नवजागरण का सशक्त स्वर महात्मा जोतिबा फुले

Avishraant Avishraant

‘एक दिन आयेगा जब संकीर्ण मान्यताएं, अंधविश्वास, रूढ़ीवादी परंपराओं का समूल नाश हो जाएगा’-जोतिबा फुले का यह कथन कितनी आशा और विश्वास से भरा हुआ है। उन्होंने केवल यह कहा भर नहीं है बल्कि इस कठिन लक्ष्य को पाने के लिये जीवन भर बहुत प्रयत्न भी किये और इसमें सफलता भी प्राप्त की। वह सही अर्थों में भारतीय नवजागरण के मुकम्मल स्वर हैं। बंग्ला नवजागरण की अभिजन दृष्टि के बरक्स महाराष्ट्र का नवजागरण ‘बहुजन नवजागरण’ है। इसकी सशक्त पृष्ठभूमि महाराष्ट्र के बहुजन सन्तों की वाणी ने तैयार की। इसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति मराठा राज्य के उदय के रूप में हुई जो बहुत स्थाई न रह सका और उसकी क्रांतिधर्मी चेतना पेशवाई की भेंट चढकर खत्म हो गई। आधुनिक काल में जोतिबा फुले ‘बहुजन नवजागरण’ के प्रवर्तक के रूप में सामने आते हैं जिन्होंने मेहनतकश आम-अवाम के जीवन से जुड़े बेहद बुनियादी मुद्दों-शिक्षा और स्वास्थ्य को विमर्श का विषय बनाया और उसके द्वार सभी के लिए खोल दिये।

जोतिबा फुले का जन्म 11अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में खानवड़ी में हुआ। इनके पिता का नाम गोविन्दराव और माता का नाम चिमणाबाई था। दुर्भाग्य से माता का निधन इनके जन्म के एक वर्ष के अंतराल पर हो गया इसलिए इनका लालन-पालन इनकी दाई सगुणाबाई ने किया। वह कुछ समय तक ईसाई मिशनरियों में नौकरी कर चुकी थीं और थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी जानती थीं।इनके व्यक्तित्व का प्रभाव जोति के मानस पर इस कदर पड़ा कि आगे चलकर उन्होंने एक जगह लिखा है-‘दूसरों के बच्चों से कैसा स्नेह करें ये मैंने आपसे सीखा है।’
सात वर्ष की अवस्था में उनका दाखिला गांव की पाठशाला में करा दिया गया लेकिन सवर्ण समाज के दबाव के चलते उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा और खेती -किसानों के परम्परागत कार्यों में लगना पड़ा। लगभग 13 वर्ष की उम्र में 1840 में उनका विवाह सतारा के नायगाँव के खंडोजी नेवसे पाटिल की आठ वर्षीय कन्या सावित्री बाई से हो गया। 1847 में एक बार फिर उनका दाखिला स्कॉटिश मिशन के एक स्कूल में कराया गया। वहीं वह थाॅमस पेन के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘राइट्स आॅफ मेन’ के प्रभाव में आये।

उनको छात्र जीवन में ही सामाजिक भेदभाव का शिकार होना पड़ा। उनका अपराध एक ब्राह्मण मित्र के विवाह समारोह में सम्मिलित होना था।जहाँ उनकी कथित नीची जाति के कारण उन्हेंअपमानित करके भगा दिया गया। यह एक प्रकार से उनके जीवन की सबसे युगान्तकारी घटना सिद्ध हुई। अपनी ही भूमि पर अपने जैसे लोगों के बीच ऐसा अपमान उनके लिए असह्य था। उन्होंने भेदभाव पर आधारित विषमता के इस पूरे सामाजिक तंत्र को ध्वस्त करने की ठान ली। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि हमारी इस दुर्दशा का कारण ‘अशिक्षा’ है। उन्होंने लिखा-

