जिस देश में गंगा बहती है(1960): डाकुओं के आत्मसमर्पण के मुद्दे पर केंद्रित बेहतरीन फिल्म

Balendushekhar Mangalmurty

फिल्म “जिस देश में गंगा बहती है” (1960) चम्बल के डकैतों के आत्मसमर्पण और उनके मुख्यधारा में शामिल होने के विषय पर बनायी गयी है. हालाँकि फिल्म में चम्बल के बीहड़ के दर्शन नहीं होते. महज डायलाग में जिक्र है और फिल्म का अधिकांश हिस्सा सेट पर फिल्माया गया है.

डकैतों के विषय पर बनी फिल्मों में एक क्रोनोलॉजी सी बनती नज़र आती है. 1960 में ‘जिस देश में गंगा बहती है’, तो 1961 में ‘गंगा जमुना’ और फिर 1963 में ‘मुझे जीने दो’. ये फ़िल्में जहाँ एक तरफ कलाकारों के प्रोफेशनल rivalry की और इशारा करती हैं, वहीं इस विषय पर पब्लिक डिस्कोर्स की ओर भी इशारा करती है. फ़िल्में ग्रेजुअली डेवलप करती हैं.

पहली फिल्म ( जिस देश में गंगा बहती है, 1960) में फिल्म का हीरो डकैत नहीं है, बल्कि उन्हें सुधारने का बीड़ा उठाये एक साधारण इंसान है. पहली फिल्म इस बहस में नहीं पड़ती कि किन वजहों से डाकू बने, बस एक ही एजेंडा है, इन्हे मुख्यधारा में लाना है. इस लिहाज से फिल्म बौद्धिक बहस से बचती है, और फिल्म में एक उलझन भी दिखती है कि डाकुओं के साथ पुलिस प्रशासन किस तरह का व्यवहार करे.

दूसरी फिल्म ( गंगा जमुना, 1961) में हीरो सिस्टम का शिकार है. वो सिस्टम का शिकार है. विक्टिम है, उसे glamourise नहीं किया गया है. और वो एक सामान्य ग्रामीण का जीवन जीना चाहता है, जो कि वो है भी. लेकिन परिस्थितियां कुछ इस तरह बन जाती हैं कि वो अपने आप को कानून और सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ खड़ा पाता है. इस लिहाज से फिल्म रीयलिस्टिक है. हीरो के डाकू बनाने में परिस्थितियां जिम्मेवार हैं.. इस फिल्म में हीरो मारा जाता है. पर तीसरी फिल्म तक आते आते परिस्थितियां बदलती हैं. ठाकुर जरनैल सिंह किन परिस्थितियों में डाकू बना, इस विषय में फिल्म नहीं जाती. डाकू के जीवन को romanticize किया गया है. वो सिर्फ लूटपाट नहीं करता, बल्कि वो नर्तकी के नृत्य पर मोहित होकर उसे अपने अड्डे पर उठा लाता है, वो पुलिस से चैलेंज करके भिड़ता है और फिल्म के अंत में अपनी शर्तों पर आत्मसमर्पण करता है.

इन तीन फिल्मों को रीयलिस्टिक या रोमांटिक जॉनर में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है, बल्कि इन तीन फिल्मों में ट्रीटमेंट डकैतों के विषय पर तत्कालीन फिल्मकारों के चिंतन में क्रमिक बदलाव की ओर इंगित करता है और साथ ही ये भी कि डकैतों के साथ प्रशासन के व्यवहार ने इन फिल्मकारों को पैमाना दिया जिस पर वे अपनी राय बना सकें.

रियल लोकेशन से दूर, डकैतों के बनने, उनके सोशल बैकग्राउंड, आत्मसमर्पण, मुख्य धारा में शामिल होने को लेकर एक एस्केपिस्ट एट्टीट्यूड को अपनाये, हीरो का डाकू न होकर डाकू सुधारक और डाकुओं के चरित्र चित्रण को पूरी तरह कैरीकेचर कर देना और उन्हें नेगेटिव शेड्स देना, मानो उनकी अपनी ही दुनिया है और फिल्म समाज की जिस मुख्यधारा का जिक्र कर रही है, उसका पूरी फिल्म में गायब रहना. तमाम कमियों के बावजूद “जिस देश में गंगा बहती है” (1960) एक बेहतरीन फिल्म है. फिल्म में एक ऊर्जा है, एक थिड़कन है, एक धड़कती आत्मा है, जिसे जीवित किया है, शैलेन्द्र के गीतों ने और शंकर जयकिशन के संगीत ने. संगीत पर थिरकते पांव दर्शकों में भी उस ऊर्जा का संचार करते हैं. हर चीज में संगीत तलाशा गया है. दरवाजे पर लटकते परदे की जाली में संगीत, हाथ की हरकतों में, छुअन में, आँखों के इशारों में, हर चीज में संगीत है. राज कपूर अपनी क्रिएटिव एनर्जी के पीक पर हैं. फिल्म में उनके मिडास टच को साफ़ साफ़ महसूस किया जा सकता है.

