ख़ामोशी (1970): वहीदा रहमान के सशक्त अभिनय और खूबसूरत गीत संगीत से सजी यादगार फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

राजेश खन्ना के करियर के शुरूआती दौर में फिल्म आयी थी, ” ख़ामोशी”. ये फिल्म डायरेक्टर असित सेन ने सबसे पहले 1959 में सुचित्रा सेन को लेकर ” दीप ज्वेले जाए” नाम से बँगला भाषा में बनायी थी. फिल्म असाधारण रूप से सफल रही थी. अगले साल इस फिल्म को तेलगु में बनाया गया, जिसमे लीड रोल सावित्री ने निभाया था. असित सेन ने हिंदी में ‘ममता’ और ‘अनोखी रात’ नामक दो फ़िल्में बनायीं. 1970 में वहीदा रहमान को लीड रोल में रखकर असित सेन ने “ख़ामोशी” बनायी.
मेन्टल हॉस्पिटल में रोगियों को ठीक करने के लिए इलेक्ट्रिक शॉक की जगह पेशेंट और डॉक्टर-नर्स के बीच भावनात्मक सम्बन्ध के प्रयोग पर आधारित फिल्म खुद प्रयोगकर्ता (नर्स ) पर क्या असर छोड़ती है, ये इस खूबसूरत फिल्म की विषयवस्तु है. कलर फिल्म के जमाने में इस फिल्म को ब्लैक एंड वाइट में बनाया गया और ये फैसला बेहद सही साबित हुआ. फिल्म अपने ब्लैक एंड वाइट शेड में haunting इफ़ेक्ट पैदा करती है, जो कलर फिल्म में शायद पैदा नहीं हो सकती थी. इसके लिए सिनेमेटोग्राफर कमल बोस को फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला. कमल बोस एक असाधारण सिनेमेटोग्राफर थे. उन्होंने बिमल रॉय के साथ काफी काम किया. परिणीता, दो बीघा जमीन, देवदास, सुजाता, बंदिनी फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी उन्होंने ही की. आगे चलकर उन्होंनेअनोखी रात, दस्तक, धर्मात्मा, क़ुर्बानी, जाबांज़, दयावान जैसी फिल्मों में भी सिनेमेटोग्राफी की. हालाँकि पूरी फिल्म को अपने कंधे पर कैरी करने वाली वहीदा रहमान फिल्म फेयर अवार्ड हासिल करने से चूक गयी और उस साल का फिल्मफेयर अवार्ड मुमताज़ को फिल्म “खिलौना” के लिए मिल गया. इस साल “सफर” फिल्म में अभिनय के लिए शर्मीला टैगोर भी फिल्म फेयर अवार्ड के रेस में थी.

फिल्म के निर्माता और संगीतकार हेमंत कुमार थे और फिल्म के गीत और डायलाग गुलज़ार ने लिखे थे. फिल्म आज भी अपने मधुर गीत संगीत के लिए याद की जाती है. कुल मिलाकर फिल्म में पांच गीत हैं और पाँचों गाने काफी मकबूल हुए. फिल्म में वहीदा रहमान के अलावा राजेश खन्ना लीड रोल में हैं. राजेश खन्ना को ये फिल्म वहीदा रहमान की अनुशंसा पर मिली. वहीदा रहमान “आखिरी ख़त” में राजेश खन्ना के काम से प्रभावित थीं. फिल्म में धर्मेंद्र भी हैं, हालाँकि फिल्म में कैमरा उनकी पीठ की ओर से केंद्रित होता है और फिल्म में उनका चेहरा नहीं दिखता। पर कुछ ही शॉट्स में होने के बावजूद फिल्म में उनका वजूद छाया हुआ है.

“ख़ामोशी” प्रसिद्द बंगाली उपन्यासकार आशुतोष मुखर्जी की कहानी’ नर्स मित्रा” पर आधारित है. आशुतोष मुख़र्जी के उपन्यासों पर आधारित हिंदी में कुछ अन्य फ़िल्में भी बनीं जैसे, सफर, बेमिसाल आदि.

