तीसरी कसम (1966): एक था हीरामन; एक थी हीराबाई !

Balendushekkhar Mangalmurty

कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो अपने दौर में असफल हो जाती हैं. संगीत, पटकथा, कहानी, स्टार कास्ट, निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी हर चीज बेहतरीन, पर फिर भी व्यवसायिक तौर पर असफल, पर समय के साथ ये फ़िल्में कालजयी साबित होती हैं और फिल्म समीक्षक और प्रबुद्ध दर्शक इस गुत्थी को सुलझाने में लगे रहते हैं कि आखिर इतनी बेहतरीन फिल्म असफल क्यों हुई?  शैलेन्द्र निर्मित तीसरी कसम (1966) ऐसी ही फिल्म है. फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी “मारे गए गुलफाम” पर आधारित फिल्म “तीसरी कसम” अपने आप में एक परफेक्ट फिल्म कही जा सकती है. चाहे बात स्टार कास्ट की हो, गीत संगीत की हो, निर्देशन की हो, आर्ट डायरेक्शन की हो, या स्क्रिप्ट या फिर डायलाग की. किसी भी मोर्चे पर फिल्म में कमी नहीं है. और फिल्म बार बार देखी जा सकने लायक है.

फिल्म के निर्माता गीतकार शैलेन्द्र हैं. शैलेन्द्र हिंदी सिनेमा के बेहद सफल गीतकार थे. उन्होंने जिस फिल्मकार, संगीतकार के साथ काम किया, बेहतरीन काम किया. सिर्फ शंकर जयकिशन और राजकपूर ही नहीं, बल्कि देव आनंद, बिमल रॉय, सलिल चौधरी, एस डी बर्मन, पंडित रविशंकर आदि के साथ भी उन्होंने बेहतरीन काम किया. वे पहले गीतकार थे जिन्होंने फिल्म मेकिंग में हाथ डालने का हौसला किया. हालाँकि उनसे पहले केदार शर्मा का जिक्र आता है, पर वे मूलतः फिल्म निर्माता निर्देशक थे जो गीत भी लिखते थे.

एक बेहतरीन टीम थी.

फिल्म का निर्देशन बासु भट्टाचार्य ने किया. बासु भट्टाचार्य नेमधुमंती और सुजाता जैसी फिल्मों में बिमल रॉय के असिस्टेंट के तौर पर अपनी पारी शुरू की और आगे चलकर उन्होंने वैवाहिक सम्बन्ध के बिखराव पर तीन फ़िल्में बनायीं- अनुभव, अविष्कार और गृह प्रवेश. उनकी अंतिम फिल्म रही- आस्था, जो व्यवसायिक तौर पर सफल रही.

फिल्म में कुल मिलाकर दस गाने हैं जिन्हे शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने लिखा और आवाज दी है मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, और मुबारक बेगम, और साथ ही प्रसिद्द कौव्वाल शंकर शम्भू ने.शंकर शम्भू का जन्म यूपी के अलीगढ़ जिले में चंदौसी गांव में हुआ था. उनके पिता चुन्नीलाल उस्ताद लोक गायक थे और एक थिएटर कंपनी चलाते थे. दोनों भाईयों ने ग़ज़ल, कव्वाली और सूफियाना कलाम गाने की ट्रेनिंग ली. इन दोनों भाईयों ने “तीसरी कसम” ( 1966) में भी गाया है, “यही ख्वाहिश है कि तुम मुझको देखा करो” और “किस्सा होता है शुरू”
कई और फिल्मों में दोनों भाईयों ने गाया जैसे लैला मजनू, बरसात की रात आदि. शंकर शम्भू का जन्म यूपी के अलीगढ़ जिले में चंदौसी गांव में हुआ था. उनके पिता चुन्नीलाल उस्ताद लोक गायक थे और एक थिएटर कंपनी चलाते थे. दोनों भाईयों ने ग़ज़ल, कव्वाली और सूफियाना कलाम गाने की ट्रेनिंग ली. 10 मार्च 1984 को बड़े भाई शंकर का देहांत गुजरात में सबर कंथा जिले में कार एक्सीडेंट में हो गया और छोटे भाई का देहांत 5 फरबरी 1989 को दिल्ली में हार्ट अटैक से हो गया. बड़ा नाम कमाया दोनों भाईयों ने बतौर कव्वाल. “पी ले जो शराब ए इश्क़ नबी, मरता हो तो जीना आ जाए” मशहूर कव्वाल जोड़ी शंकर शम्भू की प्रसिद्द कव्वालियों में एक है.

