गमन (1978): माइग्रेशन से उपजे दर्द पर मुज़फ्फर अली की क्लासिक फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

माइग्रेशन पर कुछ बेहतरीन फ़िल्में हिंदी सिनेमा से निकल कर आयी हैं. एक फिल्म थी, सई परांजपे की ” दिशा” (1990). 1978 में रिलीज़ मुज़फ्फर अली की फिल्म “गमन” ( प्रस्थान) माइग्रेशन पर एक क्लासिक फिल्म है. फिल्म फाइनेंस कारपोरेशन के आर्थिक सहयोग से बेहद छोटे बजट से बनी ये फिल्म अपने असर में कातिलाना है. समय के साथ इसने कल्ट स्टेटस हासिल कर लिया है.

फिल्म न चाहते हुए भी घर परिवार को छोड़कर रोजी रोटी की तलाश में सपनों के शहर बम्बई जाने को मज़बूर नायक की कहानी है, पर बम्बई उसकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती. सपनों को पूरा करना तो दूर, जिंदगी रोज का संघर्ष हो जाती है और जो अपने घर लौटने को छटपटाता रहता है और जिसके आने की आहट सुनने को बेचैन उसकी पत्नी हर रोज दरवाजे पर चली आती है पर हर रोज जिसके हिस्से निराशा ही हाथ लगती है.

फिल्म की कहानी:
फिल्म लखनऊ के पास के एक गांव की कहानी है. गुलाम हसन ( Farooq Sheikh) अपनी माँ और अपनी बीबी के साथ गांव में रहता है. कभी परिवार के दिन अच्छे थे, पर पिता के इंतकाल के बाद बुरे दिन शुरू हो गए हैं. उसकी बीबी खैरु ( Smita Patil) रजाई बुनकर कुछ पैसे जुटाती है, पर कर्जा उतारने में ही वो पैसे चूक जाते हैं. अमर सिंह ( Nitin Sethi) ने गुलाम हसन की जमीन हथिया ली है. अब वो अपनी ही जमीन पर पट्टीदारी में काम करता है, पर यहाँ भी हिस्सा देने में गांव का दबंग जमींदार बेईमानी करता है. खाद, बीज, सिंचाई आदि की बढ़ती कीमत का हवाला देकर मज़दूरी लगातार कम की जा रही है. इसके खिलाफ सुगबुगाहट हो रही है कृषक मज़दूरों में. बगल के गांव में बच्चू पंडित ने चमारन टोला में आग लगवा दी. “मजूरी माँगत रहै बढ़ाई के. भुट्टा सन भुन गए.”
इस सीजन में भी कटाई के समय मालिकों की नाक में दम हो गया. मुस्लिम मज़दूर मुहर्रम में लगे थे और दलित मज़दूर अपने नेता पुट्ठु के “उकसाने” में आकर ऊँची मजूरी मांग रहे थे. ऐसे में बगल के गांव से मज़दूर मंगा कर फसल की कटाई हो पायी.

गांव से कुछ लोग बम्बई में पहले से बसे हुए हैं. एक तो गुलाम का दोस्त लल्लूलाल तिवारी ( जलाल आगा) है, जो बम्बई में टैक्सी चलाता है. वो गांव आने पर अपने साथियों को बम्बई चलने को कहा करता है: ” वहां कान भी साफ़ करोगे, तो दिन भर में 15 रूपये कमा लोगे. यहाँ तो ठाकुर का तलवा चाटने के अलावा उपाय क्या है?”
गांव में काम नहीं है, ऋण के बोझ से दबा है परिवार. आठवीं तक गुलाम के लिए अवसर सीमित हैं. मिल में छंटनी के चलते वहां भी काम नहीं है. अम्मा की तबियत भी नासाज रहने लगी है. अंत में कोई और उपाय न देखकर गुलाम हसन बम्बई की राह लेता है.