फिल्म की कहानी:

फिल्म कलकत्ते में शुरू होती है. कलकत्ते में डॉक्टर ( नासिर हुसैन) एक मेन्टल हॉस्पिटल के इंचार्ज हैं. मानसिक रोगियों के इलाज को लेकर वे कुछ प्रयोग में जुटे हैं. उनका मानना है कि इलेक्ट्रिक शॉक के जरिये मानसिक रोग का इलाज पेशेंट के साथ अन्याय है, इसके बजाय पेशेंट और डॉक्टर-नर्स के बीच आत्मिक सम्बन्ध स्थापित होकर. पेशेंट को नर्स का भरपूर प्रेम मिले. इसी हॉस्पिटल में नर्स राधा भी काम करती है. हॉस्पिटल में एक्यूट मैनिया का शिकार अरुण चौधरी का केस आता है. पेशे के कवि और लेखक अरुण अपनी प्रेमिका सुलेखा ( स्नेहलता) से ब्रेक अप का दंश झेल पाने में असमर्थ होकर मानसिक संतुलन खो बैठता है और अपने व्यवहार में बेहद हिंसक हो उठता है. डॉक्टर अपनी थ्योरी की टेस्टिंग के लिए केस को लेने में इंटरेस्टेड है और नर्स राधा को अरुण की देखभाल की जिम्मेवारी सौंपना चाहता है.
पर नर्स राधा की भी अपनी हिस्ट्री है. इससे पहले वो देव ( धर्मेंद्र) की देखभाल करते करते उसके साथ भावनात्मक रूप से इन्वॉल्व हो चली थी, पर पूरी तरह से स्वस्थ होने के बाद देव सब कुछ भूल बैठा और राधा डिप्रेशन का शिकार हो चली है. डॉक्टर महत्वकांक्षी है. वो मेडिकल फ्रटर्निटी को साबित करना चाहता है कि देव का इलाज कोई तुक्का नहीं था. इसके लिए उसे अरुण का इलाज अपने तरीके से करना है और इसके लिए उसे राधा के प्रोफेशनल हेल्प की जरूरत है. राधा हिचक रही है. ” मैं थक गयी हूँ.”
डॉक्टर: “तुम सचमुच थक गयी या तुम्हारा मन नहीं करता?”
राधा कुछ नहीं बोलती. बस उसकी आँखों से आंसू की एक बूँद टपक गयी.
डॉक्टर के कमरे से बाहर निकल आयी है राधा. देव की यादें बेतरतीब उसे जकड़ रही हैं. हेमंत कुमार की बैरीटोन वॉइस में गीत रह रहकर पूरी फिल्म में चलता रहता है, “तुम पुकार लो.”
राधा के इंकार के बाद डॉक्टर का व्यवहार राधा के प्रति रुखा हो जाता है. अरुण चौधरी ( राजेश खन्ना) का केस वो दूसरी नर्स को दे देता है. पर नर्स से अरुण चौधरी का केस नहीं संभलता है. कुछ दिनों के बाद राधा डॉक्टर से कहती है, ” अरुण बाबू का केस हिस्ट्री मुझे देंगे?” भावुक होकर डॉक्टर राधा से कहता है, ” राधा, भगवान् तुम्हे बहुत सारा सुख दे.”
राधा अरुण चौधरी का केस हिस्ट्री जानने के लिए उसके नौकर से, सुलेखा से सबसे मिलती है. और फिर पुरे प्राणपण से अरुण चौधरी के इलाज में लग जाती है. पर अरुण के ट्रीटमेंट के दौरान भी राधा देव को नहीं भूल पा रही है. एक शूल की तरह देव की यादें राधा के ह्रदय में धंसी हुई हैं.