फिल्म की स्टोरी और डायलाग खुद फणीश्वर नाथ रेणु ने लिखा। जबकि फिल्म का स्क्रीनप्ले नवेन्दु घोष के जिम्मे आया. 1917 में ढाका में जन्मे नवेन्दु घोष बंगला भाषा के उत्कृष्ट साहित्यकार थे. उन्होंने कुल 26 उपन्यास और 14 कहानी संग्रह लिखे. विमल रॉय के साथ वे भी कलकत्ते से बम्बई आ गए थे. फिर उन्होंने विमल रॉय की कालजयी फिल्मों यथा देवदास, सुजाता, बंदिनी आदि का स्क्रीनप्ले लिखा. विमल रॉय के देहांत के बाद उन्होंने हृषिकेश मुख़र्जी की कई फिल्मों के लिए स्क्रीनप्ले लिखा. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी की कमान सुब्रत मित्रा के हाथों में थी. सुब्रत मित्रा इंडियन सिनेमा के इतिहास में सबसे महान सिनेमैटोग्राफर्स में गिने जाते हैं. उन्होंने इससे पहले सत्यजीत रे के साथ उनकी अप्पू सीरीज की फिल्मों में काम करके ख्याति पायी थी. रे के साथ उनकी सबसे पहली फिल्म “पाथेर पांचाली” (1955 ) थी.
फिल्म में थिएटर में डांस के कई सीक्वेंस हैं. नृत्य निर्देशन की जिम्मेवारी पंडित लच्छू महाराज ने संभाली. उन्होंने महल, मुगले आज़म, पाकीजा जैसी फिल्मों में भी नृत्य निर्देशन किया.
वहीदा रहमान एक कुशल नृत्यांगना थीं जो इस किरदार की एक आवश्यक शर्त थी. वहीँ हीरामन के किरदार के लिए राजकपूर को चुना गया. राजकपूर ने अपने मित्र की मदद के लिए फिल्म में अभिनय के लिए महज एक रूपये लिए. बासु भट्टाचार्य हीरामन के किरदार के लिए चाहते थे कि राजकपूर अपने मैनेरिज्म को छोड़कर पूरी तरह हिरामन के किरदार में ढल जाएँ.
फिल्म का गीत संगीत उन्होंने हसरत और शंकर जयकिशन के साथ संभाला. फिल्म के 10 गानों में से 7 गाने शैलेन्द्र ने लिखे और 3 गाने हसरत जयपुरी ने लिखे. हसरत ने ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी’ और ‘मारे गए गुलफाम’ सहित तीन गीत लिखे.

फिल्म की कहानी:

