यात्रा संस्मरण – गोरमघाट

भारती पाठक

यादों के एलबम का पन्ना पलटते ही ऐसी मनभावन स्मृतियां सजीव हो उठती हैं और मन मयूर उनमें जाने को तत्पर । याद आते हैं कुछ पल, कुछ चेहरे जो भूलना चाह कर भी नहीं भूलते । आज यादों की उसी एलबम के कुछ पन्ने ।

एक तो वैसे ही राजस्थान के नाम से वो गौरवगाथाओं से भरा इतिहास और उसमें भी सरोवरों और महलों का शहर उदयपुर तो उसके मुकुट का हीरा है । मारवाड़ का दिल है । उसके नाम से ही भारत तो भारत, विदेश में भी लोगों के दिलों में गुदगुदी होने लगती है ।

ऐसे उदयपुर में अचानक जाने का सुअवसर मिल जाए तो क्या कहिए ? विधि का विधान या चमत्कार !

तो यह हमारे साथ घटा सितंबर 2017 में जब हमें अपने शिक्षण प्रशिक्षण के लिए वहां इक्कीस दिन रहने का मौका मिला । साथ में अनेक राज्यों से आए शिक्षकों से बना ग्रुप । इस बीच प्रशिक्षण के काम से जब भी छुट्टी मिली हम शहर में, उसके आसपास की जगहों में खूब घूमे । कुछ संस्थान की तरफ से प्रायोजित टूर हुए ।

जैसे जैसे उदयपुर प्रवास की समाप्ति का दिन करीब आता जा रहा था, हमारा मन इस यात्रा से कुछ और अद्भुत की अभी भी आस लगाए था । यह कार्यक्रम की समाप्ति से पहले का अंतिम रविवार था ( 24/9/2017) और हम इसे यों ही नहीं गंवा देना चाह्ते थे । जाहिर है कि सब लोग तो समान रुचि और साहस के नहीं हो सकते इसलिए इतने बड़े समूह में सबकी राय तो एक नहीं हो सकती । शनिवार की शाम से ही यही चर्चा रही कि आखिर इस रविवार को कैसे मनाया जाय कि यह एक यादगार दिन बन जाय ।

ऐसे भी अनेक विसंवादी स्वर जो किसी दूरगामी सफर की बजाय चाहते थे कि स्थानीय बाजारों में शापिंग ही कर लें, कुछ ऐसे भी रहे जो अपने स्थानीय मित्रों परिचितों के यहां मेहमान नवाजी का लुत्फ उठाना चाह रहे । और ऐसे भी कुछ आराम परस्त जिनकी तमन्ना शांति से हास्टल के कमरे में आराम करते हुए यह रविवार बिताना रही ।

ये तो भला हो महाराष्ट्र से आई हमारी रूममेट प्रतिभा बड़गुज्जर का जिसने अपने किसी स्थानीय परिचित के माध्यम से पता करके बताया कि उदयपुर से करीब 150 किमी. की दूरी पर स्थित गोरम घाट नाम का एक बहुत ही रमणीक पर्यटन स्थल है जो अपने प्राकृतिक झरनों और ऊंची पहाड़ी पर बने प्राचीन मंदिरों के लिए बहुत प्रसिद्ध है, जहां लोग खास तौर पर बरसात के बाद ही घूमने जाते है ।

बस एक समस्या थी कि वहां जाने के लिए एक ही साधन था ट्रेन, जो सुबह 6 बजे छूटती थी उदयपुर से और उसके लिए सुबह 4:30 पर संस्थान से निकलना पड़ता । इसके लिए हॉस्टल इंचार्ज पनेरी सर से बात की तो उन्होंने सुबह निकलने की अनुमति दे दी । कुछ और जानकारी नेट से पता कर हमने मन बना लिया कि सुबह गोरम घाट के लिए निकलना है ।

रात तक हम उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ टीचर्स ने जाने का पक्का इरादा बना लिया और सुबह 4:30 पर नीचे रिसेप्शन पर मिलना तय हुआ ।
सुबह समय से तैयार होकर जब हम नीचे पहुंचे तो छत्तीसगढ़ से रीमा मैम भी हमारी साथी बन चुकी थीं ।

ऑटो करके हम स्टेशन पहुंचे तब तक 5:54 हो चुके थे । टिकट ले ही रहे थे कि तीन और टिकट लेने के लिए फोन आया । हरियाणा से अमरजीत पन्नू भी अशोक और अनुज सर के साथ जाने के लिए स्टेशन आ गए । इस तरह दो से बढ़ते हुए कारवां में हम कुल 12 लोग हो गए ।