बम्बई में लल्लू लाल की खोली में आता है, जिसे वो तीन अन्य लोगों के साथ शेयर कर रहा है. गांव की खुली आबोहवा का आदी गुलाम रहने की ऐसी व्यवस्था देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है. लल्लू उससे कहता है, “अरे, यही तो ताजमहल नंबर 1 है. दूसरे नंबर का ताजमहल आगरा में है.”
लल्लु उसे बम्बई घुमाने ले जाता है. रास्ते में ट्रेन एक जगह रुक जाती है. एक्सीडेंट हो गया है. एक आदमी ट्रेन के नीचे आकर कटकर मर गया है. लोग समय जाया जाने से हड़बड़ा रहे हैं. गुलाम हसन लोगों की संवेदनहीनता पर हैरत में पड़ जाता है. लल्लू उसे समझाता है, “शहर के तौर तरीकों से अभी अपरिचित हो. जल्दी ही परिचित हो जाओगे.” लल्लू की एक गर्लफ्रेंड है, यशोधरा ( गीता सिद्धार्थ). यशोधरा चिढ़ती है कि लल्लू उसे जसोधरा कहके पुकारता है. गुलाम यशोधरा को लल्लू के बारे में बताता है, “ये स्कूल में भी युधिष्ठिर को जुधिष्ठिर कहता था. टीचर से मार खाता था.” यशोधरा एक कामकाजी युवती है, जो अपने भाई वासु ( नाना पाटेकर), और माँ बाप के साथ रहती है. वासु निठल्ला है और असामाजिक तत्वों की संगत में पड़ गया है. यशोधरा के पिता कार चलाया करते थे, पर अब बेकार हैं. अपनी खुशियों और परिवार के प्रति जिम्मेवारियों के दो पाटों के बीच पिसती यशोधरा की अपनी समस्याएं हैं.

लल्लू की मदद से गुलाम को गाड़ियों की साफ सफाई का काम मिल जाता है. लल्लू से कुछ पैसे उधार लेकर गांव मनीऑर्डर भेज देता है. 70 रूपये. कुछ दिनों के बाद वो टैक्सी चलाना भी सीख लेता है. अब वो टैक्सी चलाने लगा है. और बड़ी मेहनत से एक एक पैसे जोड़ रहा है. चिट्ठी में खैरुन को लिखता है, “चेहल्लुम करने गांव आऊंगा.”
वहां उसकी भेंट अपने इलाके के कई लोगों से होती है. एक तिवारीजी हैं, एक रामप्रसाद है जो 30 सालों से टैक्सी चला रहा रहा है. गुलाम के पिता को रामप्रसाद जानता है.
पैसे पैसे जोड़ रहे गुलाम के लिए बम्बई सपनों की नगरी नहीं है. अम्मा दिन रात याद करती है. खैरुन का भी दिल नहीं लगता. चाहती है कि गुलाम दोनों को अपने पास बम्बई बुला ले. पर इतने साल काम करने के बाद भी लल्लू के पास अपनी खोली नहीं हो पायी है, गुलाम के लिए तो अपनी खोली एक दुरूह स्वप्न जैसा है. एकाकीपन जीवन में पसर रहा. जीवन का संघर्ष अपनी कीमत वसूल रहा है, पूरी बेरहमी से. काम करने के बाद भी परिवार की स्थिति में कोई बेहतरी नहीं. एक दिन खैरु की चिट्ठी मिलती है. अम्मा फर्श पर गिर गयी हैं. कूल्हे की हड्डी टूट गयी है. दर्द से बेज़ार हो रही हैं. लखनऊ में इलाज करवाना होगा. पैसे के इंतजाम के लिए परेशां है गुलाम.

इधर लल्लू और यशोधरा की दिक्कतें भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. यशोधरा को वासु गल्फ कंट्री भेजना चाहता है. दो साल के 24000 रूपये मिलेंगे. पर यशोधरा नहीं जाना चाहती. वो लल्लू के साथ शादी करके अपनी घर गृहस्ती जमाने के सपने देख रही है. यशोधरा के लगातार इंकार करने पर एक दिन वासु अपने लोगों के साथ मिलकर लल्लू की ह्त्या कर देता है.

