बेनेगल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में एक “सूरज का सातवां घोड़ा” (1992)

Balendushekhar Mangalmurty

आज़ादी के बाद के हिंदी साहित्य के इतिहास में धर्मवीर भारती की रचना “सूरज का सातवां घोड़ा” अपने जटिल और नॉन लीनियर तरीके से कहानी कहने के चलते एक विशिष्ट स्थान रखती है. इस किताब की प्रेरणा शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास “देवदास” है, जिसका इस फिल्म में रहरहकर जिक्र भी आया है, और देवदास का मॉडर्न adaptation भी किया गया है.
जब श्याम बेनेगल धर्मवीर भारती के पास इस उपन्यास पर फिल्म बनाने की परमिशन लेने गए, तो साहित्यकार के मित्रों ने इसकी जटिलता और फिल्म मेकर्स की किसी जटिल कहानी को सिम्पल करके कहने की आदत या परंपरा के चलते धर्मवीर भारती को आगाह किया, पर धर्मवीर भारती ने कहा कि मैं अपने उपन्यास पर फिल्म बनाने का परमिशन किसी ऐसे वैसे फिल्ममेकर को नहीं दे रहा हूँ, श्याम बेनेगल को दे रहा हूँ. मुझे श्याम बेनेगल की काबिलियत पर पूरा भरोसा है. फिल्म बनने के दौरान श्याम बेनेगल ने कई बार धर्मवीर भारती को फ़ोन करके फिल्म के रील्स देखने को कहा ताकि अगर वे इससे असंतुष्ट हों, तो फिल्म में जरुरी सुधार किये जा सकें. पर धर्मवीर भारती ने फिल्म के रील्स देखने से इंकार कर दिया. फिल्म जब बनकर तैयार हो गयी, तो इसे धर्मवीर भारती ने देखा और वे इस फिल्म से पूरी तरह संतुष्ट हुए. श्याम बेनेगल ने उपन्यास के साथ पूरी तरह न्याय किया था.

धर्मवीर भारती

हालाँकि फिल्म चली नहीं. और इसे बहुत कम थिएटर ही नसीब हुए. अमरीशपुरी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि मुंबई के एक थिएटर में फिल्म लगी थी, तो उसमे महज 15 दर्शक ही थे. अमरीश पूरी को इस फिल्म में महेशर दलाल के रोल के लिए दो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले थे. बाद में फिल्म को दूरदर्शन पर दिखाया गया. उस साल फिल्म को बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला.

फिल्म की शूटिंग एक महीने से भी कम समय में पूरी हो गयी. फिल्म में माणिक मुल्ला के किरदार में नए कलाकार रजित कपूर ने अपनी छाप छोड़ी है. बेनेगल ने रजित कपूर को एक नाटक के मंचन में देखा था. और जब उन्होंने रजित कपूर को ये फिल्म ऑफर की, तो रजित कपूर ने इस जटिल कहानी पर अच्छी फिल्म बनाने पर अपनी शंका जाहिर की, हालाँकि जब फिल्म बनकर तैयार हुई, तो न केवल रजित कपूर श्याम बेनेगल के मुरीद बन गए, बल्कि अपने किरदार के साथ पूरा पूरा न्याय करने के चलते वे श्याम बेनेगल की आने वाली हर फिल्म का हिस्सा बन गए.