गोरम घाट जाने के लिए जयपुर उदयपुर इंटरसिटी ट्रेन 6 बजे सुबह उदयपुर से चलती है जो 6:45 पर मावली जंक्शन पहुंचती है ।

मावली से गोरमघाट के लिए 7:15 पर मारवाड़ पैसेंजर ट्रेन जाती है जो करीब 12:15 पर गोरमघाट पहुंचाती है । यह मीटर गेज रेल ट्रैक है (जिसे छोटी लाइन भी कहते हैं) । वापसी के लिए फिर यही ट्रेन 3:30 पर गोरमघाट में मिलती है ।

मजेदार बात यह रही कि ट्रेन में हम सबको साथ बैठने की जगह मिल गई जिससे पूरे सफर का साझा आनंद लिया जा सका ।

सुबह की ठंडी ताजा हवा और एक नई जगह घूमने के जोश का मिलजुला भाव मन को उड़ाए हुए था, तिस पर आत्मीय हो गए दोस्तों का साथ जैसे सोने पर सुहागा ।

ट्रेन ठीक 6:45 पर मावली पहुंच गई । वहां से गोरमघाट जाने वाली मारवाड़ पैसेंजर ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 4 से जाती है सो हम सब टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गए । ये कुल चार डिब्बों की ट्रेन थी टॉय ट्रेन जैसी और एक डिब्बा गार्ड का जिसमें टी टी ई भी बैठते और रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों पर चढ़ने वाले यात्रियों को टिकट भी देते, जैसे बस में कंडक्टर । वाह ट्रेन और बस का आनंद एक साथ !

चूंकि ट्रेन यहीं से चलती है और मारवाड़ तक जाती है तो हमें बैठने की जगह आराम से मिल गई ।

ठीक 7:15 पर मावली से ट्रेन गोरमघाट के लिए चल पड़ी और साथ ही शुरू हुआ प्रकृति की सुंदरता को करीब से देखने महसूस करने का अद्भुत सिलसिला । रास्ते में दोनों ओर अरावली की पहाड़ियों की हरियाली और सुंदरता देखते ही बनती थी । बारिश का मौसम अपने अवसान पर था और जाते जाते जैसे धरती को हरी चूनर ओढ़ा गया था । जहां तक नजर जाती थी गझिन हरीतिमा का अनंत विस्तार । शायद इसी सुंदरता के कारण राजसमंद जिले में स्थित इस पर्यटन स्थल को “मारवाड़ का कश्मीर” भी कहा जाता है । खास कर अगस्त और सितंबर महीने में यहां पर्यटकों की खासी भीड़ रहती है ।

हम सब भी प्रकृति की इस सुंदरता से अछूते न रह सके । सब ट्रेन की खिड़कियों से चिपके ऐसे खोए कि भूख प्यास भूल बैठे । ये बात और थी कि 5 घंटे के सफर में रास्ते में पड़ने वाले मात्र दो स्टेशनों पर खाने पीने की कोई विशेष सुविधा न होने से भूख प्यास का विचार मन में लाने का कोई विशेष प्रभाव पड़ना भी नहीं था । इसलिए भावी यात्रियों के लिए खास हिदायत हम भी छोड़ दें कि अगर कभी यहां जाने की सोचें तो भोजन पानी की व्यवस्था साथ जरूर लेकर जाएं ।

हमें किसी ने यह सब नहीं बताया । न ही किसी ने ये जानकारी दी कि वह निर्जन भी है, दुर्गम भी है और खतरनाक हादसों भरा रास्ता भी । ऐसे सुंदरतम स्थानों के बारे में इतनी न्यूनतम जानकारी शायद राजस्थान में ही हो सकती है, जहां पग पग पर साहसिक वीरगाथाओं का इतिहास फैला है, तो डर किस बात का ! साहस और बलिदान के इस प्रदेश में अगर इतना जोखिम उठाने की हिम्मत नहीं तो फिर काहे आए एहि देश !

