फिल्म रिव्यू: ” थप्पड़”

नवीन शर्मा

फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा ज्वलंत मुद्दों पर बेहद संवेदनशील और सधे हुए ढंग से फिल्म बनाते है। मुल्क और आर्टिकल 15 इसके बेहतरीन उदाहरण हैं। उनकी ताजातरीन फिल्म थप्पड़ में भी वो घरेलू हिंसा, औरत की अस्मिता और उसके आत्मसम्मान के मुद्दों को लेकर ऐसी कहानी का तानाबाना बुनते हैं कि जो आपको झकझोर कर सोचने को मजबूर करते हैं। इसमें वो रस्सी पर चलने वाले नट की तरह का संतुलन साधने में सफल रहे हैं अमृता बनी तापसी पन्नू का रोल थोड़ा लाउड होता तो ये संतुलन बिगड़ने का खतरा था।

कुछ यूं है कहानी

अमृता (तापसी पन्‍नू) हाउसवाइफ है। उसे अपने घर का काम करना, पति का ख्‍याल रखना, सास की देखभाल करना पसंद है। वो ये काम कर खूश रहती है। अमृता के पति विक्रम (पावेल गुलाटी) एक कंपनी में अच्‍छे पद पर काम करता है। कंपनी के एक प्रोजेक्‍ट को लेकर विक्रम जी-जान से काम करता है ताकि वह परिवार को लेकर लंदन जा सके. इस प्रोजेक्‍ट में जितनी मेहनत विक्रम करता है अमृता भी विक्रम का उतना ही ख्‍याल रखती है. लेकिन चूंकि वह हाउसवाइफ है इसलिए उसका योगदान किसी को नजर नहीं आता।
विक्रम को प्रोजेक्‍ट मिल जाता है. इस खुशी में वह घर में पार्टी रखता है लेकिन पार्टी के दौरान ही उसके बॉस का फोन आता है और वो कहते हैं कि विक्रम लंदन तो जाएगा लेकिन उसकी पद नंबर वन ना होकर दूसरे नंबर का होगा। यह सुनकर विक्रम आपे से बाहर हो जाता है। वह पार्टी में आए अपनी कंपनी के एक सीनियर से बहस करने लगता है और गाली-गलौज भी करता है। इस दौरान विक्रम के दोस्‍त और भाई उसे रोकने की कोश‍िश करते हैं। विक्रम की पत्‍नी अमृता बीच बचाव के लिए उसे उसे साइड में ले जाने की कोश‍िश करती है तो अचानक विक्रम अमृता को सबके सामने थप्‍पड़ जड़ देता है। इस अप्रत्याशित हरकत से अमृता बेहद अपमानित महसूस कर सदमे में चली जाती है। उसे लगता है उसके पति के प्रति प्यार व परिवार के प्रति समर्पण को उस थप्पड़ ने एक झटके में खत्म कर दिया। उसका आत्मसम्मान धूल धूसरित हो गया। वो यह अपमान सहकर अपने पति के साथ नहीं रह सकती। इसलिए वह अपने पिता के घर चली जाती है।

वहीं विक्रम और उसके परिवार के लोग तो इस बात को मामूली सी बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। विक्रम को भी लगता है कि वह गुस्‍से में था इसलिए उसने अमृता पर हाथ उठा दिया। उसे इस हरकत के लिए कोई ग्‍लानि नहीं होती। इसलिए वो कहता है कि अमृता थप्पड़ की मामूली सी घटना का बतंगड़ बना रही है।

यहीं से शुरू होती है अमृता की लड़ाई। विक्रम को लगता है कि वह खुद नहीं आएगी तो वह उसे घर वापस लाने के लिए भी जाता है तो उसके रवैये में ग्लानि और प्रेम की जगह पुरुष वर्चस्व का एटीट्यूड नजर आता है। वो कहता है कि अमृता को इसे भूल कर घर चलना चाहिए। अमृता साथ नहीं आती तो उसे लीगल नोट‍िस भेज देता है। विक्रम को लगता है कि वह अमृता पर थोड़ा दबाव बनाएगा तो अमृता पर से कानूनी लड़ाई का भूत उतर जाएगा। इसलिए उसपर एल्‍कोहॉलिक होने, मेंटल होने के इल्‍जाम लगाए जाते हैं। अमृता बिना एलीमनी मांगे बस एक थप्‍पड़ की पेट‍ीशन दायर करती है। इस बीच उसे पता चलता है कि वह प्रेग्‍नेंट है. वह खुश होती है, बच्‍चे के लिए रखी गई पूजा-पाठ में शामिल होती है। विक्रम की मां को दिल का दौरा पड़ता है तो सेवा करने भी जाती है पर वो अब विक्रम के साथ रहना नहीं चाहती।

