महामानव ऐसे ही होते हैं!

जन्मदिन पर रेणु जी तथा उनके उपन्यास के एक पात्र के विलक्षण अंतर्संबंधों पर एक लेख

Sumant Sharan

फणीश्वरनाथ रेणु की इस तस्वीर को देखते ही मुझे पटना पीएमसीएच हॉस्पीटल का एक रोमांचक या कहिए ऐतिहासिक दृश्य आंखों के सामने कौंध जाता है। इस तस्वीर में रेणु जी पीएमसीएच में भर्ती दिखते हैं, बेड नम्बर 21 पर।

मैं घटनाओं की तिथि और साल को याद करने के मामले में बड़ा फिसड्डी हूं, इसलिए जिस रोमांचक दृश्य का ज़िक्र मैं करने जा रहा हूं, उसके साल या तिथि का मुझे तनिक इलहाम नहीं है, यह मैं पहले ही बता दूं।

पूर्णिया और उससे सटे पूरे सीमांचल के अपने समय के और अपने जीवन काल में ही किंवदती बन चुके नक्षत्र मालाकार और फणीश्वरनाथ रेणु के आपसी संबंध कैसे थे, इसे यहां बहुत बताने की ज़रूरत नहीं है। जो लोग रेणु जी के साहित्य से भलीभांति परिचित हैं, उन्हें उनके संबंधों के बारे में अच्छी जानकारी है। उनके मैला आंचल उपन्यास के चलित्तर कर्मकार को कोई भला कैसे भूल सकता है?

मालाकार जी प्रायः सीपीआई पार्टी के हर बड़े कार्यक्रम में पटना आया करते थे। पटना में उनका निवास पार्टी मुख्यालय अजय भवन हुआ करता था। संयोगवश, उसी लंगरटोली गली में 20-25 कदम आगे हम भी किराया के मकान में रहा करते थे। मालाकार जी और मेरे पिता कविवर कन्हैया के बीच बड़ा गहरा लगाव था। इस नाते अजय भवन में रहते हुए मालाकार जी गये शाम हमारे घर पर आ जाते थे और पिता से जाने क्या-क्या बतियाते हुए घंटों गुज़ार देते थे। मुझे याद है, मालाकार जी पर मेरे पिता की एक लंबी कविता जनशक्ति में छपकर खूब चर्चित हो चुकी थी।

मालाकार जी में एक ज़बरदस्त विचित्रता थी। उनमें कवियों और साहित्यकारों के प्रति अगाध श्रद्धा थी, लगभग ईश्वर समान! अपने जीवन का अधिकांश समय मारधाड़ और मरने-मारने के चक्रव्यूह में फंसे रहने तथा जेलों की अंधेरी दुनिया में खपाने वाला कोई शख्स साहित्य एवं साहित्यकारों के आकर्षण से इस कदर आबद्ध हो – मालाकार जी के व्यक्तित्व की इस विचित्रता की गुत्थी मैं आज तक नहीं सुलझा पाया हूं।

फणीश्वरनाथ रेणु अपनी लंबी बीमारी के चलते उन दिनों साहित्य की दुनिया में काफी चर्चा में थे। वे पीएमसीएच के प्राइवेट केबिन जिसका पिछला दरवाज़ा संभवतः गंगा किनारे की ओर खुलता था, में भर्ती थे। मालाकार जी किसी पार्टी कार्यक्रम के सिलसिले में पटना आये हुए थे। पटना आने पर मैं उनके साथ चिपक जाता था। उन्हें भी सहूलियत होती थी मुझे साथ लेकर पार्टी काम से फुर्सत पाकर पटना में कहीं और आने-जाने में। उन्हें मालूम था कि मैं साहित्य की दुनिया में टटका-टटका पांव धर चुका हूं और ऊपर से नीम चढ़े करैला समान नक्सल-असर में भी मज़े-मज़े मुब्तिला हो चुका हूं। वे बतियाते खूब थे। मैं उनके साथ जब होता तो साहित्य और नक्सल दोनों ही दुनिया के बारे में वे खोद-खोद कर ढेरों सवाल मुझसे पूछते। मुझे भी उनकी जिज्ञासा को शांत करने के चक्कर में वीरगाथा समान अपने अनुभवों को रखने में कम रोमांच का अनुभव नहीं होता।