फिल्म आज़ादी से पूर्व के भारत के दौर में चलती है, जब मशीनीकरण ने गावों को आज की तरह नहीं छुआ था और ट्रकों के धुएं से दूर हमारे गांवों में छोटी दूरी तक सामान ले जाने के लिए और लड़कियों की विदागरी के लिए गाड़ीवानों का सहारा लिया जाता था. एक ऐसा ही गाड़ीवान था हिरामन. बेहद सीधा सादा और तीन पांच नहीं जानने वाला। बस अपने बैलों, अपनी टप्पड़गाडी से मतलब रखने वाला. शादी हुई थी 15-20 सालों पहले, पर गौना के वक़्त ही दुल्हन का देहांत हो गया. तब से उसकी भाभी उसके लिए कुंवारी लड़की जुटाने के लिए जतन कर रही है, पर इतने वर्षों के प्रयास के बाद अब हीरामन ने तय कर लिया है कि शादी नहीं करेगा. आखिर गाड़ीवान शादी कैसे निभा पायेगा? वो सब कुछ छोड़ सकता है, पर गाड़ीवानी नहीं.
निश्छल मन के हीरामन ने बुरे अनुभवों के बाद दो कसम उठा रखी है, एक,कभी चोरबाज़ारी का माल नहीं लादेगा. और दूसरे, बैलगाड़ी में कभी बांस नहीं लादेगा.
चोरबाज़ारी का माल लेकर चला था, तो पुलिस का धावा पड़ गया. किसी तरह अपने बैलों को लेकर भागा, टप्पड़गाडी वहीँ रह गयी. बाद में कंपनी के बाघों को किराये की बैलगाड़ी में लादकर किसी तरह नयी टप्पड़गाडी का इंतजाम किया. उस काम के पुरे 150 रूपये मिले थे.

आज उसे एक सवारी मिली है. गढ़बनैली के मेले में ले जाने के लिए. 20 कोस दूर है, 30 रूपये पर तय हुआ है. हीरामन चल पड़ा है सवारी लेकर. पर सवारी को लेकर उसके मन में हलचल है, डर रहा है तरह तरह के ख्यालों से.
रास्ते में शिवजी का मंदिर नज़र आता है. वो प्रार्थना करने के लिए रुक जाता है, ” रक्षा करो भोलेनाथ. रक्षा करो. कोसों तक फैला हुआ सुनसान मैदान और रात का सफर. जाने कौन सवारी है. गाडी में रह रहके खुशबु आती है, पीठ में गुदगुदी भी होती है, सिर्फ पांव देखा है, सो भी जाने सीधा था या उल्टा था, कहीं जिन परेत न हो. सवा रूपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा. बचा लो मेरे भोलेनाथ !”

सुबह होते होते उसने पर्दा हटाकर एक झलक पा ही ली सवारी की. देखते ही एकदम से चिहुंक उठा, ” उई मां ई तो परी है.”
सवारी भी एकदम से उठ बैठती है. सवारी का नाम हीराबाई है. गढ़बनैली के मेले में नौटंकी में खेला दिखाने जा रही है.

जब हीरामन ने बैलों को तेज हांकने के लिए डंडा मारना चाहा, तो सवारी ने रोक दिया: मारो मत.
एकदम से हिरामन का हाथ रुक गया.
“बैल को मारते हैं, तो आपको बुरा लगता है?”
“धीरे- धीरे चलने दो न. जल्दी क्या है?”

बातचीत में पता चलता है. सवारी का नाम हीराबाई है
हीराबाई थोड़ा खिसक कर बैलगाड़ी के अगले हिस्से में आ गयी है.
तब तो तुम्हे मीता कहूँगी. जब एक ही नाम होता है तो मीता कहते हैं.
इस्स हिरामन के चेहरे पर लाली पसर जाती है.

औरत और मरद के नाम में बहुत फरक होता है.
कहाँ है फरक? मैं भी हीरा, तुम भी हीरा.
इस्स

बैलगाड़ी चल रही है अपनी मंथर गति से.
आपका घर कौन जिल्ला में पड़ता है?
कानपुर.
सुनते ही बेसाख्ता हंस पड़ता है हीरामन.
कानपुर? वाह रे. तब तो नाकपुर भी होगा.
हाँ. नागपुर भी है. हाहाहा. खूब हँसता है हीरामन.
जा रे जमाना. क्या क्या नाम बनाये हैं. कानपुर, नाकपुर…

लम्बा सफर है. हीरामन ने बीड़ी सुलगाने के लिए निकाल लिया है. हीराबाई को सोचकर एक पल के लिए ठिठक जाता है.
बीड़ी पियें? गंध तो नहीं लगेगी?

