दीप्ति नवल निर्देशित एक खूबसूरत फिल्म ” दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश” (2009)

Balendushekhar Mangalmurty

80 के दशक में हिंदी सिनेमा में ताजा हवा के झोंके की तरह आयीं दीप्ति नवल. साथ साथ, कथा, चश्मे बद्दूर, रंग बिरंगी, अंगूर जैसी कई यादगार फिल्मों में उन्होंने अपने अभिनय की छाप छोड़ी. उनके अभिनय को दर्शकों के द्वारा काफी सराहा गया और वे शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल के साथ पैरेलल सिनेमा की एक पिलर बनीं. उन्होंने 2009 में एक फिल्म निर्देशित की, ” दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश”. फिल्म एक गे (gay) पुरुष देबू ( रजित कपूर), और एक कॉलगर्ल जूही ( मनीषा कोइराला) और उनके अपाहिज बच्चे काकू ( संजय नवल) के बीच बनते खूबसूरत रिश्ते की कहानी है. एक ऐसा रिश्ता, जिसकी शुरुआत जरुरत से होती है, और जो समय के साथ एक न टूटने वाले बॉन्डिंग में बदल जाता है.

फिल्म की कहानी:
देबू एक संघर्षशील गीतकार है, जो अपने बॉयफ्रेंड समीर( मिलिंद सोमन) के साथ रिलेशनशिप में है. समीर मुंबई छोड़कर चला गया है और वो बारिश वाली रात में बेघर होकर सड़क पर आ गया है. उसकी जेब में पैसे नहीं हैं, इस बारिश की रात वो अपना सामान लेकर जाए तो जाए कहाँ? उसी रात संयोग से उसकी मुलाक़ात जूही से होती है. जूही एक कॉल गर्ल है, जिसका गोल्डन टाइम अब समाप्त होने की कगार पर है, उसे अब ग्राहक ढूंढने में दिक्कत हो रही है. उसे अपना घर चलाना है और अपने अपाहिज बच्चे को भी देखना है.

दोनों उस रात बार बार एक दूसरे से टकरा रहे हैं. एक खूबसूरत दृश्य बन पड़ा है. बियर बार में दोनों एक साथ बैठे हैं. जब देबू जूही को बताता है कि वो एक फिल्म गीतकार है, तो जूही उसे एक गाना सुनाने कहती है, देबू गा रहा है, ” दिन ढल जाए, हाय रात न जाये”. बियर के हलके सुरूर में देबू की आवाज में दर्द झलक रहा है. जूही हंस रही है. उसे प्रोत्साहित कर रही है. देबू और बेहतर तरीके से गाने के लिए गिटार लाने गया है, तब तक जूही को एक कस्टमर मिल गया है. वह उसे लेकर अपने घर आ गयी है. और कमरे में बंद हो गयी है. उसका बेटा काकू गुस्से में लगातार अपना मग अपनी कुर्सी पर पीट रहा है. खीज कर कस्टमर भाग जाता है. गुस्से में जूही बाहर निकलती है और अपने बेटे काकू को डांटती है, “इस तरह मत घूरो. तुम्हे पालने के लिए ये सब करना पड़ता है.”