ये तो भला हो कि शहरी आदतों वश चलते समय स्टेशन से बिस्किट के कुछ पैकेट और पानी की बोतलें ले लीं जिन्होंने इन यात्रा वीरों की लाज बचाने में बड़ी मदद की ।

पहला स्टेशन कुआथर पड़ा जहां उतरने वालों से ज्यादा चढ़ने वाले यात्री थे जो ट्रेन मंन चढ़ने से पहले पिछले डिब्बे में जाकर टी टी से टिकट लेते, फिर ट्रेन में बैठते ।

एक और विशेष बात जो देखने में आ रही थी कि यहां से मारवाड़ की वेशभूषा में दिख रहे लोग बड़े ही परुष से और मोहक लग रहे थे । लंबे भारी स्कर्टनुमा घाघरा पहने औरतें चुन्नी को सिर के साथ ही सामने की तरफ विशेष तरह से ओढ़े हुए । पुरुषों ने पगड़ी और घेरदार छोटे कुर्ते के साथ विशेष तरह से लपेट कर धोती पहनी हुई । एक बार गौर करने की थी कि इस विशेष वेशभूषा को धारण करने वाले एक विशेष आयुवर्ग के ही लोग दिख रहे थे, जैसे सीधे किसी संग्रहालय से उठकर चले आ रहे हों । नयी पीढ़ी के अधिकांश युवा हमारी ही तरह सामान्य वेशभूषा वाले ही थे ।

अगला स्टेशन खामली घाट था । यहां के बाद से गोरमघाट जाने के लिए बस ट्रेन ही एक मात्र सवारी है । अगर आप अपने वाहन से भी उदयपुर से गोरमघाट आना चाहें तो खामली घाट से आपको यही ट्रेन पकड़नी होगी तभी गोरमघाट पहुंच सकते हैं । और कोई चारा नहीं है ।

यहां से रास्ता कुछ ख़तरनाक हो गया था । दोनों ओर गहरी खाइयों के बीच चलती ट्रेन रोमांच के साथ ही भय उत्पन्न कर रही थी । लगने लगा कि वाकई इस यात्रा पर निकलने के लिए कुछ वीरत्व तो जरूरी है ।

जमीन से बहुत ऊंचाई में कुछ खंबों के ऊपर अधर में टंगे से पुल, उनके ऊपर अधर में ही टंगकर चलती अपनी छुकछुक गाड़ी । कमजोर दिल वालों का तो रामनाम सत्य ही जो जाय । ऐसे करीब 3 या 4 पुल पड़े ।

रास्ते में दो प्राकृतिक सुरंगे भी पडी तो ट्रेन में घुप्प अंधेरा छा गया और लोग जोश में जोर से चीखते चिल्लाते बच्चे बन गए ।

करीब 12:15 बजे ट्रेन गोरमघाट स्टेशन पहुंची जो दो पहाड़ियों के जोड़ने के लिए बने एक मात्र पुल को पार करके था । पुल आधुनिक पुलों की तरह दोनों और से सुरक्षित नहीं बल्कि खुला हुआ था और ऊंचाई इतनी की नीचे देख कर दिल दहल जाए । गोरमघाट स्टेशन पर उतरने वाले बस हमारी तरह के कुछ वीरबालक और वीरांगनाएं ही थे ।

स्टेशन के नाम पर एक उजाड़ कमरा जहां कोई रेलवे कर्मचारी तक नहीं । आसपास वहां कोई बस्ती नहीं कि शाम और रात का आनंद लेने के लिए कोई वहीं रुक जाय, या ट्रेन छूट जाय तो वहीं रात बिता ले । एक तरफ पहाड़ जिसपर करीब तीन किलोमीटर चढ़ाई के बाद गोरखनाथ मंदिर था और दूसरी तरफ नीचे उतर कर कुछ एक किलोमीटर चलने के बाद थोड़ा ऊपर की ओर चढ़ाई करके सुंदर झरना था जो काफी ऊंचाई से गिरता अपनी खूबसूरती से सबको मोहित कर लेता । वहीं एक छोटा सा मंदिर भी था । और पगडंडी नुमा ये रास्ते ऐसे फिसलन भरे, संकरे कि एक व्यक्ति ही चल पाय । दोनों ओर ऐसी गहरी खाई कि ध्यान चूका और स्वर्गधाम सीधे बेटिकट ।

यहां लोग जोगमंडी झरनों और गोरखनाथ के शिव मंदिर को देखने ही आते हैं । पहले तो तीन सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, पर उसके आगे कोई ठीक ठिकाने का रास्ता नहीं है । जो पगडंडी सी लकीर है वो फिसलन भरी, संकरी, पथरीली है । कोई बताने वाला तक नहीं कि कहां जाएं । मंदिर तक लगभग यही हाल ।