हुगली नदी में बजरे पर अरुण गा रहा है, “वो शाम कुछ अजीब थी” ( किशोर कुमार के सबसे बेहतरीन गानों में से एक). देव की यादों में खोयी हुई है राधा. हंगली नदी के पानी का एक थपेड़ा उसके चेहरे को भिंगो जाता है, उसे याद आता है जब देव ने उसके चेहरे पर गिलास का पानी फेंक दिया था. और उसने देव के सीने से लगकर उसकी कमीज में अपना मुंह पोछा था.
राधा के स्नेह से भीग रहा अरुण उसे अपनी बाहों में भर लेता है, राधा हिचक भी रही है और कहीं खोयी सी अरुण की बाँहों में समा जाती है. हिंदी सिनेमा के सबसे sensuous दृश्यों में एक है ये. गाना ख़त्म होते होते अचानक राधा के मुंह से निकल जाता है, ‘देव’

अरुण की मानसिक स्थिति नर्स राधा के प्यार और ममत्व के आंचल में बेहतर होती जाती है और राधा इसकी कीमत अपने बिगड़ते शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के रूप में चुका रही है. थकी थकी रहती है, उसकी आँखों के नीचे डार्क सर्कल्स उभर आये हैं.

अरुण अब मेन्टल हॉस्पिटल से रिलीज़ होने वाला है. राधा को वो नहीं भुला है. वो राधा से मिलने जाता है, पर राधा खामोश, दरवाजा बंद किये हुए अपने कमरे में बैठी हुई है. अंतिम दृश्यों में राधा अपना मानसिक संतुलन खो बैठी है. बेसुध हंस रही है,रो रही है. डॉक्टर से कहती है, मैंने कभी एक्टिंग नहीं की. मैं एक्टिंग नहीं कर सकती.”
डॉक्टर अफ़सोस जाहिर कर रहा है, ” मैं उसे एक नर्स ही समझता रहा. उसके अंदर एक औरत है, उसे क्यों नहीं देख सका.”
अरुण राधा को आवाज दे रहा है, ” राधा मैं तुम्हारा इन्तजार करूंगा. जिंदगी भर इन्तजार करूँगा.”

फिल्म को याद किया जायेगा वहीदा रहमान के शानदार अभिनय और इसके गीत संगीत के लिए:

एक यादगार फिल्म है. फिल्म समाप्त हो जाती है और नर्स राधा की बिगड़ गयी मानसिक अवस्था दर्शकों के जेहन में रह जाती है. वहीदा रहमान के बेस्ट परफॉरमेंस में एक है “ख़ामोशी” में उनका अभिनय. प्यासा में गुलाबो, कागज़ के फूल में शांति, साहब बीबी और गुलाम में जवा, गाइड में रोज़ी का यादगार किरदार निभाने वाली वहीदा रहमान ने इस फिल्म में एक बार फिर भावपूर्ण अभिनय किया है और पूरी फिल्म उनके कन्धों पर टिकी हुई है. वहीदा रहमान के अलावा हेमंत कुमार और गुलज़ार की टीम ने बेहद सुन्दर गीत रचे. चाहे लता की आवाज में ” हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबु” हो या फिर किशोर की आवाज में ” वो शाम कुछ अजीब थी” या हेमंत कुमार की आवाज में ” तुम पुकार लो” हो, हिंदी फिल्म के गीतों के इतिहास में सबसे सुन्दर, भावपूर्ण गीतों में ये शामिल हैं. इन तीन गीतों के नीचे दो और गीत भले दब गए हों, पर वे भी बेहद खूबसूरत और कर्णप्रिय बन पड़े हैं. एक तो मन्ना डे की आवाज में देवेन वर्मा पर फिल्माया गया गीत ” दोस्त कहाँ कोई तुमसा” और दुसरा आरती मुखर्जी की आवाज में ” अपनी आग में जलना होगा”.

इनके साथ साथ डायरेक्टर असित सेन को इस विषय को सेंसिटिव तरीके से हैंडल करने के लिए और सिनेमेटोग्राफर कमल बोस को बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए क्रेडिट दिया जाना चाहिए.

एक खूबूसरत फिल्म, जो ये भी सन्देश देती है कि वहीदा रहमान के पुरे काम को देखें तो उनको और हाई रेट करना होगा.


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