आखिरकार सर पर छत की तलाश में देबू जूही के यहाँ आया की नौकरी पकड़ लेता है. घर को उसने एकदम व्यवस्थित कर दिया है. जूही को घर एकदम साफ़ सुथरा, हर चीज करीने से रखी मिल रही है और काकू की जरूरतों को पूरा कर रहा है देबू। दोनों के जीवन में अपने संघर्ष हैं. देबू अपने करियर में संघर्ष और समीर के साथ ब्रेक अप को लेकर अपसेट है. उसे फिल्म निर्माता अश्लील ( raunchy), चटखदार गीत लिखने को कहते हैं, और वो अपनी क्वालिटी के साथ कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाहता है. दूसरी तरफ, जूही का बेहतरीन टाइम बीत गया है. दलाल मकरंद (मकरंद देशपांडे), जो उसके लिए ग्राहक जुटाता है, उससे बोलता है, तेरा टाइम खल्लास हो गया है. अब पहली की तरह 5000 रूपये नहीं मिलेंगे. अपना रेट घटाकर 2500 कर ले. एक से एक आइटम आ रहे हैं. कॉलेज गर्ल, हाउस वाइफ.
संघर्ष की इन्ही घड़ियों में दोनों सुकून के कुछ पल भी बिताते हैं. जूही देबू को छेड़ती है, कभी किसी लड़की के साथ कुछ नहीं किया?
फाइनली लम्बे संघर्ष के बाद कुछ उम्मीद की किरण नज़र आयी है. देबू का एक गाना रिकॉर्ड होने वाला है. फिल्म निर्माता ने उसे 5000 रूपये दिए हैं. फिल्म के बाकी 6 गाने भी उसी को लिखने हैं.
काकू के साथ देबू की बॉन्डिंग बेहतर होती जा रही है. देबू काकू को बाहर घुमाने ले जाता है, दोनों बारिश में भींगते हैं, उसे कंधे पर लेकर रेस में भागता है, उसे तरह तरह की कहानियां सिखाता है, उसे बोलना सिखाता है.
एक बार जब जूही थक कर घर लौटी, तो दोनों घर पर नहीं थे. जूही डर गयी कि कहीं देबू काकू को चाइल्ड ट्रैफिकिंग में डाल देने के लिए तो नहीं ले गया है. वो परेशां होकर इधर उधर दोनों को खोज रही है. अंत में छत पर दोनों मिलते हैं. छत पर देबू और काकू एकदम सुकून के साथ बैठे हैं और देबू काकू को कहानी सुना रहा है. जूही को सुकून मिला, साथ ही हृदय में एक टीस भी उठी कि ये बॉन्डिंग काकू के साथ उसकी कभी नहीं बन पायी.
टैक्सी ड्राइवर ( जो उसे ग्राहकों के पास ले जाया करता है) उसे समझाता है, “तूने कौन सा उसके साथ समय बिताया है, उसे लाड़ प्यार चाहिए जो देबू दे रहा है. तूने तो आज तक उसे माफ़ भी नहीं किया बाप के छोड़ जाने के लिए.

फिल्म में छोटी छोटी घटनाओं से कहानी आगे बढ़ती रहती है. एक बार जूही घर लौटी तो देखती है कि काकू को देबू ने लिपस्टिक लगा दी है और खुद डांस कर रहा है. जूही एकदम से गुस्से में आ जाती है, “इसे अपनी तरह का बनाना चाहते हो. यू आर ए ब्लडी छक्का ! देबू भी नाराज है, उसने भी कोई कमी नहीं रखी, ” और तुम क्या हो? एक अल्फ़ाज़ है उसके लिए. रंडी कहते हैं रंडी.”

बियर बार में देबू अपना गम गलत कर रहा है. वहां उसे अली मिलता है, जो गे है. फ़ोन पर जूही देबू को कहती है, उसे घर क्यों नहीं लाते? देबू अली को लेकर घर आता है. दोनों सोफे पर बैठ कर बियर पी रहे हैं. देबू आश्चर्यचकित रह गया कि आज जूही काम पर नहीं गयी है. उसने अली को अपने जाल में फांस लिया और उसे लेकर अपने रूम में बंद हो गयी है.देबू को कनखी मारती है जूही. देबू के मुंह से एक शब्द निकलता है, बिच !! अगली सुबह जूही देबू को मना लेती है.

दोनों सी बीच पर बैठे पुराने गाने गा रहे हैं. सिपाही आकर दोनों को हड़काता है. वे उठकर दूसरी जगह जा बैठते हैं. दोनों अपना अतीत शेयर करते हैं. जूही ने काफी कम उम्र ने शादी कर ली थी, पर काकू जब पैदा हुआ तो वो भाग गया. नर्सिंग होम के बिल चुकाने के भी पैसे नहीं थे, तो वो इस लाइन में आ गयी. जूही अपने पेशे को लेकर नन जजमेंटल है, “समझ ले मुझे बस यही काम आता है. बॉडी ही तो है. बॉडी को इतना इम्पोर्टेंस क्यों देना? आत्मा तो नहीं बेचती. वो देख बॉडी का हाल.” दूर में जल रही चिता की ओर ईशारा करती है. देबू भी अपना अतीत शेयर करता है. उसके पिता आर्मी अफसर थे. बचपन से ही वो अपने पिता से स्नेह चाहता था, जो उसे कभी नहीं मिला. शायद इसी वजह से वो पुरुषों की ओर आकर्षित हुआ. फिर समीर आया और अब… जूही उसे समझाती है, कुछ भी परमानेंट नहीं होता है. देबू का गम कम नहीं हुआ है, “परमानेंस का illusion अच्छा लगता है ! जूही उससे कहती है, उसे अपने जीवन में regrets नहीं है. इस पर देबू की सोच अलग है, जीवन में अगर Regrets न हों, तो आदमी की स्पिरिचुअल जर्नी अधूरी रह जाती है. Regrets is nothing to be shamed about !