मैच्योर एक्टिंग
पिंक से शुरू कर अपने हर कैरेक्‍टर की तरह इस बार भी तापसी पन्‍नू अमृता के किरदार में खरी उतरी हैं । फिल्म की शुरुआत में खुशमिजाज और चहकती महिला के रूप में तथा बाद में उदास और अंदर से टूटी महिला के किरदार को तापसी ने काफी अच्‍छे तरीके से निभाया है।तापसी ने इससे पहले भी गंभीर रोल निभाए हैं पर थप्‍पड़ की बात ही अलग है। फिल्‍म में उनका डायलॉग- ‘बस एक थप्‍पड़ पर नहीं मार सकता.’ दिल की गहराई से निकल कर बहुत भीतर तक घंस जाता हैं। फिल्म के लेखक और डॉयलॉग लिखने वालों की तारीफ करनी होगी की जब विक्रम और अमृता की लड़ाई कोर्ट में पहुंच जाती है तथा विक्रम के वकील द्वारा लगाए गए अनाप-शनाप आरोपों के बाद भी अमृता का व्यवहार बहुत संतुलित रहता है वो बेमतलब की लाउड नहीं होती और ना ही बदले की भावना में कोई कदम उठाती है।

वहीं विक्रम का रोल निभा रहे पावेल गुलाटी ने भी अच्‍छा काम किया है। वह अपनी पत्‍नी से प्‍यार करता हैं लेकिन उसे अपने काम और इमोशंस का ज्‍यादा ख्‍याल है। दूसरे शब्दों में कहें तो वह सेल्फसेंटरड ज्यादा है। फिल्‍म के बाकी सपोर्ट‍िंग एक्‍टर्स कुमुद मिश्रा, तनवी आजमी, रत्‍ना पाठक, दीया मिर्जा तथा राम कपूर ने भी अपने किरदार बढ़िया ढंग से निभाए हैं ।

फिल्‍म सिर्फ घरेलू हिंसा के एक मुद्दे को हाइलाइट नहीं करती बल्‍क‍ि औरत के कमजोर होने के पीछे छिपी उन सभी वजहों को भी उजागर करती है।जैसे औरत का अत्‍याचार सहना, औरत को पीछे करने के पीछे औरत का हाथ होना, समाज का ख्‍याल। ये इस मानसिकता का विरोध करती है कि पति द्वारा पत्नी की पिटाई मामूली नहीं गंभीर मसला है इसे यूं ही टाला नहीं जा सकता। इसका कड़ा विरोध होना चाहिए। ऐसा विरोध अमृता करती है। उसके पिता (कुमुद मिश्रा ) भी करते हैं जब उनका बेटा अपनी पत्नी से इस बात को लेकर लड़ जाता है अमृता को अपमान को भूल कर अपने घर जाना चाहिए। ऐसे में उसके पिता बेटे को ही घर से निकल जाने को कहते हैं। अमृता के पिता का साहित्य के प्रति प्रेम। रामधारी सिंह दिनकर की कविता का पाठ और अपनी कविता के नाम पर बेटी का नाम अमृता नाम रखना। एक प्यारी सी कविता सुनना ये सब फिल्म को दिल को छूता है।

किसी भी घर को बनाने और उसे सजाने संवारने और अच्छे ढंग से चलाने में औरत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन उसको इस अहम भूमिका के लिए जितना क्रेडिट और सम्मान मिलना चाहिए वो कई बार नहीं मिलता है यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। खासकर जब कोई हाउसवाइफ घरेलू हिंसा का शिकार होकर पति से अलग होती है तो उसके लिए जीवन में आगे की राह बेहद पथरीली और कांटों भरी होती है। उसके मायके वाले भी चाहते हैं कि वो समझौते कर अपने ससुराल में ही टिकी रहे।

थप्‍पड़ कुल-मिलाकर एक बढ़‍िया फिल्म है। अगर सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए आप फिल्म नहीं देआते हैं तो यह आपके लिए मस्टवाच मूवी है। एक गाना अच्छा लगा आप भी सुनिए उम्मीद है पसंद आएगा।


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