इंडियन सिनेमा की क्लासिक वार मूवी “हक़ीक़त (1964)”

बालेन्दुशेखर मंगलमूर्ति

1964 में रिलीज़ फिल्म “हक़ीक़त” लद्दाख में इंडिया और चाइना के बीच वॉर पर बनी फिल्म है. हालाँकि इसके बाद कई फ़िल्में भारत- पाकिस्तान, भारत -चीन युद्ध को लेकर बनीं. ललकार, हिंदुस्तान की कसम, बॉर्डर, LOC आदि. पर हक़ीक़त को बेस्ट वार मूवी माना जाता है. फिल्म सिर्फ वार का चित्रण नहीं है, फिल्म मानवीय संवेदना लिए हुए है. फिल्म सैनिकों को सिर्फ वॉर मशीन के रूप में नहीं देखती, बल्कि सैनिको का मानवीयकरण करती है, उनके सुख, दुःख, दर्द, आकाँक्षाओं का बड़ी ईमानदारी से चित्रण करती है और आने वाली वार फिल्म्स के लिए पैमाने तय करती है. भारत सरकार के वित्तीय सहयोग से बनी हक़ीक़त इंडिया चायना युद्ध में भारत की करारी हार से उपजी निराशा और टूटे मनोबल को हौसला देने का प्रयास भी है.

फिल्म युद्ध की तैयारियों की कमी पर सवाल भी खड़े करती है, वहीँ भारत के पीठ में चायना के द्वारा छुरा भोंकने का भी मुद्दा उठाती है. फिल्म जहाँ एक ओर असहज करती है, वहीँ दूसरी ओर देशवासियों के जख्मों पर मलहम लगाने का प्रयास करती नज़र आती है.

फिल्म लद्दाख सेक्टर में भारत चीन युद्ध पर केंद्रित है

फिल्म लद्दाख सेक्टर में भारत चीन युद्ध पर केंद्रित है. कैप्टेन बहादुर सिंह ( धर्मेंद्र) अपने जवानों के साथ लद्दाख भेजा गया है. वहीँ मेजर रणजीत सिंह (बलराज साहनी) भी अपनी पलटन के साथ पहुँचते हैं. चीनी हमले की आशंका है.  बॉर्डर पर तनाव है. युद्ध की तैयारियों की निगरानी ब्रिगेडियर सिंह (जयंत) के हाथों में है. बॉर्डर पर दिन रात लाउडस्पीकर से चीनी सैनिक ” हिंदी चीनी भाई भाई, ये जमीन हमारा है, तुम यहाँ से चले जाओ” का नारा लगाते रहते हैं. बेहद मनोवैज्ञानिक दबाब बन रहा है भारतीय सैनिकों पर. उन्हें आदेश है पहला हमला नहीं करना है, हमला होने पर जवाब देना है. दूसरी तरफ फिल्म में दिखाया गया है लोकल लद्दाखी लोगों को भारतीय सेना हथियार चलाने की ट्रेनिंग दे रही है, ताकि वक़्त आने पर ये भी भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधे मिलाकर हमले का जवाब दे सकें.

एक दिन अचानक चीनी फौजें काफी बड़ी संख्या में भारतीय चौकियों पर हमले कर देती हैं. भारतीय सैनिक उन्हें लगातार अपनी ओर आता देख रहे हैं. हाई कमांड से आदेश के लिए फ़ोन करने पर उन्हें बार बार इन्तजार करने को कहा जाता है. जब बढ़ते बढ़ते चीनी सैनिक 25 गज़ की दुरी पर पहुँच जाते हैं, तब हाई कमांड का आदेश आता है, कि परिस्थितियों के अनुसार खुद फैसला लो.
मेजर रणजीत सिंह ( बलराज साहनी) अपने सैनिकों के साथ मोर्चा सँभालते हैं, पर चीनी सैनिकों के सामने वे बेहद कम संख्या में हैं, उनका गोला बारूद, रसद ख़त्म हो जाता है. उन्हें चौकी खाली करके पीछे हटने का आदेश दिया जाता है. I need Men, I need guns, I need Bullets !!मैं दुश्मन के छक्के छुड़ा सकता हूँ. मुझे क्यों यहाँ से निकलने कहा जा रहा है? मेजर रंजीत सिंह ( बलराज साहनी) चीखते हैं. ओह्ह क्या बेबसी है !! पीछे हटने के क्रम में बहादुर सिंह चीनी सैनिकों के बीच घिर जाता है, पीछे हटते हटते आर्मी बेस से मेजर रणजीत सिंह और उनके जवानो का संपर्क टूट जाता है, उन्हें मृत मान लिया जाता है और उनकी तलाश बंद कर दी जाती है. वे बेहद निराश हैं.