गाड़ी में हीराबाई अपने डायलाग याद कर रही है. “कहीं भी कोई अपना नहीं जमाने में… अलविदा गुलफाम।”
हीरामन कहीं दूर खो गया है और एक गीत के बोल फूट पड़ते हैं उसके होठों से: “सजनवा बैरी हो गए हमार”
गीत के बोल सुनकर हीराबाई की आँखें भर आयी हैं. उसके कोमल कपोल पर आंसू की बूँदें लुढ़क आयी हैं.

गाडी बढ़कर आबादी में आ गयी है. हिरामन ने पर्दा गिरा दिया है.
तुमने पर्दा क्यों गिरा दिया है?
आप यहाँ के लोगों को नहीं जानते, औरत देखी नहीं कि लगे घूरने.

बातचीत का सिलसिला लंबा निकल पड़ा है. रास्ता लंबा है. कैसे कटे? हीराबाई को हिरामन के बाल सुलभ मन से मोह सा होने लगा है.
हीरामन बातों का धनी है.
गीत संगीत पर कहता है, पहले छोकरा नाच हुआ करता था, अब तो भोपू पर जाने क्या क्या गाना होने लगा है.
कुछ सोचते सोचते वो कह उठता है, ” आप मुंह तो बिलकुल छोकरा नाच के मनवा नटुआ जैसा दीखता है.”
क्या मैं छोकरा जैसा दिखती हूँ?
जी नहीं. वे लड़के ही लड़की नुमा हुआ करते थे.

चलते चलते काफी देर हो गयी है. हालाँकि बातचीत में समय का पता ही नहीं चला है. पर पेड़ों की झुरमुट देखकर नदी किनारे टप्पड़गाडी रोकता है हीरामन.
बैलों को सहलाता है और झिड़की भी देता है: अरे सबर करो. सबको भूख प्यास लगी है.

नदी के बारे में बताता है हीरामन: यही कजरी नदी है.
मैं यहाँ नहा लेती हूँ.
यहाँ नहीं. ये महुआ घटवारिन का घाट है. यहाँ पर कुंवारी लड़कियां नहीं नहातीं. पुरानी कथा है. महुआ घटवारिन इसी गांव की लड़की थी. एकदम बेदाग़ सुन्दर. एक लड़के से परेम करती थी पर एक दिन एक सौदागर उसे जबरदस्ती नाव में ले गया. उस समय से कोई कुंवारी लड़की इस घाट पर नहीं नहातीं.

हीराबाई दूसरे घाट पर नहाने चली गयी है.

बैलों से फुसफुसाते हुए हीरामन राज की बात शेयर करता है, “देखा? कुंवारी भी है.” उत्सुकता वश बैलगाड़ी के पिछले हिस्से में जाकर हीराबाई के सामान को देखता है. घाट पर नहाती नज़र आती है हीराबाई. पर्दा खींच देता है. मन में सम्मान का भाव है. चोरी छुपे औरतों को नहाते देखना हीरामन के स्वभाव में नहीं.

हीरामन जलपान के लिए भोजन लेकर आया है. टप्पड़गाडी में हीराबाई सो रही है. पिंडली से दो इंच ऊपर उसके खूबसूरत पैर साड़ी से निकले हुए हैं. एक चींटी रेंगती नज़र आ रही है. हीरामन हाथ से उसे हटा देना चाहता है, पर रुक जाता है, फूंक मारता है. चींटी नहीं हटती. फिर जोर से फूंक मारता है. हड़बड़ा कर हीराबाई उठ बैठती है. “चींटी” बस इतना ही कह पाता है हीरामन. “आईये दो मुट्ठी जलपान कर लीजिये”

खाते हुए हीराबाई: सचमुच इस गांव का दही बहुत अच्छा है.”