फिल्म की कहानी:
धर्मवीर भारती ने उपन्यास ” सूरज का सातवां घोड़ा” 1952 में लिखा था. इसके 40 बाद बेनेगल ने इस कालजयी उपन्यास पर फिल्म बनायी. 40 साल गुजर जाने के बाद भी फिल्म का कथानक एकदम ताजा लगता है, मानो ये 90 के दशक की ही कहानी हो. फिल्म उपन्यास की तरह ही बेहद जटिल है, और एक कहानी के अंदर दूसरी कहानी और फिर दूसरी कहानी के अंदर तीसरी कहानी कही गयी है, और इतना ही नहीं, कहानी को अलग अलग नज़रिये से कहा गया है. एक ही घटना पर दो दो बार पहुंचा गया है, अलग अलग नज़रिये से पेश करने के लिए. मल्टीप्ल फ्लैशबैक और नॉन लीनियर तकनीक का इस्तेमाल किया गया है कहानी कहने में.
फिल्म में एक कहानीकार श्याम ( रघुवीर यादव) है जो याद कर रहा है मानेक मुल्ला ( रजित कपूर) को. मानेक मुल्ला बेहद रोचक शैली में कहानी कहता है, उसके घर में श्याम, और दो और दोस्तों की महफ़िल जुटी रहती है. मानेक मुल्ला अपने दोस्तों को तीन महिलाओं के साथ प्रेम के किस्से सुनाता है, जो उसके जीवन में आयीं. उसकी तीन प्रेमिकाएं अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि या क्लास से आती हैं.
कई जगह बेहद रोचक संवाद बन पड़े हैं जो हास्य तो पैदा करते ही हैं, बड़े मारक व्यंग और समाज और सामाजिक व्यवस्था पर सशक्त टिप्पणी हैं.

पहले दृश्य में मानेक मुल्ला के साथ उसके दोस्त बैठे हुए हैं. एक के हाथ में शरतचंद्र की “देवदास” है.
मानेक ये देखकर कहता है, “अबे मेरे कमरे में बैठकर दूसरों की किताब पढता है. देवदास !! लिजलिजी बकवास !! न कोई निष्कर्ष, न कोई सुझाव. एक अच्छी प्रेम कहानी समाज के लिए कल्याणकारी होनी चाहिए.
प्रेम पर अपनी थ्योरी देते हुए मानेक कहता है, “प्रेम कोई निजी रूमानी भावना नहीं है. उसकी नींव आर्थिक व्यवस्था पर स्थापित है. वर्ग संघर्ष पर इसका आधार है.”
पहली कहानी जमुना के बारे में सुनाता है, जिसका शीर्षक उसने रखा ” नमक की अदायगी”

पहली लड़की है जमुना या जमुनिया ( राजेश्वरी सचदेव), जो तन्ना ( रिजु बजाज) से प्रेम करती है. तन्ना का गोत्र अलग है और उसके परिवार की सामाजिक हैसियत भी जमुना के परिवार से कमतर है. जमुना के पिता एक बैंक में कर्मचारी हैं. जमुना और तन्ना का घर अगल बगल में है और दोनों एक दूसरे के परिवार वालों की नज़र से छुप कर मिलते हैं. तन्ना के पिता महेसर दलाल एक दबंग किस्म के इंसान हैं, जिन्होंने अपनी पत्नी की मौत के बाद एक स्त्री को अपने घर में रख लिया है. तन्ना की दो बहने भी हैं, जिनकी शादी करनी है. तन्ना अपने पिता से बहुत डरता है. जमुना और तन्ना के प्रेम का गवाह है मानेक मुल्ला. वो गाय को रोटी खिलाने के लिए सुबह शाम जाया करता है. उसके घर में गाय नहीं है,गाय जमुना के घर में है. तन्ना को बेसन के नमकीन पुए बेहद पसंद हैं, पर एक बार वे पुए जब वो तन्ना के लिए लेकर गयी, तो पिता ने डपट कर तन्ना को बुला लिया, तो वे पुए जमुना ने मानेक मुल्ला को खिला दिए. मानेक को कहती है, मानेक तूने मेरा नमक खाया है, इस नमक का हक़ अदा कर. वो तन्ना से अपने प्रेम के बारे में चर्चा करती रहती है. मानेक सुनता रहता है. वो दोस्तों से कहता है, धीरे धीरे वो ऐसे व्यवहार करने लगी, मानो मैं तन्ना हूँ. मैं भी वैसे भी व्यवहार करने लगा. क्या करता? नमक का हक़ जो अदा करना था.
फिर हम मिलने लगे.
दोस्त पूछता है, ” बस यही? अंत क्या हुआ?”
मानेक कहता है, “प्रेम का क्या दो चार अंत होता है? नायिका का विवाह हो जाता है और इस दुनिया के मानेक मुल्ला मुंह ताकते रह जाते हैं.”
निष्कर्ष क्या निकला कहानी का? पूछने पर मानेक कहता है, संपत्ति की विषमता इस प्रेम का मूल कारण है. यदि हमारे समाज में हर घर में गाय होती, तो हमें उनके यहाँ जाना ही क्यों पड़ता? न नमक खाता, न नमक का हक़ अदा करना पड़ता.”
तो निष्कर्ष ये निकला कि हर घर में एक गाय होनी चाहिए.
बिलकुल. इससे राष्ट्र का पशुधन भी बढ़ेगा और संतानों का स्वास्थ्य भी बढ़िया होगा.
पर श्याम इस निष्कर्ष से सहमत नहीं है. वो कहता है, ” बहुत दर्दनाक स्थिति है. ये कहानी थी गरीबी की, दहेज़ की कमी की, जवान लड़की को उसकी मर्जी के खिलाफ बियाह देने की. क्योंकि उसके बाप के पास देने को दहेज़ नहीं था. ये हंसने की बात है?”