मालाकार जी ने जब जाना कि रेणु जी इन दिनों अस्पताल में भर्ती हैं तो मुझसे उन्होंने उन्हें देखने ले चलने को कहा। मुझे भारी विस्मय हुआ। कहीं किसी रिपोतार्ज में रेणु जी का लिखा हुआ पढ़ चुका था कि मालाकार जी के बारे में उन्होंने संभवतः भ्रमवश यह बात लिख डाली थी कि नछत्तर ने डकैती डालने के सिलसिले में औरतों की इज्ज़त पर भी हाथ डाला था। कहते हैं कि यह बात मालूम होने पर मालाकार जी अपने सर्वज्ञात ‘उचित’ दंड से नवाज़ने की खातिर तभी से रेणु जी की तलाश में रहने लगे थे। वे औरतों की इज्ज़त पर हाथ डालने की कल्पना से ही सिहर उठते थे, मालाकार जी के चरित्र का यह पक्ष सर्वविदित है।

इस नाते अपने ऊपर इतनी घिनौनी तोहमत पर उनका तिलमिला उठना लाज़िमी था। उनके ‘उचित’ दंड का भेद भी सबको मालूम है। अपने शुरुआती दिनों में नक्षत्र मालाकार अपराधियों/कुकर्मियों के नाक-कान काटकर उन्हें दंडित किया करते थे।

रेणु जी उन्हीं दिनों पटना से गांव के अपने घर रहने आये हुए थे। इस बात की जानकारी गिने-चुने लोगों को ही थी। मगर, एक रात किसी ने उन्हें गहरी नींद से झकझोरते हुए जगाया, “भागो, जल्दी भागो, मालाकार आ रहा है!” रेणु जी मालाकार के आने का मतलब अच्छी तरह जानते थे। माने अपने नाक-कान से महरूम हो जाना। वे उसी रात जान लेकर गांव से भागे।

अब इस पूरे वर्णन से वाकिफ होने के कारण जब मैंने रेणु जी से मिलने जाने की मालाकार जी की गुहार सुनी तो मेरा विस्मित होना स्वाभाविक ही था। मगर, मालाकार जी का पक्का इरादा और चेहरे पर भारी निश्च्छलता देखकर मुझे उनसे इस प्रसंग की याद दिलाने की ज़रूरत महसूस ना हुई। मालूम करके कि रेणु जी किस वार्ड में भर्ती हैं, दोपहर का खाना खिलाकर रिक्शा करके मैं मालाकार जी को ले पीएमसीएच पहुंचा।

विश्वासपूर्वक कह नहीं सकता कि उस ऊंघती दोपहरी में रेणु जी के केबिन में और कौन था, यदि गुस्ताखी न मानी जाये तो संभवतः वह गीतकार सत्यनाराण या आलोचक रामवचन राय हो सकते हैं। रेणु जी अपने बेड पर लेटे हुए थे। मालाकार जी को आगे कर हमने केबिन में प्रवेश किया। आगे क्या हुआ, मैं आज भी उस गहन कल्पनातीत दृश्य को याद कर रोमांचित हो उठता हूं।

मालाकार जी ठिठक कर दरवाज़ा के पास ही ठहर गये थे। रेणु जी ने खटका पाकर दरवाज़े की ओर नज़र डाली। कुछ क्षण तक दोनों एक-दूसरे को निस्तब्ध निहारते रहें। तत्पश्चात रेणु जी बेड से उतरे और मालाकार जी भी आगे बढ़े। फिर तो दोनों एक-दूसरे की बाहों में ऐसे कस कर गुंधे गोया दो बिछुड़े हुए गहरे यार ज़माने बाद मिल रहे हों। हमने देखा, दोनों की आंखें भी खूब गीली हो चली थीं।

शाम ढलने पर हम वापस अजय भवन पहुंचे। मगर, मेरे मन में लगातार यह बात कौंध रही थी कि विगत दिनों के दो शत्रु (जिसका वर्णन एक ने खुद ही कलमबद्ध कर रखा हो) क्या कभी इस कदर भी टूट कर गले मिल सकते हैं? आखिरकार, मैंने मालाकार जी को याद कराकर उनसे पूछा, “कॉमरेड, यह क्या माज़रा है? रेणु जी के लिखे उस वर्णन और आज के इस मिलन-दृश्य में किसे हकीकत मानी जाये और किसे झूठ!”

पता है, गहरा सांवलापन लिए नाटा मगर गठीली कदकाठी और निहायत खुरदुरा सा दिखने वाले उस शख्स ने जो आज पूरे सीमांचल के जन-मानस में महानायक का दर्जा दर्ज कर चुका है, क्या जवाब दिया? जैसे कोई अपने खून-पसीने सनी विरासत को संभालने वाले वारिस को नसीहत दे, नक्षत्र मालाकार ने मेरे कांधे को सहलाते हुए जवाब दिया, “बेटे, झूठ और हकीकत वाली कोई बात नहीं है। असल बात है, हमारे समय के इतने बड़े साहित्यकार का मान जिसने अपने साहित्य में हमें जगह दी।”

शायद, महामानव ऐसे ही होते हैैं!


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