फिल्म में कई खूबसूरत मोमेंट्स हैं. एक दिन जूही अपने कमरे से दौड़ कर काकू के पास जाती है. काकू ने पहली बार मम्मा शब्द बोला है. काकू बोलो, मम्मा कहाँ है? काकू देबू की ओर इशारा कर देता है. जूही की आँखों में आंसू आ जाते हैं. देबू भी embarrassed फील कर रहा है, मैंने उसे बस मम्मा शब्द सिखाया. जूही कहती है, काकू सही बाप बनने के चक्कर में माँ बनना ही भूल गयी !

देबू जूही को elegant लेडी बनने की ट्रेनिंग दे रहा है. जिस जूही को पहले फाइव स्टार के स्टाफ ने निकाल बाहर किया था चीप वीमेन समझ कर, आज उसका स्वागत कर रहे हैं. पर जैसे ही थोड़ी देर के लिए देबू टेबल से हटता है, वो बगल में बैठे युवक को, जो उसे मैम मैम कर रहा है, गुड टाइम का ऑफर देती है. देबू उसे लेकर तेजी से होटल से निकलता है, ” ये फाइव स्टार होटल है, तुम्हारा अड्डा नहीं है.” जूही भी सारी शराफत को एक साइड रखते हुए चीखती है, घर का भाड़ा कौन देगा? तुम्हारा गाना नहीं बिकने वाला. कुछ हार्ड हिटिंग लिखो. देबू कहता है, “मैं जैसा लिखता हूँ, वैसा ही लिखूंगा. मेरे गाने बिकेंगे भी.”

एक दिन जूही देबू को बहुत खुश पाती है. देबू बताता है, समीर वापस आ गया है. जूही इधर देबू के साथ परिवार की कल्पना करने लगी थी. वो दुखी है, काकू भी अपसेट है. पर काकू को वो समझाती है, वो हमेशा हमारे साथ रहने नहीं आया था. उसकी अपनी भी जिंदगी है. वो देबू को तैयार होने में हेल्प करती है. देबू समीर से मिलने होटल जाता है, पर समीर फिर से रिलेशनशिप में आने के लिए नहीं आया है. वो शादी कर रहा है और चाहता है कि देबू के साथ उसके सम्बन्ध के बारे में दुनिया को नहीं पता चले. देबू अपसेट होता है. जिस रिलेशनशिप पर उसे फक्र था, उसे लेकर समीर डिनायल के मूड में है. वो फिर जूही और काकू के पास लौट आया है.

उस रात जूही उसे कहती है, हम एक मैन और वुमन की तरह क्यों नहीं रह सकते. जब तुमने try ही नहीं किया तो तुम्हे कैसे मालुम कुछ नहीं होगा. दोनों बेड पर हैं. जूही उसे सेक्सुअली arouse करने की कोशिश कर रही है. देबू रेस्पॉन्ड कर रहा. अचानक देबू जूही के गले लग कर रोने लगता है. जूही उसे बाहों में भर कर थपकी दे रही है. एक यादगार सीन में देबू बेड पर फीटल पोजीशन में लेटा हुआ है, और जूही उसके सामने बैठी है.