मानेक कहता है, पर जमुना शादी के बाद बहुत खुश थी. वो अपने दरवाजे से लटके घोड़े के नाल की ओर इशारा करता है. नाम जमना के विवाह का स्मृति चिन्ह है.
अब दूसरी कहानी शुरू होती है, जिसका शीर्षक है, “घोड़े की नाल”

जमुना की शादी बहुत दिनों तक नहीं हुई. पिता दहेज़ जुटाने के लिए बैंक में ओवरटाइम करने लगे. उन्ही दिनों दूर की रिश्तेदार रोमा बीबी ( हिमानी शिवपुरी) एक रिश्ता लेकर आयी. भतीजा समृद्ध है. नाना जागीर लिख गए हैं. न माँ न बाप. घर में घोडा है, तांगा है, पुराने खानदान हैं.
पिता को माँ जब लड़के की तस्वीर दिखाती है, तो वे बोलते हैं, ” लड़का नहीं है. बल्कि इसकी दो पत्नियां मर चुकी हैं. मेरी उम्र के बराबर है.”
जमुना का माँ कहती है, ” मर्द और दीवार जितना हवा पानी खाते हैं, उतना ही पुख्ता होते हैं.”
मानेक मुल्ला अपने दोस्तों को कहता है, ” वो पुख्ता दीवार स्वास्थ्य और सुंदरता की मिसाल थी. न मुंह में दांत, न पेट में आंत. आधा सिर गांजा. लेकिन धन से सारे ऐब छुप जाते हैं.
जमुना की शादी हो जाती है. शादी के कुछ सप्ताह के बाद जमुना मायके आयी. अपने घर के दरवाजे पर तन्ना खड़ा मिला.
माँ कहती है, ” थोड़े दिनों में इसका विवाह होने वाला है. लड़की वाले पैसे वाले भी हैं.”
जमुना ढेर सारी साड़ियां लायी है. माँ को उसने एक बहुमूल्य साड़ी दी है.
पिता देर से घर आये. बैंक में 555 रूपये 12 आने की गड़बड़ हो गयी है. अगर सुबह तक पैसे जमा नहीं किये, तो जेल जाना होगा.
ऐसे बुरे वक़्त में जमुना ने पिता की मदद नहीं की.
वो अपनी भावी संतान के लिए पैसे जोड़ने में लगी है. पर पति से उसे संतान प्राप्ति नहीं हो रही है. एक ज्योतिषी के कहने पर, वो पूरे कार्तिक माह पौ फटने से पहले गंगा स्नान करके चंडी देवी को फूल चढाने लगी है. उसे कोचवान ले जाता है, ले आता है.
कार्तिक मास के अंत होने में अब कुछ ही दिन बाकी हैं. एक दिन ठण्ड से अकड़ जाती है जमुना. कोचवान उसे अपना कम्बल ओढ़ाता है और अपनी मालकिन से कहता है, अगर अमावस्या के दिन सफ़ेद घोड़े के बायीं अगली टांग के पुरानी नाल की अंगूठी पहन ली जाए, तो अवश्य गोद भर जायेगी.
समस्या ये है कि नाल नयी है. इसलिए अगले चार दिन घोड़े को खूब दौड़ाया जाता है. घोड़ा दौड़ता रहा, जमुना पीछे से आगे की सीट पर आ गयी और एक दिन तांगे की तेज चाल से घबरा कर कोचवान ( रवि झांकल) को थाम लिया.
चंद्रग्रहण आ गया है. घोड़े के नाल से अंगूठी बनवाकर जमुना ने पहन ली है. कुछ दिनों में जमुना की गोद भर गयी.
एक दिन बच्चे को खेलाते खेलाते जमींदार साहब हृदयगति रुकने से इस दुनिया से कूच कर गए.
कोचवान ने अब जमुना, बच्चे और एस्टेट सबकी जिम्मेवारी संभाल ली है.
मानेक मुल्ला कहता है, ” इस तरह जमुना सुख और पवित्रता के साथ अपने दिन गुजारने लगी.”

