रेडियो एनाउंसर कब्बन मिर्ज़ा जिनके गाये दो गाने उन्हें अमर कर गए

Ashok Singh

कब्बन मिर्जा की याद हमेशा मन में बनी रही है। वर्ली के आकाशवाणी भवन में कब्बन मिर्ज़ा कहा करते थे, भाई इस बात का गम न करो, कि मैं केवल दो गाने गा पाया। मुझे इसका सुकून है कि भारतीय फिल्म जगत में जो बेशुमार बेहतरीन गाने बने हैं उसमें दो गाने मुझे भी गाने को मिले हैं। खैय्याम साहब ने मेरे लिए अवसर बनाया। उस ऊपर वाले का अहसान कि पहले रेडियो में लोगों को दूसरों के गीत सुनाए और उन गाने वालों में मैं भी शामिल हूं। जब भी लोग मेरे गीतों को सुनने के लिए कहीं फरमाइश करेंगे मेरी रूह को जरूर चैन मिलता रहेगा।
कब्बन जी को जब कैंसर हो गया था तो कहा करते थे
कोई बात नहीं, अब गाने नहीं गा सकता, लेकिन अब जिंदगी का कुछ समय है मेरे पास।
कब्बन मिर्ज़ा साहब ने दो ही गीत गये और उन दो गानों ने उन्हें अमर कर दिया.
तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है। मुझे तेरी दूरी का गम हो क्यों , तू कहीं भी है मेरे पास है। निदा फ़ाजली जी का लिखा हुआ यह गीत कब्बनजी ने गाया था। क्या खूब गाया था।

कब्बन मिर्जा रेडियो एनाउंसर थे।

खय्याम साहब रजिया सुल्तान मे गुलाम याकुब के लिए किसी पाठदार आवाज की तलाश में थे। कई गायकों का टेस्ट ले चुके थे। लेकिन बात नहीं जम रही थी। तब किसी ने उन्हें कब्बन मिर्जा का नाम बताया था। विविध भारती की एक चर्चित आवाज। और कुछ महफिलों में गीत गाने गुनगुनाने वाले कब्बन मिर्जा। फरमान पहुंचा तो वह खैय्याम साहब के संगीत कक्ष में पहुंचे।
आवाज की परख के लिए खैय्याम साहब ने उन्हें मोहर्रम के समय गाए जाने वाले मर्सिया नोहे गाने के लिए कहा। कब्बन मिर्ज़ा ने जैसे ही गाना शुरू किया खैय्याम साहब समझ गए कि उनकी तलाश पूरी हुई। इसी आवाज की उन्हें तलाश थी। बहुत सधे हुए ढंग से खैय्याम साहब ने उन्हें गवाना शुरू किया, आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे। इसके बाद तेरा हिज्र मेरा नसीब है। दोनों गीतों की धुन मुश्किल थी। लेकिन कब्बन मिर्ज़ा ने उस धुन को साध लिया। चौथे दिन कब्बन ने पहले गीत की रिकार्डिंग भी कर ली।
रजिया सुल्तान धमेंद्र और हेमामालिनी की फिल्म थी। कब्बन मिर्ज़ा की आवाज को रजिया सुलतान के दरबार में हब्शी सरदार याकूब के लिए इस्तेमाल करना था. एक भारी और असर छोड़ती आवाज। फिल्म तो नहीं चली लेकिन कब्बन मिर्जा के गीत घर घर गूंजने लगे।
उनके गीतों को लोगों ने रिकार्ड में बार बार सुना।

कब्बन मिर्जा का विविध भारती में छायागीत को प्रस्तुत करने के अंदाज कुछ अलग ही था।

इससे पहले कब्बन मिर्जा  का परिचय एक रेडियो एनाउंसर के रूप में ही थी। गीत संगीत उनके जीवन में था। विविध भारती मे शाम एक आवाज गूंजती थी, छाया गीत सुनने वालों को कब्बन मिर्जा का आदाब। रेडियो के श्रोता इस आवाज के भी दीवाने थे।
रेडियो की दुनिया में बृजमोहन, विनोद शर्मा, देवकीनंदन पांडे जैसे लोगों की आवाज फिल्म और विज्ञापनों के लिए तलाशी जाती रही। लेकिन रेडियो उद्घोषक कब्बन मिर्ज़ा गायक के तौर पर शोहरत पा गए थे. सबको लगता था कि खैय्याम साहब ने जिस शख्स से इतने सुंदर गीत गवाए वो आगे भी बहुत से गीत गाएगा।
लेकिन एक तरफ रजिया सुल्तान के गीत बज रहे थे वही दूसरी ओर कब्बन मिर्ज़ा के लिए डाक्टर एक बुरी खबर लाया। उन्हे कैंसर हो गया था। कब्बन मिर्ज़ा इसके बाद ज्यादा दिनों तक नहीं जी सके.
कब्बन मिर्ज़ा को हम रेडियो में सुनते रहे। कब्बन मिर्जा और निदा फाजली दोनो इस दुनिया से चले गए, हमारे पास यादों में वही गीत है। सुनने के लिए, और रह रहकर गुनगुनाने के लिए। कब्बन मिर्ज़ा अब हमारी यादों में हैं।

कब्बन मिर्ज़ा रेडियो अनाउंसर थे लेकिन लोगों के जेहन में वो बेहतरीन गायक है।
ऐसे इतफाक और भी हुये हैं। शैलेन्द्र सिंह चॉकलेटी चेहरा लेकर हीरो बनने आये थे पर उनकी आवाज की ताजगी से राज कपूर इतने प्रभावित हुये कि अपनी फिल्म बॉबी के सारे गाने उन्ही से गवाये और शैलेन्द्र सिंह ऋषि कपूर के आवाज बन गये।
मशहूर गीतकार आनंद बक्शी भी गायक बनने आये थे और उन्होने जो कुछेक गाने गाये, बेहतरीन गाये लेकिन लोग यह भी प्रचारित करने लगे कि जिस फिल्म मे उनका गाना होता है वह फिल्म फ्लाप हो जाती है , इसलिये शोले फिल्म में उनकी मन्ना डे, किशोर कुमार, रफी साहब के साथ गायी हुई कव्वाली संपादन की भेंट चढ़ गयी.
कुछेक लोग भले ही प्रशिक्षित गायक नहीं हो लेकिन उसकी अलग खनकदार आवाज का जादू कई बार चल जाता है।


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