‘विद्या बिना मति गयी, मति बिना नीति गयी।
नीति बिना गति गयी, गति बिना वित्त गया
वित्त बिना शूद्र गये, इतने अनर्थ, एक अविद्या ने किये।’

अतः उन्होंने उन सभी वर्गों के लिए स्कूल खोलने का संकल्प लिया जिनके लिए धर्म-शास्त्रों में शिक्षा निषिद्ध थी। पुणे के बुधवार पेठ में सन् 1848 में उन्होंने अछूत बच्चों के लिए पहला स्कूल खोला। इससे पूर्व 1830 से ही वह शनिवार वाड़े में उच्च वर्णीय लड़कियों के लिए गुप्त तौर पर एक स्कूल चला रहे थे। उन्होंने लिखा है-
‘पूर्ण विचारोपरान्त मेरा यह निश्चित मत हुआ कि लड़को के स्कूल के बजाय लड़कियों का स्कूल होना बहुत जरूरी है। महिलाएं दो-तीन साल की आयु में जो संस्कार अपने बच्चों पर डालती हैं उसी में उन बच्चों के भविष्य के बीज होते हैं।अहमदनगर के अमेरिकन मिशन में मिस फैरार ने जो स्कूल चलायाह उसे मैंने अपने मित्रों के साथ देखा। जिस ढंग से उन लड़कियों को शिक्षा दी जाती थी, वह पद्धति मुझे बहुत अच्छी लगी।’

पुणे के तत्कालीन सनातनी ब्राह्मणों को अछूत बच्चों के लिए स्कूल खोलना रास नहीं आया और उन्होंने इसे धर्म में हस्तक्षेप मानते हुए फुले के विरुद्ध विष वमन किया।यहाँ तक कि उनके पिता गोविन्द राव को भी इस कदर भड़काया गया कि उन्होंने जोति को घर से निकाल दिया।जोतिबा और सावित्री बाई ने घर तो छोड़ दिया लेकिन अपने मिशन को नहीं छोड़ा। एक जगह का स्कूल बंद हुआ तो शीघ्र ही जुनागंज पेठ में सदाशिव राव की निजी जमीन पर पुनः स्कूल खोला गया। लहूजी बुवा मांग और राणबा महार कुछ लड़के-लड़कियों को ले आये। विष्णु पंत शत्ते नामक एक ब्राह्मण शिक्षक भी स्कूल को मिल गया। फुले का यह कारवां बनता और बढ़ता ही चला गया।

3 जुलाई1857 को बुधवार पेठ में अण्णा साहब चिपलूणकर के विशाल भवन में उन्होंने केवल लड़कियों के लिए स्कूल खोला। ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय बने। जोतिबा के इस कार्य में सच्ची सहयोगिनी और प्रेरिका सावित्री बाई फूले बनी।सावित्री बाई ने विवाहोपरान्त भी अपनी शिक्षा जारी रखी।उन्होंने मिसेज मिशेल के नार्मल स्कूल से चार साल की ट्रेनिंग प्राप्त की और लड़कियों के खोले इस स्कूल में पढ़ाकर प्रथम भारतीय शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया।

तमाम सामाजिक वर्जनाओं के विरुद्ध जोतिबा फुले ने आंदोलन चलाया। उन्होंने 1863 में बाल हत्या प्रतिबन्धक गृह शुरू किया। उन्होंने पूरे शहर में इश्तहार लगवाये जिसमें लिखा था-‘विधवाओं! यहाँ अनाम रहकर निर्विघ्न जचगी कीजिए ।अपना बच्चा साथ ले जायें या यहीं रखें ,यह आपकी मर्जी पर निर्भर होगा। अन्यथा अनाथाश्रम उन बच्चों की देखभाल करेगा ही।’ जोतिबा की यह उद्घोषणा मानवता से प्रेरित थी क्योंकि वे कुलीन विधवा स्त्रियाँ जो अपने ही कुटुंबियों द्वारा गर्भवती कर दी जाती थीं, उनके सामने आत्महत्या कर लेने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं था। जोतिबा के खोले गये ये नर्सिंग होम उनके जीवन की गरिमा को नष्ट होने से बचाते थे। लेकिन यह कदम भी पाखंडी समाज के लिये बहुत कष्टदायक था क्योंकि इस कदम से उनकी नैतिकता, पवित्रता और धार्मिक जीवन के परखच्चे उड़ रहे थे।