श्याम पूछता है, ” ये नाल कहाँ से मिली? उसकी तो अंगूठी बन चुकी थी.”
मानेक मुल्ला की कहानी आगे बढ़ती है. स्टेशन पर मानेक की मुलाक़ात कोचवान से होती है. कोचवान काशी जा रहा है. तन्ना की मौत हो चुकी है. तन्ना की जगह आरएमएस – रेलवे डाक सेवा में मानेक नौकरी कर रहा है.
अपनी चमकी हुई किस्मत पर कोचवान कहता है, “बड़ी तासीर है घोड़े के नाल में.”
घोड़े की एक नाल वो मानेक मुल्ला को भी दे देता है. ये वही नाल है.
निष्कर्ष क्या निकला? निष्कर्ष ये है कि दुनिया का कोई काम बुरा नहीं है. किसी काम को नीची निगाह से नहीं देखना चाहिए. चाहे तांगा ही हाथ में क्यों न हो?

एक मित्र कहता है, इसकी एक सामाजिक व्याख्या भी हो सकती है. जमुना मानवता का प्रतीक है. मिडिल क्लास यानि आप मानेक मुल्ला और सामंत वर्ग यानि जमुना के जमींदार पति उनका उद्धार करने में असफल रहे और अंतिम में वर्किंग क्लास यानि रामधन ने उनको नयी दिशा दिखाई.
शाबास ओंकार ! खुद कार्ल मार्क्स भी ये बात नहीं सोच सकते थे.
बहस आगे बढ़ जाती है. दूसरे दोस्त ने कहा, ” जमुना जैसी नायिका की कहानी क्यों कही जाए? शकुंतला जैसी भोली भाली नायिका या राधा जैसी पवित्र नायिका उठाते या आधुनिक बनना है, तो जैनेन्द्र की सुनीता जैसी साहसिक नायिका या फिर जयशंकर प्रसाद की देवसेना टाइप ले सकते थे.”
श्याम कहता है, “लेकिन जीवन अधिकांश नायिकाएं जमुना ही होती हैं. 99%
मानेक मुल्ला के पास अपनी थ्योरी है. वो प्रेम पर आर्थिक प्रभाव की बात करता है. मध्य वर्ग के सपने और आदर्श बहुत जल्द हवा हो जाते हैं. ऐसे लोग भी होते हैं जिनकी मर्यादाशीलता कायरता होती है. मसलन तन्ना.
एक मित्र पूछ बैठता है, “इस कहानी का शीर्षक?”
मानेक मुल्ला कहता है, “तुम किसी अखबार के सम्पादक हो? कहानी सुनने आये हो या शीर्षक?”
कहानी बढ़ चलती है. तन्ना की दो बहन थी. बड़ी कमला और छोटी विमला. माँ के देहांत पर पिता महेसर दलाल एक महिला को घर ले आये, जिसे बच्चे मौसी कहने पर मज़बूर हो गए.
तन्ना जमुना से कह रहा है, ” माँ की याद आ रही है, जमुना. हमारा क्या होगा, जमुना?”
तन्ना से शादी की बात करने जमुना के माँ बाप गए हैं. कहानी अब फिर से उसी मोड़ पर चली गयी है.
तन्ना का गोत्र अलग है, घर जमाई बनकर रहना होगा. दहेज़ भी नहीं दे सकेंगे.
तन्ना हिचकिचा रहा है. पिताजी की सेवा कौन करेगा? जमुना के माँ बाप नाराज हो जाते हैं, दहेज़ जुटा लेंगे तो योग्य वर ढूंढ लेंगे.”
महेसर दलाल भी काफी गुस्से में हैं. “मैंने घर में क्या टकसाल खोल रखा है? मेरी दो बेटियों का दहेज़ कहाँ से आएगा?”
तन्ना अपने पिता के आतंक के साये में जीने वाला दब्बू युवक है. आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है. प्रेम कैसे करे?

