ने भी इंकार कर दिया. फिर ये रोल लन्दन स्थिति छाया आर्या को ऑफर किया गया, पर एक बार फिर गुरु दत्त के हिस्से इंकार आया. कोई भी शराब पीती छोटी बहु के रोल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थी. अंत में गुरु दत्त ने एक बार फिर ये फिल्म स्क्रिप्ट मीणा कुमारी के यहाँ भिजवाया. अब तक कमाल अमरोही और मीना कुमारी के वैवाहिक जीवन में तनाव आने लगा था और मीना जी स्वंतंत्र रूप से फिल्मों के बारे में फैसले लेने लगी थीं. फिल्म स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मीना जी ने रात के 2 बजे गुरु दत्त को फ़ोन किया, हाँ. इंडियन सिनेमा को छोटी बहु मिल गयी थी. मीना कुमारी की एक ही शर्त थी कि फिल्म को लीनियर वे में यानि कहानी जैसे जैसे आगे बढ़ती है, उसी तरह से फिल्माया जाय, ताकि वे करैक्टर के बदलते चरित्र से परिचित हो सकें और अपने आप को उस अनुसार ढाल सकें. फिल्म इतिहासकार ज़फर आबिद बलानी मीणा कुमारी को याद करते हुए कहते हैं, ” वे अपने पात्र को कपडे की तरह ओढ़ लेती थीं. जहाँ नरगिस अपने पात्र में आसानी से चली जाती थीं, और बाहर निकल आती थीं, वहीँ मीना जी अपने किरदार में बसना चाहती थीं.” फिल्म के समाप्त होते होते मीना कुमारी की डायरी में एंट्री है: “छोटी बहु ने मुझे बेहद गमगीन और बीमार कर दिया है.”

इस फिल्म की शूटिंग कलकत्ते के नज़दीक धनकुरिया मैंशन में हुई, पर मीना कुमारी इस हवेली पर नहीं आयीं, ऐसे में इसका इंटीरियर बॉम्बे में ही सेट पर हूबहू बनाया गया. इस फिल्म के लिए मीना कुमारी को बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्म फेयर अवार्ड मिला. ये साल मीना कुमारी के अदाकारी में ऐसी ऊंचाई लेकर आया कि इस साल कोई और एक्ट्रेस अवार्ड की रेस में नहीं थी. दो और नॉमिनेशन भी मीना कुमारी के नाम ही थे, मैं चुप रहूंगी और आरती.

मीना कुमारी के अलावा इस फिल्म को बेस्ट फिल्म का, फोटोग्राफी के लिए वी के मूर्ति, और निर्देशन के अल्वी को फिल्म फेयर अवार्ड मिला. इसके साथ ही हिंदी में बेस्ट फीचर फिल्म के लिए प्रेजिडेंट मैडल भी मिला.

भूतनाथ की भूमिका के लिए शशि कपूर पहली चॉइस थे, पर वे गुरु दत्त और अबरार अल्वी के साथ तय मीटिंग में ढाई घंटे देरी से पहुंचे और मौका गंवा बैठे. फिर इस भूमिका के लिए बंगाली एक्टर विश्वजीत को एप्रोच किया गया, पर विश्वजीत गुरु दत्त फिल्म्स के साथ लम्बे कॉन्ट्रैक्ट में नहीं बंधना चाहते थे. अंत में गुरु दत्त ने खुद भूतनाथ का रोल प्ले करने का फैसला किया.

फिल्म के गीत संगीत के लिए एस डी बर्मन और साहिर लुधियानवी को अप्रोच किया गया, पर एस डी बर्मन बीमार चल रहे थे और साहिर ने इस फिल्म को करने से इंकार कर दिया. ऐसे में हेमंत कुमार और शकील बदायुनी के हिस्से ये फिल्म आयी. दोनों ने बेहद शानदार काम किया। फिल्म में दो गायिकाओं ने अपनी आवाज़ दी है. जहाँ गीता दत्त ने मीना कुमारी के लिए haunting कोई दूर से आवाज दे, चले आओ, अपने पति से मनुहार करते हुए ” न जाओ सैयां छुड़ा के बहियाँ” श्रृंगार रस में डूबा, पीया ऐसे जिया में समा गयो” गाये, वहीँ आशा भोंसले ने वहीदा रहमान के लिए चंचल ” भंवरा बड़ा नादाँ है”, दुःख में डूबा ” मेरी बात रही मेरे मन में” गाये और कोठे के गाने ” साकियाँ आज मुझे नींद नहीं आएगी”, मेरी जां ओ मेरी जां” गाने गाये. इन अमर गानों के अलावे फिल्म के अंतिम दृश्यों में एक गाना है, ” साहिल की तरफ कश्ती ले चल” जहाँ बग्घी में छोटी बहु भूतनाथ के गोद में सर रखे हुए है, पर दर्शकों की तीखी प्रतिक्रिया पर गुरुदत्त ने बाद में फिल्म से इस गाने को हटा दिया और इस सीन की जगह भूतनाथ और छोटी बहु के बीच बातचीत को दिखाया. बाद में हेमंत कुमार ने इस गाने की धुन को अनुपमा के गाने ” या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो” में इस्तेमाल किया.

इंडियन सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ 25 फिल्मों में एक है साहब बीबी और गुलाम

फिल्म मीना कुमारी बेमिसाल अदाकारी का जीवंत दस्तावेज है. इंडियन सिनेमा की सबसे बेमिसाल अदाकारी के उदाहरणों में एक. मीना कुमारी दर्शकों के जेहन में रह जाती हैं. और याद रहती है वी के मूर्ति का कैमरावर्क. जिन्होंने उस समय के जमींदारी समाज, हवेली को ब्लैक एंड वाइट में परदे पर पूरी ईमानदारी से उतार दिया है. तस्वीरें बोलने लगती हैं. गुरुदत्त की फिल्मों का अहम् हिस्सा रहे, और गुरु दत्त का लीजेंड क्रिएट करने में अहम् भूमिका निभाते निभाते वी के मूर्ति खुद भी करिश्माई कैमरामैन बन गए. उन्हें आगे चल कर दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
हालाँकि फिल्म व्यवसायिक तौर पर उतनी सफल नहीं रही, पर इंडियन सिनेमा के 25 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में एक है: साहब बीबी और गुलाम.

मानवीय संबंधों का जटिल ताना बाना बुनती “गाइड” इंडियन सिनेमा की बेहद परिपक़्व फिल्म है

पुनर्जन्म पर आधारित इंडियन क्लासिक मधुमति ने कई बॉलीवुड और हॉलीवुड की फिल्मों को प्रेरित किया

फिल्म प्यासा मौजूदा सामाजिक व्यवस्था से निराश शायर की कहानी जो इंडियन सिनेमा के क्लासिक्स में गिनी गयी

उमराव जान का किरदार मानो रेखा के लिए ही बना था !!

गर्म हवा: विभाजन से मुस्लिम समुदाय में उपजे पशोपेश पर साधारण बजट में बनी एक असाधारण फिल्म

बन्दिनी में “कल्याणी “ का किरदार निभाकर नूतन भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो गयी !!

दो बीघा जमीन एक कालजयी फिल्म है; पर सुजाता के बारे में मै ऐसा नहीं कह सकता !!


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