फिर आगे का सफर शुरू होता है. रास्ते में गाड़ीवान उससे पूछते हैं, कहाँ जा रहे हो?
उलटा पुल्टा जवाब देता है हीरामन. बेदाग़ी है. छत्तापुर पतीरा ले जा रहे हैं.
बेदाग़ी माने ससुराल जाने वाली लड़की.

फ़िज़ां में रह रहकर गाड़ीवानों के गीत गूंज रहे हैं.
जब इस बारे में हीराबाई पूछती है तो हीरामन का सीधा सादा जवाब है, ” फटे कलेजा गाओ गीत, दुःख सहने का यही रीत.”
उसे जब गाना सुनाने को कहती है, तो हीरामन न नहीं कर पाता, ” इस्स गांव का गीत सुनने का बहुत शौक़ है. तब तो लीक छोड़कर चलना होगा. चलते राह पर कोई कैसे गीत गा सकता है?”

महुआ घटवारिन का गीत गाने लगता है हीरामन: दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समायी, काहे को दुनिया बनायी…”
रात दिन कलपता था महुआ घटवारिन का मन, “मन समझती हैं न आप?”
तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर… गीत के रौ में बह रहे हैं हीरामन और हीराबाई.
नदी पार करते समय बैलगाड़ी हिल डोल रही है. हीराबाई हिलते डोलते आगे खिसक आती है. हीरामन के कंधे पर हाथ रख दिया है उसने सहारे के लिए. हीरामन अंदर तक स्निग्ध हो जाता है.
हीराबाई भी एक अलाप लेती है. महुआ घटवारिन के गीत में. बेहद मधुर स्वर.
“अब ये गीत हमसे नहीं गाया जाएगा. इससे बढ़िया कोई क्या गा सकता है? आपने तो इस गीत में जान डाल दिया.”

रात का दूसरा पहर हो चला है. दूर आकाश में आतिशबाज़ी की चमक आँखों में पड़ने लगी है.
मेले की आतिशबाज़ी है.
इतनी जल्दी मेला आ गया? मीता से बातचीत में हीराबाई को सफर का पता ही नहीं चला.
जल्दी कहाँ? पूरे 30 घंटे लगे.
30 घंटे गुजर गए?
जी?
कुछ नहीं.

मेले में टप्पड़गाडी लगाकर हीरामन हीराबाई के लिए चाय लाना चाहता है.
मैं आपके लिए चाह ले आता हूँ.
क्या?
चाह
अच्छा, अच्छा चाय.
जी.

इतनी रात को चाय कौन पियेगा?
मुझे मालूम है कंपनी के लोग हरदम चाह पीते रहते हैं. चाह है कि जान? लाईये लोटा.

4 आने की चाह लाने गया है हीरामन. जब हीराबाई उसे भी चाय पीने के लिए देती है तो हीरामन हिचक रहा है, जी हम चाह नहीं पीते.
क्यूँ?
कुंवारे आदमी को चाह नहीं पीनी चाहिए.
किसने कहा तुमसे?
जी मैं जानता हूँ. एक बार पी थी. बड़ी गरम तासीर है.
गरम तासीर मेरे लिए नहीं?
चाय हीरामन की ओर बढ़ा देती है हीराबाई.

उस रात टप्पड़गाडी में ही सो गयी है हीराबाई. मेले में हीरामन के साथी गाड़ीवान भी मिलते हैं. पलटदास गाडी के पास बैठ गया है और जैसे ही हीराबाई का पैर टप्पड़गाडी से बाहर थोड़ा सा दिखाई पड़ता है, भक्तिभाव से पलटदास सर नवा लेता है. दोस्तों के साथ एक कोने में चल रही महफ़िल में हीरामन भी शामिल हो गया है, “चलत मुसाफिर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया”
वाह हीरामन. उस दिन कंपनी का बाघ. आज कंपनी की औरत. तुम तो एकदम कम्पनी बाज हो गए हो.
हीराबाई ने कहा है, हीरामन दो चार दिन मेले में रुक कर नौटंकी देखे. उसके लिए और उसके साथियों के लिए अठन्नी के पास का इंतजाम कर दिया है.