महेसर दलाल को दुकानदार ( वीरेंदर सक्सेना) एक रिश्ता सुझाता है. एकलौती लड़की है, पैसे वाली. तभी दूकान पर एक साबुन बेचने वाली लड़की आती है. लड़की से दुकानदार छेड़खानी करना चाहता है, तो वो चाक़ू निकाल लेती है. हथ कटे फौजी चमन ठाकुर (ललित मोहन तिवारी) की भतीजी है. नाम है सत्ती ( नीना गुप्ता).

तन्ना कॉलेज के एग्जाम में फेल हो गया है. बुरी तरह बेटे को धुनते हैं महेसर दलाल. फिर उसे स्टेशन मास्टर से बात करके नौकरी पर रखवा देते हैं. डाक बोरियों का हिसाब रखना होगा.
लौटते समय महेसर दलाल चमन ठाकुर के यहाँ रुक जाते हैं.
” चमन ठाकुर, आजकल तुम्हारे साबुन का क्या भाव चल रहा है?”
सत्ती जब उन्हें झिड़कती है, तो वे कहते हैं, “मैं हूँ महेसर दलाल. तेरी आँखों का काजल भी बेच सकता हूँ. सब दुकानदार जानते हैं मुझे यहाँ.”
मानेक कहता है, “महेसर दलाल थे बड़े रंगीन मिजाज. अच्छे खासे दिलफेंक. बात सबुनवाली तक ही सीमित नहीं रही.”

तन्ना की शादी लिली ( पल्लवी जोशी) से तय करने महेसर दलाल उसके घर जाते हैं. बात करते करते महेसर दलाल लिली की माँ को दिलफेंक इशारे करने लगते हैं: कौन मानेगा कि आप इसकी माँ हैं. आप तो इसकी बड़ी बहन लगती हैं.” कहते कहते महेसर दलाल लिली की माँ का हाथ अपने हाथ में ले लेते हैं: शादी की तैयारियों की तुम चिंता मत करो. मैं हूँ न.”

मानेक कहता है, मौसी अपना वैवाहिक हक़ जताने की गलती कर बैठी, जिसकी उन्हें कीमत भी चुकानी पड़ी.” मौसी को घर से निकाल दिया गया.
,जमुना मायके आने पर तन्ना से मिलती रहती है; “तन्ना तुम मुझे भूल गए इतनी जल्दी?”तन्ना की शादी के बाद जमुना ने लिली से हेलमेल बढ़ा लिया। तन्ना की पत्नी लिली सुन्दर थी, पढ़ी लिखी थी और थोड़ी घमंडी भी.
लिली प्रेग्नेंट है.
लिली एक ज्योतिषी के बारे में बताती है जमुना को. लिली जचगी के लिए जो मायके गयी, तो फिर लौट कर नहीं आयी. तन्ना को अकेले रहना पड़ा बाप और दो बहनों के साथ.