अगली सुबह जूही को एक नोट मिलता है, “वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा” Something are never meant to be ! मेरे लिए अब तुम्हारे साथ जीना अब मुश्किल है.
जूही के लिए ये मेजर सेटबैक है, पर जिंदगी रुक नहीं सकती. उसे सल्लू का फ़ोन आता है. वो ग्राहक के पास जा रही है. उसे देबू की बातें याद आ रही हैं, देबू का उसका इस प्रोफेशन में कंटिन्यू करना, डेब्यू का कहना, परमानेंस का illusion अच्छा लगता है ! होटल में घुसने से पहले उसके मन में अंतर्द्वंद्व चल रहा है. अंत में उसने निर्णय ले लिया है. वो लौट जाती है. सल्लू, मैं नहीं जाउंगी. मैं ये काम नहीं करुँगी. कुछ भी करुँगी. लिबरेटेड फील कर रही है जूही.

बारिश होने लगी है. अचानक उसे सामने से देबू आता दिखता है.
देबू भी लौट आया है. देबू उससे कहता है, तुम्हे पता है जूही? अगर हम साथ न भी सोएं तो भी हम हैप्पी फैमिली हो सकते हैं.
दोनों ऑटो में घर की ओर लौट रहे हैं. ऑटो में देबू का पहला रिकार्डेड गीत बज रहा है, ” दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश. बारह मास मैं मौसम बेचता हूँ.”

फिल्म खूबसूरत पलों के साथ तीन लोगों के बीच रिश्तों का तानाबाना बेहद खूबसूरती से बुनती है:

फिल्म एक खूबसूरत एहसास देती है. जीवन की कठिनाईयों से दो चार हो रहे लोग, एक दूसरे से प्यार की तलाश कर रहे हैं, ये जानते हुए कि वे एक दूसरे से बेहद अलग हैं, फिर भी वे एक दूसरे को प्यार करने की वजह बना लेते हैं. इस मामले में फिल्म एक खूबूसरत फिल्म बन पड़ी है. फिल्म में देबू का गे किरदार बॉलीवुड के गे किरदारों के कैरीकेचर की तरह नहीं है, बल्कि उसे अपने पार्टनर के साथ ब्रेक अप होने पर दुःख है, वो एक लॉयल पार्टनर है, एक नार्मल इंसान, जिसमे मानवीय संवेदना, शिष्टता भरी है, जो एक महिला को भले सेक्स नहीं दे सकता,पर उसे दुःख में अपना कन्धा दे सकता है, एक वार्म hug दे सकता है. देबू के किरदार में बेहद शानदार लगे हैं रजित कपूर, वहीँ उम्र के रॉंग साइड में खड़ी होती कॉल गर्ल, जिसने कभी एक घर का, प्यार का सपना देखा था, और जो ऊपर से संवेदनहीन लगती है, पर अगर उसे थोड़ा सा खुरच दिया जाए, तो उसके अंदर की प्रेमिका, एक औरत जीवित हो उठती है, जो अभी भी घर का सपना देख रही है, के किरदार में मनीषा कोइराला ने बेहतरीन परफॉरमेंस दिया है. छोटे बच्चे काकू के रोल में सनाज नवल ने जान डाल दिया है. आँखों में आक्रोश, बिल्ली के बच्चे से प्यार, उसका ख्याल, उसके लिए अपने हिस्से के दूध से थोड़ा बचा कर रखना, उसकी आँखों में आक्रोश, ख़ुशी, आंसू, हर भाव में सनाज नवल यादगार लगे हैं.
फिल्म में दीप्ति नवल की बहुत बड़ी भूमिका है. वो सिर्फ फिल्म की डायरेक्टर नहीं हैं, बल्कि फिल्म की निर्माता, स्टोरी राइटर, स्क्रीनप्ले राइटर भी हैं. फिल्म की एडिटिंग उमेश गुप्ता ने की है. उनकी एडिटिंग के चलते फिल्म में कई टेंडर मोमेंट्स बन पड़े हैं. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी काबिले तारीफ अंदाज़ में मुंबई को कैप्चर करती है. फिल्म में गुलज़ार ने गीत लिखे हैं और सन्देश शांडिल्य ने संगीत दिया है. फिल्म का टाइटल सांग बेहतरीन बन पड़ा है.
फिल्म देखी जानी चाहिए.

 


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

One thought on “दीप्ति नवल निर्देशित एक खूबसूरत फिल्म ” दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश” (2009)

  • December 23, 2019 at 08:25
    Permalink

    Behetereen review.. Itna aacha review sayad hi kisi ney ish film k baarey mein likha hai..

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.