हीरामन ने सब दोस्तों को गंगा कसम दिलाई है. नौटंकी देखने की बात गांव में उड़ती चिड़ियाँ को भी खबर नहीं होनी चाहिए.
रात में नौटंकी शुरू होती है. सब लोग जुट रहे हैं. दरोगा, रामनगर के जमींदार ठाकुर विक्रम सिंह. आम जन सब. सिटी बजती है. हीराबाई मंच पर आ गयी है, “पान खाये सैय्यां हमार” हीराबाई बिजली की फूर्ति से नृत्य कर रही है. उसका सौंदर्य, उसकी अदाओं का जादू दर्शकों के सर चढ़कर बोल रहा है. पर दर्शक दीर्घा में हीरामन लोगों से उलझ जाता है जब वो हीराबाई के लिए वासनायुक्त शब्द सुनता है. नौटंकी का मैनेजर उसे और उसके साथियों को आगे की पंक्ति में कुर्सी पर बिठा देता है.
“एक टकिया है न?” अठनियाँ से एक टकिया क्लास में आने पर हीरामन अपने साथियों से कहता है.
नौटंकी ख़त्म होने के बाद हीरामन को हीराबाई अपने पास बुलाती है और दंगा फसाद करने के लिए उसे डांटती है. डांट से आहत हीरामन मकई लादकर मेले से चला गया है. हीरामन के यूँ एकदम से चले जाने के चलते हीराबाई उदास है. उसका मन रिहर्सल में नहीं लग रहा है.
फिल्म में खूबसूरत दृश्यों की भरमार है. बेमन से डांस रिहर्सल करती और चेहरे के पसीने को पोछती हीराबाई, लालमोहन की नौकरी छोड़कर कंपनी में नौकरी पाना और खुद को आजाद समझना बिरजू का, अपने मेहनत के एवज में पैसे पाता बिरजू अपने सेक्सुअल फंतासी को भी जी रहा है चोरी चोरी हीराबाई के कपडे को सूंघते हुए. हाथ में फूलों के गज़रा लिए ठाकुर विक्रम सिंह, आँखों में लाल डोरे, फूलों को सूंघते सूंघते उसे चबाने लगना, और लगातार हीराबाई को यूँ ताकना, जैसे कोई शेर अपने मांसल हिरन को तौलता है. और विक्रम सिंह के इरादों को भांपकर हीरामन का बेचैन हो जाना आदि आदि.

नौटंकी में काम करने वालियों के भावनात्मक लगाव के खोखलेपन पर पर हीराबाई बहुत मार्मिक टिप्पणी करती है, “हम हमेशा लैला का पाठ अदा कर सकते हैं, लैला नहीं बन सकते.”

ज़मींदार विक्रम सिंह के लिए हीराबाई भोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं. जिसे वह कीमत देकर कुछ दिनों के लिए खरीदना चाहता है, पर हीराबाई को ये मंजूर नहीं.

हीरामन लौट आया है. वो हीराबाई को समझाना चाहता है.
आप ये काम छोड़ दीजिये. लोग आपको बुरा समझते हैं.
नौटंकी में काम नहीं करुँगी तो खाउंगी क्या?
सर्कस में बाघ नचाइये. बाघ के पास आने की हिम्मत कोई नहीं करेगा.
हीराबाई उसे समझाती है, ” जैसे तुम्हे बैलगाड़ी चलाने का नशा है, वैसे ही मुझे लैला और गुलबदन करने का नशा है. देश देश घूमना, सज धजके रौशनी में नाचना गाना. जीने के लिए इस नशे के सिवा है ही क्या मेरे पास?”
दो अलग दुनिया, दो अलग वैल्यू सिस्टम के लोग हैं हीरामन और हीराबाई. महज परस्पर प्रेम और आकर्षण इस दो अलग दुनिया की दूरियों को पाट नहीं सकते. इन दोनों दुनिया के बीच सिर्फ दूरी नहीं है, बल्कि बीच में ठाकुर विक्रम सिंह जैसे ताकतवर लोग हैं, जिनके लिए इस प्रेम का कोई मूल्य नहीं है, जिसके लिए हीराबाई जैसी नौटंकी की नर्तकी सिर्फ कुछ दिनों के लिए खेलने की चीज है.