मानेक कहता है, फिर एक घटना के चलते महेसर भी घर छोड़ने पर मज़बूर हो गए. बाजार में खबर है कि शायद चमन ठाकुर और महेसर ने मिलकर सत्ती का गला दबा कर मार दिया. गिरफ्तारी के डर से पुलिस से भागे भागे फिर रहे हैं.
तन्ना अपनी पत्नी को मनाने ससुराल आया है. महेसर दलाल वहीँ छुपे हुए हैं. लिली को अपने ससुर से घिन आती है. वो तन्ना से भी कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती. पैसे वे लिली और उसकी माँ मज़बूत हैं. उन्हें किसी पुरुष के सहारे की जरुरत नहीं है.
मानेक कहता है, “महेसर इस कहानी से गायब हो गए. शायद उन्हें कोई दूसरी औरत मिल गयी. ऐसे लोग कहाँ बदलते हैं? और तन्ना … वो वक़्त से पहले ही बुढ़ा गया.”
एक दिन स्टेशन पर जमुना और तन्ना मिले. वक़्त ने दोनों को काफी बदल दिया था.
जमुना कहती है, बेटा, मामा को प्रणाम करो. ये रामधन हैं. हमारी एस्टेट की देखरेख यही करते हैं.
जमुना और उसके बेटे से मिलकर जाते समय तन्ना आ रही ट्रेन की चपेट में आ गया. हॉस्पिटल में उसकी मौत हो जाती है. जमुना बिलख बिलख कर रो रही है. लिली हॉस्पिटल में आती है. वो जमुना को तन्ना के मृत शरीर से लिपटी देखकर ठिठक जाती है. हौले से सांत्वना देने के लिए उसकी पीठ पर हाथ धरती है.

कहानी फिर से मानेक और दोस्तों के बीच आ गयी है. कमरे में सन्नाटा पसर गया है. मानेक के दोस्त एक एक करके कमरे से हौले से निकल जाते हैं. मानेक मुल्ला के चेहरे पर एक गहरी वेदना पसर गयी है.
अगले दिन श्याम मिलता है. उसने रात में सपने में तन्ना को देखा है. काफी विस्तार से सपने का वर्णन करता है.
कहानी फिर शुरू होती है.
प्रेम पर अपनी थ्योरी मानेक मुल्ला दे रहा है, ” ये सच है कि प्रेम आर्थिक स्थितियों से अनुशासित होता है, पर यह केवल आंशिक सत्य है. प्रेम तो सपने, सौंदर्य और संगीत भी है. लेकिन जिस प्रेम में परिपक्वता और साहस नहीं होता है जो कि इन सपनों को सामाजिक सम्बन्ध में बदल सके, वे इसी तरह गायब हो जाते हैं, जैसे बादल की छांव. आज मैं ऐसी लड़की की कहानी सुनाऊंगा जो मुझे ऐसे बादलों के दिन बार- बार याद आती है.
लिली ( पल्लवी जोशी) की कहानी शुरू होती है.

लिली की शादी होने वाली है. देवदास देख कर आयी है. रोये जा रही है.
“क्या होगा मानेक? तुमसे एक दिन नहीं मिलती तो जी घबराता है.”
मानेक कहता है, ” हमारे प्यार को हमसे कोई नहीं छीन सकता. जानती हो, तुम्हारा प्यार मुझे सदा बल देता रहेगा.”
लिली की शादी तन्ना से हो जाती है. मानेक कुछ नहीं करता.
इस बात के लिए उसके दोस्त उसे उलाहना देते हैं.
मानेक कहता है, ” तुम लोगों ने न ज़िन्दगी देखी है और न ढंग की किताबें पढ़ी हैं. ज्यादातर ये होता है कि इस तरह के अनुभव के बाद कोई और आती है, जिसमे ज्यादा ईमानदारी और बल होता है. देखो देवदास को पारो के बाद चंद्रमुखी मिली.”