पर विपरीत परिस्थितियों में भी बहादुर सिंह और रणजीत सिंह के पलटन के सैनिक जिन्दा हैं. आर्मी बेस से फिर से संपर्क साधने में वे सफल होते हैं. सभी सैनिक बेहद थके और घायल हैं. उन्हें आराम और इलाज की सख्त जरुरत है. उनके पास हथियार और गोले बारूद भी बेहद अपर्याप्त हैं. ऐसे में ब्रिगेडियर सिंह वायरलेस पर बताते हैं कि चीनी सैनिकों का भीषण हमला होने वाला है, किसी तरह वे सुबह तक टिक जाएँ. सुबह होते ही उन्हें हेलीकाप्टर से वहां से निकाल लिया जाएगा.

पर वो सुबह नहीं आती. चीनियों की विशाल ताकत के आगे मुट्ठी भर भारतीय सैनिक टिक नहीं पाते. सुबह होते होते एक एक भारतीय सैनिक शहीद हो चुका है और साथ में बहादुर सिंह की लद्दाखी प्रेमिका आंग्मो ( प्रिया राजवंश) भी मारी जाती है. सब कुछ ख़त्म हो गया है.

चेतन आनंद की हिमालय फिल्म्स बैनर के तले बनी पहली फिल्म है हक़ीक़त:

1964 में रिलीज़ फिल्म हक़ीक़त फिल्म के निर्माता निर्देशक चेतन आनंद हैं. चेतन आनंद ने हिमालय फिल्म्स नाम से अपना फिल्म मेकिंग हाउस एस्टब्लिश किया. इससे पहले वे नवकेतन फिल्म्स के बैनर तले देव आनंद के लिए फ़िल्में  निर्देशित कर रहे थे. अब तक चेतन आनंद ने नीचा नगर, फंटूश, किनारे किनारे जैसी फ़िल्में डायरेक्ट की थीं और अच्छा नाम कमाया था. इसी समय देव आनंद गाइड फिल्म के निर्माण में व्यस्त हो चले थे, और चाहते थे कि चेतन आनंद इस फिल्म का निर्देशन करें, पर चेतन आनंद अपनी फिल्म हक़ीक़त” को लेकर बेहद व्यस्त थे. ऐसे में गाइड फिल्म के निर्देशन की जिम्मेवारी देव आनंद के छोटे भाई विजय आनंद ने संभाली. विजय आनंद ने हक़ीक़त फिल्म में छोटा सा रोल भी किया था. दरअसल इसका किस्सा भी दिलचस्प है. इस रोल को फिल्म के संगीत निर्देशक मदन मोहन करने वाले थे, पर वो समय से लद्दाख शूटिंग के लिए पहुँच नहीं सके, तो ऐसे में विजय आनंद ने वो रोल निभाया. विजय आनंद पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज में एक रोमांटिक नंबर फिल्माया गया है: “मस्ती में छेड़ के तराना कोई दिल का…”

इस फिल्म में चेतन आनंद ने एक नयी अभिनेत्री प्रिया राजवंश को कास्ट किया.  प्रिया राजवंश का जन्म शिमला में हुआ था और उसने लन्दन से एक्टिंग का कोर्स किया था. प्रिया आनंद ने अपने जीवन में बेहद कम फ़िल्में कीं. हक़ीक़त के पूरा होते होते प्रिया राजवंश फिल्म के निर्माता चेतन आनंद के साथ रिलेशनशिप में आ गयी थीं. चेतन आनंद अपनी पत्नी से अलग हो चले थे. आगे चलकर हीर राँझा, हिंदुस्तान की कसम, हँसते जख्म, कुदरत आदि फिल्मों में प्रिया राजवंश ने काम किया. 1985 में रिलीज़ हुई फिल्म “हाथों की लकीरें” उनकी अंतिम फिल्म थी. 27 मार्च 2000 को उनकी हत्या हो गयी. आरोपित थे चेतन आनंद की पहली पत्नी से हुए दो बेटे. 1997 में चेतन आनंद की मृत्यु के बाद उनके दोनों बेटों के साथ प्रिय आनंद को भी चेतन आनंद की सम्पत्ति में हिस्सा मिला जो विवाद और अंततः मौत की वजह बना.