जमींदार को झिड़क दिया है हीराबाई ने.
“आप ही तरह हीरामन भी मुझे गलत समझता है. आपकी निगाह में मैं सिर्फ एक बाज़ारू औरत हूँ और उसकी निगाह में देवी ! लेकिन जमींदार साहब, उसकी ग़लतफ़हमी में जो एक नशा है वो न आपके ऐशबाग में है और न विलायती शराब में.”

पर जमींदार की ताकत की गर्मी में हीराबाई के प्रेम कमल मुरझा जाते हैं. वो पंख कटे पंछी की तरह तड़पती धरती पर आ गिरती है. जमींदार की बात न मानने पर जो हश्र होना है, उसे सोचकर थिएटर का मालिक भी घबरा गया है. जल में रहकर मगर से बैर नहीं कर सकते. हीरामन की जान भी खतरे में पड़ सकती है.
उसे समझाता है उसका एजेंट: कहीं ऐसा न हो कि हीरा देवी को कोई चाहने वाला न हो और हीराबाई को कोई देखने वाला न हो.”
हक़ीक़त के कठोर धरातल से आकर हीराबाई के कोमल सपने टकराते हैं.
“लैला का पाठ करने वाली लैला बनने चली थी. है न अनहोनी बात?”

हीराबाई ने अब अपने देश की कंपनी में काम करने का फैसला किया है. स्टेशन पर बैठी है. ट्रेन के इन्तजार में. हीरामन स्टेशन की ओर लपकता है.
दोनों की नज़रें टकराती हैं.
“तुमने कहा था न महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद लिया. मैं बिक चुकी हूँ मीता.
गुलाब गंज के मेले में नौटंकी देखने आओगे न?”

हीराबाई ने हीरामन को अंतिम विदागरी के तौर पर अपना शॉल दिया है. और उसके पैसे भी लौटा दिए हैं जो हीरामन ने उसके पास जमा किये थे.

ट्रेन चल पड़ी है. हीरामन भी स्टेशन से बाहर निकल कर अपनी बैलगाड़ी में बैठ गया है. बैलों को हांकने के लिए जैसे ही अपनी छड़ी उठाता है, उसके कानों में हीराबाई की आवाज गूंजती है, मारो मत. मुड़कर देखता है, ट्रेन उससे लगातार दूर होती जा रही है.
बैलों को डांटते हुए कहता है, ” उलट उलट के क्या देखते हो? खाओ कसम कभी गाडी में कम्पनी की बाई को नहीं बिठाओगे.”

हीरामन की तीसरी कसम. जाहिर है तीसरी कसम में बहुत कुछ कमी रह गयी है. हीरामन हीराबाई के दिल के भेद को नहीं समझ सका. उसके व्यवहार को नहीं समझ सका. उसकीमज़बूरियों को नहीं समझ सका. और न अपने मूढ़ मगज़ को.

फिल्म इस मोड़ पर समाप्त हो जाती है दर्शकों को यादों के गलियारे में छोड़कर.