मानेक की जिंदगी में भी लिली के बाद सत्ती आयी. सत्ती जो जमुना और लिली दोनों से अलग है.
एक मित्र कहानी सुनते सुनते ऑब्जेक्शन करता है: ” कथा में टेक्नीक नहीं है. बस एक दिशा में बढ़ती चली जाती है.”
मानेक कहता है, ” टेक्नीक किसे चाहिए? जिसके पास कहने को कुछ नहीं है. मुझे तो चेखोव जैसे लेखक पसंद हैं जो पाठकों को बांधने की अद्भुत क्षमता रखते थे. उन्होंने एक महिला से कहा कि आप मेरे सामने कोई भी चीज रख दें, मैं उसके इर्द गिर्द कहानियां बुन दूंगा.”
“अच्छा तो आप इसके इर्द गिर्द कहानी बुनकर दिखाईये.” दोस्त एक चाक़ू आगे बढ़ा देता है.
चाक़ू को देखते हुए मानेक मुल्ला कहता है, ” ये तो उसकी कहानी का केंद्र बिंदु ही है. जब वो मुझे अंतिम बार मिली तो उसके हाथ में ये चाकू ही था.”
कहानी आगे बढ़ चलती है.
हमारे मोहल्ले में एक रिटायर्ड अपाहिज सैनिक रहता था. एक मिलिट्री एक्शन में एक 2 साल की अनाथ बच्ची को अपने साथ ले आया. अपाहिज होने पर पेंशन मिलने लगा और फिर हमारे गांव में आकर उसने साबुन का कारोबार शुरू कर दिया. एक बार उसका हिसाब किताब करने रुक गया था. उस दिन के बाद अक्सर हिसाब में मदद करने लगा. गणित में मेरी दिलचस्पी अचानक बढ़ गयी.

मानेक के 12वी की परीक्षा पास करने पर सत्ती बेहद खुश है. मानेक के बड़े भाई की इच्छा है कि अब वो सरकारी नौकरी पकड़ ले, जबकि मानेक अभी आगे पढ़ना चाहता है. सत्ती उसे हर तरह से पढ़ाई में आर्थिक मदद करने का वायदा करती है. सत्ती की अपनी समस्याएं हैं. सत्ती पर तन्ना के पिता महेसर दलाल लट्टू हैं और एन केन प्रकार से उसे हासिल करना चाहते हैं.
एक बार महेसर दलाल ने 1000 रूपये चमन ठाकुर को दिए और उस रात सत्ती से बलात्कार किया. एक बार चमन ठाकुर और महेसर दलाल के चंगुल से बचकर सत्ती गहने कपडे समेट कर मानेक के घर आ गयी. किचन में छुपी हुई है सत्ती. मानेक के बड़े भाई महेसर दलाल और चमन ठाकुर को बुला लाते हैं. पूरी योजना की जानकारी मानेक को भी है. वो सत्ती के जाने की प्लानिंग को देर करता है. महेसर दलाल और चमन ठाकुर सत्ती को जबरन पकड़ कर ले जाते हैं. सत्ती का चाक़ू उसके हाथ से गिर गया है. मानेक उसे उठा लेता है. मानेक भी तन्ना की तरह कमजोर पड़ गया है. मिडिल क्लास का है, वैल्यूज को पकड़कर दूर तक नहीं चल सका.

अगले दिन बाज़ार में चर्चा है कि सत्ती की महेसर दलाल और चमन ठाकुर ने हत्या कर दी है.