जोतिबा 1876 से 1878 तक पूना नगर पालिका के सदस्य रहे। उन्होंने नगर में नई शराब की दुकानों के खुलने का विरोध किया। उन्होंने नगर पालिका के अध्यक्ष को लिखा-
‘शराब की आदत नागरिकों के नैतिक आचरण में बाधा डालती है। इतना ही नहीं यह अयोग्य के लिए भी अत्यंत घातक है। अधिकांश लोग मेरे इस मत से सहमत होंगे कि जब से शराब के अड्डे शहर में खुले हैं तब से शराबखोरी इतनी बढ़ गई कि इसने कई घरों को पूर्णतः सत्यानाश कर दिया।अब यह दुर्गुण इस शहर की आदत में शुमार हो गया है। मैं नगरपालिका को यह सूचना देता हूं कि वह नए परवाने न दे और शराब के अड्डों से वे समाज का जितना नुकसान करते हैं उस हिसाब से टैक्स वसूल करें।’

उन्होंने सबके ‘पानी पर अधिकार’ के लिए भी प्रयास किये, लेकिन उनका एक सबसे महत्वपूर्ण काम हंटर कमीशन के सामने शिक्षा नीति विषयक अपना लिखित अभिमत प्रस्तुत करना था।19 अक्तूबर 1882 को प्रस्तुत अपने वेतन प्रतिवेदन में उन्होंने कहा था-
‘सरकार यह सपना देख रही है कि उच्च वर्ग के लोग निम्न लोगों के वर्ग में शिक्षा का प्रचार करेंगे। इस सपने की पूर्ति के लिए ही वह गरीब किसानों से जो पैसा इकट्ठा करती है उसे उच्च वर्ग की शिक्षा पर खर्च कर डालती है। विश्वविद्यालय भी अमीरों के लड़कों को पढ़ाते हैं और उनकी भौतिक उन्नति में सहायक बनते हैं।लेकिन विश्वविद्यालयों से निकले हुए इन सुशिक्षितों ने अपने देश बंधुओं की उन्नति के लिए कुछ नहीं किया है।’ उन्होंने स्पष्टता से यह कहा कि- ‘सरकार निम्न वर्ग को शिक्षा देने के बारे में उदासीन है।उन्हें इस बात पर भी भरोसा नहीं था कि शिक्षा और संस्कृति उच्च वर्ग से निम्न वर्गों तक रिसते चली आएगी क्योंकि सभी उच्च पदों पर ब्राह्मणों का अधिकार था। वे पीढ़ियों से यह अधिकार भोग रहे थे और पीढ़ियों तक इसे भोगना भी चाहते थे। औरों को ऊपर आने की राह भला वे क्यों खोलेंगे।’ उनका मानना था कि- ‘वर्तमान शिक्षा पद्धति बेअसर है। वह चाहते थे कि- ‘ग्रामीण क्षेत्र के लिए स्वतंत्र शिक्षा व्यवस्था हो। इतिहास, भूगोल, व्याकरण, हिसाब -किताब के साथ-साथ उसमें खेती करने का प्रारंभिक ज्ञान भी दिया जाए।’
जोतिबा सही अर्थों में कर्मवीर थे। कर्मों में ही उनका विश्वास था लेकिन समय-समय पर अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए उन्होंने कई पुस्तकों की भी रचना की। 1877 में उन्होंने ‘तृतीय रत्न’ नामक नाटक लिखा 1862 में ‘छत्रपति शिवाजी राजा भोसला का पवाड़ा’ और ‘ब्राह्मणों का कौशल’ तथा 1873 में ‘गुलामगिरी’ नामक ग्रंथों की रचना की। 1883 में उन्होंने’सत्सार’ नामक एक छोटी -सी पुस्तक लिखी जिसमें हिंदू धर्म के दोषों की चर्चा करते हुए उन्होंने पंडिता रमाबाई के क्रिश्चियन धर्म स्वीकार करने की और ब्राह्मणों को उन्हें अपने धर्म में न रख सकने के प्रयत्नों की जमकर आलोचना की। जून 1885 में ज्योतिबा ने ‘इशारा’ नामक एक छोटी-सी पुस्तिका लिखी जिसमे उन्होंने राष्ट्र के विकास में जातीय भेदभाव को सबसे बड़ी बाधा माना।उसी वर्ष उन्होंने ‘अछूतों की कैफियत’ नाम से एक और पुस्तक की रचना की। अपने कार्यों को सांगठनिक स्वरूप देते हुए 24 सितंबर 1873 को उन्होंने ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। वे उस समाज के प्रथम अध्यक्ष तथा कोषाध्यक्ष और श्री नारायण राव गोविंदराव कडलक सचिव बने।महाराष्ट्र के सामाजिक सुधार आंदोलन पर सत्यशोधक समाज का बहुत गहरा असर पड़ा।