अगर हिंदी सिनेमा का गोदान ” मदर इंडिया” है; तो फिर “मैला आँचल” है ” तीसरी कसम”

शैलेन्द्र ने काफी मेहनत, लगन और समय लेकर इस फिल्म को बनाया. इस फिल्म को बनाने के लिए जुटाई गयी टीम इंडियन सिनेमा की किसी एक फिल्म के लिए जुटाई गयी सबसे प्रतिभाशाली टीम में से एक रही. हीरामन और हीराबाई के किरदार को राजकपूर और वहीदा रहमान से बेहतर कोई और कलाकार निभा सकता था, सोचना मुश्किल है. रेणु के डायलाग इस फिल्म को समाज की हक़ीक़त से दूर नहीं जाने देते. फिल्म में मानवता है, प्रेम है, समाज के कठोर सामाजिक समीकरण के आगे प्रेम के मुरझाने की दास्तान है, औरत के मन की दास्ताँ है, पुरुष के उस प्रेम को पूरी गहराई से न समझ पाने की कसक है. इस लिहाज से हीराबाई का चरित्र हीरामन के चरित्र से ज्यादा सुगढ़, जटिल, ज्यादा विकसित है. फिल्म में नौटंकी को उसकी पूरी सादगी के साथ, बिना किसी ड्रामेटिक इफ़ेक्ट के साथ पेश किया गया है. शंकर जयकिशन का संगीत शानदार है. इसके हर गीत सिचुएशन के अनुसार हैं. लोक गीतों का भी खूबसूरती से इस्तेमाल किया गया है. हर गायक ने बेहतरीन परफॉरमेंस किया है. पर मुकेश ने महुआ घटवारिन के गीत में जो पैथोस, जो उदासी पैदा की है, वो अद्भुत है. आशा भोंसले ने नौटंकी के गीतों में जो चंचलता दिखाई है, उसने हीराबाई के किरदार को जीवित करने में वहीदा रहमान की बहुत मदद की है. लता की आवाज में गीत “आ भी जा रात ढलने लगी” में जो उदासी की बानगी मिलती है, वो गीत को यादगार बनाती है और कव्वाल बंधु शंकर शम्भू की बेहतरीन कव्वाली को लोग लम्बे अरसे तक नहीं भूल सके हैं.

फिल्म के अधिकांश हिस्से की शूटिंग अररिया जिले के औराही हिंगना गांव और भोपाल के निकट बीना शहर में हुई. कुछ सीन मुंबई में मोहन स्टूडियो में और पोवई झील के पास हुई. फिल्म को बनने में कई साल लगे.
फिल्म अपनी कलात्मकता के लिए सराही गयी पर व्यावसायिक तौर पर असफल हो गयी. फिल्म की असफलता, अल्कोहल अब्यूज ने शैलेन्द्र को तोड़ दिया. और हमसे हिंदी सिनेमा का सबसे दिग्गज गीतकार छीन लिया. इस बात का दंश हमेशा रहेगा.

NCERT के दसवीं क्लास की हिंदी किताब “स्पर्श” में शैलेन्द्र और फिल्म तीसरी कसम पर एक चैप्टर है, जिसका नाम है, ” तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेन्द्र.” फिल्म फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी “मारे गए गुलफाम” पर आधारित है, जो उनके कहानी संग्रह ” पांच लम्बी कहानियां” से ली गयी है.

फिल्म में वहीदा रहमान का जिक्र विशेष तौर पर होना चाहिए. हीराबाई के चरित्र की जटिलता, नृत्य, नौटंकी के किरदार, एक स्त्री के मन को जिस खूबसूरती से उन्होंने जिया है परदे पर, उन्होंने इस किरदार को अमर कर दिया है इंडियन सिनेमा में.

प्यासा की गुलाबो, साहब, बीबी और गुलाब की जवा, मुझे जीने दो की चमेली जान, गाइड की रोजी, तीसरी कसम की हीराबाई, ख़ामोशी की नर्स राधा. इंडियन सिनेमा के सबसे यादगार किरदारों में से हैं. इंडियन सिनेमा के प्रति कंट्रीब्यूशन का जिक्र हो तो वहीदा जी का नाम वर्तमान दर्जे से और ऊँचे दर्जे में रखा जाना चाहिए. इन्हे दादा साहब फाल्के अवार्ड से नवाजा जाना चाहिए.


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