एक क्रांतिकारी कविता/भींचे हुए जबड़े दर्द कर रहे हैं

पार्टी फिल्म (1984) में क्रांतिकारी युवा कवि अमृत का किरदार निभाते हुए नसीर ने ये कविता पढ़ी है. आप भी पढ़ें, कितनी पावरफुल कविता है

भींचे हुए जबड़े दर्द कर रहे हैं

कितनी देर तक दबाया जा सकता है

अंदर खौलते लावे को ?

किसी भी पल खोपड़ी क्रेटर में बदल जाए

उससे पहले जानलेवा ऐंठन को

लोमड़ी की पूंछ से बांधकर दाग देना होगा

हमले से बढ़कर हिफाज़त की कोई रणनीति नहीं है

बेकार है ये सवाल कि संगीन किस कारखाने में ढली है

फर्क पड़ता है सिर्फ इस बात से कौन सा हाथ उसे थामे है

और किसका सीना उसकी नोंक पर है

फर्क तो पड़ता है इस बात से कि उस जादूनगरी पर किसका कब्जा है

जहां रात –दिन पसीने की बूंदों से मोतियों की फसल उगाई जाती है

मानवता के धर्मपिता

न्याय और सत्य का मंत्रालय कम्प्युटर को सौपकर आश्वस्त है

वही निर्णय देगा

निहत्थी बस्तियों पर गिराए गए टनों नापाम बम

या तानाशाह की बुलेटप्रूफ कार पर फेंका गया इकलौता हथगोला

इंसानियत के खिलाफ कौन सा जुर्म संगीनतर है?

दरअसल

इंसाफ और सच्चाई में इंसानी दखल से संगीन जुर्म कोई नहीं है

ताकत

ताकत बंदूक की फौलादी नली से निकलती है या

कविता की कागजी कारतूस से

जिसके कोश में कहने का अर्थ है होना

और होने की शर्त लड़ना

उसके लिए शब्द किसी भी ब्रह्म से बड़ा है

जो उसके साथ हर मोर्चे पर खड़ा है

खतरनाक यात्रा के अपने आकर्षण है

आकर्षक यात्रा के अपने खतरे

इन्ही खतरों की सरगम से दोस्त

निर्मित करना है हमें दोधारी तलवार जैसा अपना संगीत

भींचे हुए जबड़े अब दर्द कर रहे हैं

कब तक दबाओगे खौलते लावे को ?


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