इस फिल्म में पहली बार चेतन आनंद, कैफ़ी आज़मी और मदन मोहन की शानदार म्यूजिकल टीम बनी जो आगे कई अन्य फिल्मों में बेहतरीन संगीत देने में कामयाब रही. हीर रांझा, हिंदुस्तान की कसम, हँसते जख्म आदि इस टीम की शानदार फ़िल्में रही हैं.

बेमिसाल हैं कैफ़ी आज़मी के शब्द और मदन मोहन का संगीत:
इसके अलावा फिल्म जानी जाती है अपने बेमिसाल गीत संगीत के लिए. फिल्म खास इसलिए है कि यह महज एक वॉर फिल्म नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती वार फिल्म है. यहाँ भारतीय सेना का सिपाही महज हुंकार भरता, भारत माता की जय का नारा लगाता एक मशीन नहीं है, बल्कि तमाम संवेदनाओं के साथ एक सिपाही है, जिसे अपनी मातृभूमि से प्रेम है, जिसे बॉर्डर पर तैनात होते अपने घर वालों की याद आती है. फिल्म में एक सिपाही है रामसिंह। राम सिंह लद्दाख बॉर्डर पर तैनात है, उसे इन्तजार है अपनी प्रेमिका की चिट्ठी का, जिससे लड़ झगड़ कर वह फ्रंट पर आ गया है. शादी नहीं हो पायी है. हर डाक के साथ उसकी उम्मीद बंधती है, जो हर बार टूट जाती है. उसकी चिट्ठी को लेकर सिपाही बाज़ी लगाते हैं. निराशा से डूबा हुआ राम सिंह पर रफ़ी की आवाज में मिनिमम म्यूजिक में गाया गाना फिल्माया गया है, गाना चल रहा है, रफ़ी गा रहे हैं ” मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको … ” , बैकग्राउंड में वायलिन बज रहा है. गाना जादुई प्रभाव छोड़ने में सफल रहा है.
सैनिक जब मोर्चे से पीछे हट रहे हैं, और उनका आर्मी बेस से संपर्क टूट गया है, और वे हताश निराश हो चले हैं, भोजन, पानी की कमी, फ़टे यूनिफार्म और जूते. सोच रहे हैं कि परिवार वाले भी उन्हें मरा हुआ मान रहे हैं. ऐसे में कैफ़ी और मदन मोहन ने एक बेहद प्रभावशाली गाना रचा, जिसे आवाज दी रफ़ी, तलत, मन्ना डे और भूपेंद्र ने: होके मज़बूर मुझे उसने भुलाया होगा. एक सिपाही का दर्द इससे बेहतर इंडियन सिनेमा में किसी और गीत ने नहीं बयां किया है. इसके अलावा लता की खूबसूरत आवाज में रोमांटिक नंबर ” ज़रा सी आहट होती है, तो दिल सोचता है” और दर्द में डूबा ” आयी अबके साल दिवाली मुंह पर अपने खून मले” बेहद खूबसूरत हैं. पर इस फिल्म का सबसे ;यादगार नगमा है रफ़ी की आवाज में ” कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियों” . देशभक्ति का ये नगमा अब राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर चुका है. इस फिल्म में लता का एक और खूबसूरत नगमा था, “खेलो न मेरे दिल से” पर फिल्म लम्बी होती देखकर चेतन आनंद ने इस फिल्म से हटा दिया.

हक़ीक़त शानदार सिनेमेटोग्राफी के अलावा जानी जाती है बलराज साहनी के दमदार अभिनय के लिए. और साथ ही बलराज साहनी और जयंत जैसे दिग्गज कलाकारों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहे धर्मेंद्र के लिए भी.

इस फिल्म को सेकंड बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला. इस साल चेम्मीन फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला था. बेस्ट आर्ट डायरेक्शन के लिए एम् एस सथ्यू को फिल्म हालाँकि मदन मोहन को बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का या कैफ़ी आज़मी को बेस्ट लिरिसिस्ट का फिल्म फेयर अवार्ड नहीं मिल सका.

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