फिल्म में हद से ज्यादा भोला किरदार जो जाने अनजाने इतनी बड़ी घटना का व्हीकल बन गया, अविश्वसनीय लगता है, पर राजू गवैय्या के किरदार पर यकीं करने का मन करता है.

डकैत सरदार की बेटी कम्मो जिसे पुरे भोलेपन से राजू गवैय्या कम्मोजी कहकर बुलाता है, प्यार के योग्य नहीं लगता. पर कम्मो का राजू गवैय्या के प्यार में पर जाना दर्शक के दिल को भाता है. फिल्म में रस है.

फिल्म की कहानी:

राजू ( राज कपूर) एक गवैया है, जो गाने गाकर अपनी जीविका उपार्जन करता है. शानदार डफली बजाता है, गाता है. एक रात वो डकैतों के सरदार की जान बचाता है, जो पुलिस की गोलियों से घायल हो गया है. डाकू सरदार (Nayampalli) के साथी उसे कन्फ्यूजन में पुलिस का मुखबिर समझ लेते हैं और उसे अपने साथ पकड़ कर ले जाते हैं. वहां उसकी मुलाक़ात डाकू सरदार की बेटी कम्मो ( पद्मिनी) से होती है. कम्मो उसके भोलेपन पर रीझ जाती है, लेकिन ये बात राका ( प्राण) को नागवार गुजरती है. वो दल के बाकी साथियों में उसके खिलाफ संदेह के बीज रोपण करता रहता है और किसी भी तरह उसकी इहलीला समाप्त कर देना चाहता है.
दोनों का प्रेम परवान चढ़ता है.

राजू कम्मो को समझाता है:
जब मन भटकता है तो आदमी सब कुछ भूल जाता है. ये अवस्था बहुत खराब होती है जी. फ़ौरन इलाज करवाईये जी.
इलाज है? मासूमियत से कम्मो पूछती है.

बीमारी के बारे में कम्मो राजू को बता रही है.
राजू बिमारी के श्रोत के बारे में पूछ रहा है:
औरत जात है या मरद जात?
हौले से पूछती है- तुम कौन हो?
अभी तक तो मरद जात हैं. आगे के शिवजी मालिक हैं.

कम्मो हंसने लगती है.
मैं इतनी गंभीर बात कर रहा हूँ और आप बीच में हंसना शुरू कर दिए. आप कैसी लड़की हैं, कम्मोजी?
तुम्हे कैसी लगती हूँ? बड़ी मासूमियत से कम्मो पूछती है.
कम्मो जी, ये जो मेरे आपके बीच बातें हो रही हैं, कहीं इशक़ प्यार की बातें तो नहीं?
इस देश की पब्लिक सब कुछ बर्दाश्त करती है, इशक़ प्यार की बातें बिलकुल बर्दाश्त नहीं करती है. मेरी मानिये तो इस झमेले में बिल्कुल नहीं पड़ियेगा जी.
अरे धूत… कहते हुए हंस कर कम्मो भाग जाती है.

राजू देर से बातों को समझता है.
पीछे से चिल्लाता है: माफ़ कीजियेगा कम्मोजी. अंदर की बात समझने में मेरे को टैम लगता है जी.

उसे कम्मो समझाती है कि डाकू लोग भी इंसान होते हैं. और बन्दूक के बल पर दुनिया बराबर करते हैं. अमीर को थोड़ा गरीब और गरीब को थोड़ा अमीर बनाते हैं. ये सुनकर राजू कम्मो से पूछता है, ” आप लोग चोचलिस्ट हो? वे भी दिन भर दुनिया बरोबर करने की बात करते हैं.”
कम्मो उसे बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग देती है. इस सीन को शोले फिल्म में दोहराया गया है.
राजू के मन में संशय भी है. बन्दूक चलाने पर जब मर ही जाएंगे कौन बरोबर होगा, कम्मोजी? मन का संशय जारी है, बन्दूक से धरम करम भी हो सकता है, ये ज्ञान तो मुझे इधर ही आकर मिला है, कम्मोजी.
जिधर देखता हूँ, फूल ही फूल नज़र आते हैं. कम्मोजी आप बोलती हैं, दंबूक चलाओ. मैं सोचता हूँ कि इन फूलों की एक सुन्दर सी वेणी बनाऊं और आपके जुड़े में लगा दूँ.

राजू भी कम्मो को लेकर भविष्य के सपने बुनने लगा है.
मेरे मन में एक बात आयी है कम्मोजी ! शिव जी की कृपा हुई तो एक दिन फूल सा एक लल्ला होगा मेरा और उसका नाम रखूंगा श्री गंगा प्रसाद.
तो?
कम्मोजी, आप मेरे उस लल्ले की माँ बनेंगी?
कम्मोजी चुप्प.
आप एक ही लल्ले की बात सुनकर फिक्र में मत पड़िये कम्मोजी. अगर शिव जी ने चाहा तो यहाँ लल्लों की लाइन लग जायेगी।
सच्च !
प्रेम प्रस्ताव स्वीकार.