जोतिबा का एक बड़ा काम- जिसकी चर्चा प्रायः कम होती है-किसानों के पक्ष में किया गया आन्दोलन है। जुन्नर क्षेत्र के किसानों ने सवर्ण जमींदारों के शोषण से तंग आकर सरकार को इनसे बचाने की अर्जी दी।सरकार ने उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं दिया तो इस आंदोलन का नेतृत्व जोतिबा ने अपने हाथ में लिया।उनकी अपील पर किसानों ने हल चलाना बंद कर दिया। खेती परती छोड़ दी। इस हड़ताल में आगे के किसान आंदोलनों के तेजस्वी बीज छिपे हुए थे।आखिरकार जमींदार और सरकार को झुकना पड़ा और एक ‘एग्रीकल्चर एक्ट’ पास करना पड़ा। यह जानने योग्य है कि इस आंदोलन में लोकमान्य तिलक और न्यायमूर्ति रानाडे जैसे राष्ट्र वादी नेता साहूकारों और जमींदारों के पक्ष में थे और ‘इंदुप्रकाश’ जैसा समाचार पत्र जमींदारों का पक्ष लेकर जोतिबा के खिलाफ आग बरसा रहा था।

कुलीनों के तमाम विरोधों के बावजूद आम-अवाम में अपने जोतिबा के लिये गहरा सम्मान था।11मई 1888 को मांडवी के कोलीवाडा सभागृह में उनका नागरिक अभिनंदन किया गया। वहीं शोषित-वंचित जनता ने अपने इस क्रांतिज्योति को ‘महात्मा’ के संबोधन से विभूषित किया। 1890 के प्रारम्भ में उन्हें लकवा मार गया लेकिन उस स्थिति में भी इस अनथक योद्धा ने बायें हाथ से लिखते हुए ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ नामक पुस्तक लिखी जो उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद प्रकाशित हो सकी।

28 नवम्बर 1890 को भारत के इस अत्यंत तेजस्वी महापुरुष का पुणे में अंत हुआ। जोतिबा ने अपने समय में जिन सवालों को उठाया, वे अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने ‘अविद्या’ को देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा माना, ब्राह्मणवाद की आलोचना की और धर्म का एक स्वस्थ स्वरूप सामने रखा। उन्होंने समतामूलक और शोषणमुक्त समाज का ख्वाब देखा। यह अकारण नहीं है कि बाबा साहब आम्बेडकर ने बुद्ध और कबीर के बाद जोतिबा फुले को अपना तीसरा गुरु माना।


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