अब और कहानी नहीं. जब मानेक ने ये बात कही तो एक दोस्त ने तंज कैसा, ” क्योंकि आप हर बार अपने आप को हीरो बनाकर नहीं दिखा सकते, इस खातिर? जमुना ने इन्हे तन्ना की जगह चाहा, वहां से ये भागे. लिली ने सच्चे दिल से प्यार किया, वहां भी जिम्मेदारियों से साफ़ दामन छुड़ा लिया. और सत्ती के मामले में तो हद्द ही कर दी. ”
सत्ती के साथ धोखे का मानेक को अफ़सोस है. उसकी मृत्यु के बाद मानेक को अपनी कविता में भी मृत्यु की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ने लगी.
एक बार फिर श्याम को सपना आता है सत्ती, लिली, जमुना, और तन्ना का.
मानेक श्याम को सलाह देता है कि तुम अपने सपनों को सरल भाषा में लिखकर आम जन तक पहुंचाओ.
मानेक दोस्तों के साथ चौक पर चाय पीने आया है. चाय पीते हुए मानेक कहता है, “कहानियां सत्य और असत्य का अजीब मिश्रण है, जिसके जरिये इंसान जो है, जो बन सकता है, जो बनना चाहता है, सब एक ही माध्यम से दर्शा सकता है. कहानियों में असलियत को मोड़कर हम अपनी मनोकामनाएं पूरी कर लेते हैं.”
तो फिर उस तरह की प्रेम कहानियां क्यों नहीं सुनाते?
पर इनकी कहानियों में प्रेम था ही कहाँ? एक दोस्त तंज कसता है.

मानेक कहता है, जिंदगी प्रेम की तलाश में गुजर जाती है. लेकिन फिर भी कोई न कोई चीज ऐसी है, जो हमें आगे बढ़कर रौशनी की ओर जाने की प्रेरणा देती है. और हम उसी तरह आगे बढ़ते जाते हैं, जैसे सात घोड़े सूर्य को आगे ले चलते हैं और जो इन घोड़ों में सबसे छोटा होता है, सबसे पीछे वाला घोडा, उसे भविष्य का घोड़ा कहते हैं. सूरज का सातवां घोड़ा.
बाबूजी. कोई भिखारिन मानेक के कंधे पर भीख की आस में हाथ रखती है. मानेक की तन्द्रा टूटती है.
वो पीछे मुड़ता है. दोनों हक्के बक्के रह जाते हैं. भिखारिन कोई और नहीं, सत्ती है, उसके साथ एक बच्चा भी है. थोड़ी दूर पर एक हाथ गाडी है जिस पर चमन ठाकुर बैठा है. सत्ती एकदम से पीछे हटती है. चेहरे पर नफरत, क्रोध, दर्द, betrayal के भाव हैं.

वो हाथ गाडी को खींचती हुए दूर जा रही है. मानेक एक ज़ोम्बी की तरह उसके पीछे पीछे चलते हुए धुंध में खो जाता है.

कहानी फ्लैशबैक से वर्तमान में आ जाती है. श्याम कहता है, उसके बाद मानेक मुल्ला का कुछ पता नहीं चला. पर मैं लेखक जरूर बन गया.

अपने अद्भुत सिनेमाई प्रयोग के चलते इंडियन सिनेमा को एक कालजयी फिल्म मिल गयी.

फिल्म एक बेहद जटिल कहानी को पूरी ईमानदारी से पेश करने में सफल रही. फिल्म में अपने अभिनय के लिए अमरीश पूरी को दो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. पैरेलल सिनेमा को नसीर, ओमपुरी और पंकज कपूर की पीढ़ी के बाद रजित कपूर के रूप में एक बेहद सक्षम कलाकार मिला. हिंदी सिनेमा में मल्टीप्ल फ्लैशबैक के साथ साथ एक ही घटना को अलग अलग एंगल से कहने का एक्सपेरिमेंट इस एक्सपर्ट लेवल पर नहीं दुहराया जा सका. फिल्म ने श्याम बेनेगल को मोस्ट सेरिब्रल डायरेक्टर के रूप में स्थापित किया. फिल्म को बेस्ट हिंदी फिल्म का नेशनल अवार्ड मिला, हालाँकि फिल्म व्यावसायिक रूप से असफल रही, पर अपने अद्भुत सिनेमाई प्रयोग के चलते इंडियन सिनेमा को एक कालजयी फिल्म मिल गयी.


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