लेकिन कम्मोजी जब एकांत में होती है, तो अपने हाँ पर पुनर्विचार करने लगती है.
ना ना राजू, मैं तुमसे शादी नहीं करुँगी. अंदर की बात समझने में तुम्हे टैम लगता है !

भोले भाले राजू का दुनिया बरोबर करने के आदर्श से मोह भंग तब होता है जब ठाकुर की हवेली पर शादी में डाकुओं के हाथों वो दूल्हे और एक बच्चे का खून होता देख लेता है. उसके कदम पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ जाते हैं. फिर वहां पुलिस को अगली लूट के प्लान के बारे में सावधान करने के बाद डाकुओं को रोकने चला जाता है. राका और उसके साथियों का शक और गहरा जाता है. मौके का फायदा उठाकर राका डाकुओं के सरदार को गोली मार देता है और कम्मो से शादी की योजना बनाता है. और राजू को बंदी बना लेता है. लेकिन राजू और कम्मो डाकुओं की कैद से निकल भागते हैं. कम्मो को पुलिस सुरक्षा में रखकर वो पुनः डाकुओ के बीच लौटता है और उन्हें समझाना शुरू करता है कि इस डाकू जीवन का कोई भविष्य नहीं. एक दिन इसका अंत पुलिस की गोलियों से या फांसी के तख्ते पर होगा.

कठिन प्रयास के बाद डाकू समझ जाते हैं और राजू के साथ वे पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने निकल जाते हैं. कुछ नाटकीय घटनाक्रम के बाद डाकू आत्मसमर्पण कर देते हैं और राजू और कम्मो का भी मिलन होता है.

तमाम अविश्वसनीयता के बावजूद फिल्म खूबसूरत बन पड़ी है:

राधू कर्मकार इस फिल्म के निर्देशक हैं. हालाँकि फिल्म के एक एक फ्रेम पर राजकपूर की स्पष्ट छाप है. फिल्म में कई बेहतरीन दृश्य बन पड़े हैं. राजकपूर का डफ बजाते हुए “मेरा नाम राजू घराना अनाम” गाना, डफ बजाते हुए झूमते हुए कम्मो का अपने पिता के पास पहुंचना, फिल्म में बन्दूक की ट्रेनिंग, आदि तमाम दृश्य. फिल्म में सन्देश कि ” ये पूरब है, पूरब वाले. हर जान की कीमत जानते हैं” 10 साल बाद मनोज कुमार ने अपनी फिल्म ” पूरब और पश्चिम” (1970) में दोहराया है.
फिल्म की अद्भुत एनर्जी है इसके संगीत से.

50 के दशक के अंत में शंकर जयकिशन की जोड़ी अपने क्रिएटिव बेस्ट फेज में थी. फिल्म में कुल मिलाकर 9 गाने हैं. मुकेश की आवाज राजकपूर पर जिस तरह सूट करती है, इतना सहज. मानो कोई प्रयास ही नहीं किया गया हो ! ऐसा उदाहरण हिंदी सिनेमा में दूसरा नहीं मिलता है. फिल्म में पद्मिनी के नृत्य कौशल का जमकर इस्तेमाल किया गया है और इसमें सहयोग दिया है थिड़कन से भरे संगीत ने. कई बार गाने से पहले देर तक संगीत बजता है फिर गाना शुरू होता है. पर दर्शक इस एक्ससेसिव, उत्साह से भरे संगीत का स्वागत करता है, हालाँकि जब फिल्म से हटकर सिर्फ ऑडियो सुना जायेगा, तो श्रोता को ये खटकेगा.

फिल्म को बेस्ट हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. इसके अलावा इस फिल्म को चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले: राजकपूर को बेस्ट एक्टर का, बेस्ट फिल्म का, बेस्ट आर्ट डायरेक्शन ( जी जी मयेकर) और एडिटिंग ( एम आर अचरेकर) का.

इसके अलावा फिल्म संगीत ( शंकर जयकिशन), लिरिक्स ( शैलेन्द्र- होठों पर सच्चाई रहती है…), गायक ( मुकेश- होठो पे सच्चाई रहती है../ ये गौर करने वाली बात है कि इस समय मेल/ फीमेल सिंगर्स के लिए अलग अलग अवार्ड नहीं थे.) और अभिनेत्री ( पद्मिनी) भी नामांकित थे. पर इस साल इन्हे फिल्म फेयर अवार्ड्स नहीं मिल सके.
कुल मिलाकर एक मनोरंजक फिल्म है, जो दर्शकों को आदर्श पड़ोसती है और साथ ही कड़वी सच्चाई से ध्यान हटाते हुए गीत संगीत और डायलाग से मनोरंजन करती है.

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