लल्लू की ह्त्या गुलाम को हिला कर रख देती है. इस अजनबी शहर में उसने अपना सबसे करीबी दोस्त खो दिया है. अम्मा के इलाज के लिए वो बमुश्किल पैसे जुटा पाया है. अंतिम दृश्य में वो स्टेशन पर खड़ा है. लखनऊ के लिए ट्रेन लगी है. पर वो सोच रहा है. आने जाने में ही सारे पैसे खर्च हो जाएंगे, हाथ में क्या बचेंगे. वो भरे मन से घर न जाने का फैसला करता है. “पता नहीं अम्मा का का होईहें? खैरु अकेले का का करिहें? पता नहीं का होहियें?”

गुलाम फिर से बम्बई की सड़कों पर अपनी टैक्सी दौड़ा रहा है इस उम्मीद के साथ कि कभी इतने पैसे जमा हो जाएंगे और वो सपनो की नगरी के बाहुपाश से आज़ाद होकर अपने गांव लौट पायेगा. उधर गांव में घर पर खैरुन गुलाम के क़दमों की आहट के इन्तजार में दरवाजा खोलती है और निराश होकर फिर अंदर लौट जाती है.

एक यादगार फिल्म है ” गमन” (1978):
बेहद छोटे बजट में बनी फिल्म “गमन” एक यादगार फिल्म है. फिल्म में मुहर्रम का दृश्य यादगार बन पड़ा है. पूरी सादगी से कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत को याद करते लोगों की भीड़. फिल्म में जब गुलाम बम्बई जा रहा है, और भुंजावाला भूंजा बना रहा है और भूख से बेहाल गुलाम अपने होठो पर जीभ फिराते हुए लालसा से भूंजा का इन्तजार कर रहा है. ट्रेन जब सरपट भाग रही है, पटरी के सामानांतर, गांवों, खेतों, खलिहानों, प्लेटफॉर्म्स को पीछे छोड़ती हुई अपने गंतव्य की ओर, रात, दिन. सपनो की नगरी बम्बई. तो आप महसूस करते हैं जैसे गुलाम के साथ आपकी भी यात्रा चल रही है. फिल्म में कैमरा वर्क बेहतरीन है. बम्बई शहर, टैक्सी ड्राइवर्स, उनके काम करने के तरीकों, उनकी उम्मीदों को जीवंत कर दिया गया है. गुलाम बम्बई पहुंचा है अपने सामान के साथ. बस चल रही है और बाहर से डायलाग के माध्यम से ही गुलाम के सामान के चलते बस के अंदर के यात्रियों की असहजता, कंडक्टर की चिल्लमपों सबको बेहद प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है.

लल्लूलाल के रोल में जलाल आगा ने अपना असर छोड़ा है. फारुख शेख और स्मिता पाटिल ने बेहतरीन भूमिकाएं की हैं. गुलाम हसन की भूमिका में फारुख शेख जमे हैं. एक कम पढ़ा लिखा युवक, जिसके पास बोलने को बहुत कुछ नहीं है, पर सोचने को पूरी दुनिया. जो अपने घर से दूर सपनों के शहर में एक आउटसाइडर की तरह शायद कभी न पा सकने वाले सपनों का पीछा कर रहा है. गुलाम हसन के किरदार के दर्द से वे हमें भिंगों जाते हैं.

फिल्म के गीत संगीत की चर्चा न हो, तो फिर फिल्म की चर्चा अधूरी रह जायेगी. फिल्म के गीत शहरयार ने लिखे और जयदेव ने संगीत दिया. जयदेव को इस फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए नेशनल अवार्ड मिला. वहीँ छाया गांगुली को भी “आपकी याद आती रही रात भर” के लिए गायन का नेशनल अवार्ड मिला. सुरेश वाडकर की गई ग़ज़ल ” सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यों है” सपनों के शहर में बिखरे सपनों को, विस्थापन के दर्द को बड़ी शिद्दत से उभारती है, हालाँकि मन में एक ख्याल आता है बेसाख्ता, अगर ये ग़ज़ल भूपेंद्र ने गायी होती…इसके अलावा हीरा देवी मिश्रा की ठुमरी ” आजा सांवरिया तोहे गरवा लगा हूँ” बहुत कर्णप्रिय बन पड़ी है.

गमन उदास कर देने वाली फिल्म है. अगर आपने गमन नहीं देखी है, तो आपने अपने जीवन में कुछ मिस किया है. इस कल्ट फिल्म को यथाशीघ्र देख डालिये.


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