एक और हिदायत भावी साहसिकों को कि वहां लंगूरों की बहुतायत है इसलिए जरा अपने थैले, कैमरे, चश्में, टोप, टोपी वगैर संभालकर चलें । स्टेशन से झरनों तक पहुंचने के दो रास्ते हैं – एक सीधा और एक टेढ़ा । सीधा रास्ता जंगल विभाग का है जिसमें कुछ टिकट विकट लगता है और दूसरा पुलों को पार करके जो कुछ जोखिम वाला है । ज्यादातर लोग यही लेते हैं, पैसे के पैसे बचे और बहादुरी का परीक्षण हो गया ।

ऊपर की ओर जाने पर समय से लौटना मुश्किल हो सकता था क्योंकि वापसी के लिए हमें वहीं गाड़ी 3:30 पर मिलनी थी । और जैसा कि बता चुके हैं, गाड़ी छूटी तो वहां न तो रुकने का कोई ठिकाना है, न वापसी का कोई जरिया । सुना है जंगल भी निरापद नहीं, जंगली जानवरों और भालुओं का घर है ।

हमने समय की कमी को देखते हुए झरने की ओर कदम बढ़ा दिए जो कि घने जंगल के बीच बनी पगडंडियों से होकर जाता था । जगह कुछ इतनी थी कि एक के पीछे एक होकर आगे बढ़ा जा सके सो सभी झरने की ओर बढ़ने लगे ।

करीब आधे घंटे चलने पर झरने की आवाज सुनाई दी जो अपनी गर्जना से सबको डरा भी रहा था और साथ ही रोमांच भी पैदा कर रहा था ।

सामने जो मनमोहक दृश्य था उसे देख सब खुशी से झूम उठे । घनी चट्टानों के बीच से तेज आवाज करता दूधिया झाग फैंकता प्रतीत होता झरना । सारी थकान दूर हो गई जब पानी में पैर डाल कर बैठे । तभी घटी वह घटना जिसने थोड़ी देर को हमारे होश उड़ा दिए थे । कहते हैं यात्रा में सामान्य और सुखकर अनुभवों से ज्यादा यादगार हो जाते हैं ऐसे दुर्घटना भरे अनुभव जो भुलाए नहीं भूलते । तो ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ ।

हुआ यूं कि हमारे कुछ साथी नहाने के लिए झरने के करीब पहुंच गए । हरियाणा के पन्नू जी का पैर फिसला और वे लगातार नीचे की ओर लुढ़कने लगे । भय से हमारी तो चीख निकल पड़ी, उनके होठों पर गहरी चोट लगी और खून देखकर हमारी हालत खराब । लेकिन ईश्वर की कृपा रही कि थोड़ी दूर सरकते हुए उन्होंने खुद को किसी तरह संभाल लिया और कोई बड़ी दुर्घटना होते होते रह गयी । थोड़ी देर तो सबको चुप सी लग गई लेकिन फिर सब संभल गए । हम गए तो थे नहाने के सामान से लैस होकर और पूरा दृश्य भी स्नान योग्य नयनाभिराम । लेकिन इस दुर्घटना ने ऐसा आतंकित कर दिया कि महिलाओं ने तो नहाने का विचार त्याग ही दिया ।

थोड़ी देर बैठकर झरने की सुंदरता देखते रहे । सामने वो पुल दिख रहा था जिससे होकर ट्रेन गुजरी थी । जिज्ञासावश सोचा गया कि ऊपर चलकर देखते हैं कि झरना कहां से निकल रहा है । काफी ऊपर चढ़ाई करने पर हमें एक मंदिर दिखा, भूख प्यास से हालत खराब थी । मंदिर के पुजारी ने हम सबको गर्मागर्म चाय पीने को दी । आश्चर्य कि इतनी ऊंचाई पर मंदिर में ये कहां से आते हैं । और इन्हे दूध और चाय बनाने की सामग्री कहां से मिलती है । पूछने पर पता चला कि ये यहीं मंदिर में रहते है और भगवान की सेवा के अलावा हर आने जाने वाले को मुफ्त चाय पिलाते हैं । किसी की इच्छा हो तो कुछ दे सकता है, खुद किसी से न बोलते हैं न मांगते हैं ।

प्रकृति की इस अद्भुत सुंदरता को हमने न सिर्फ अपने कैमरों में कैद किया बल्कि स्मृति के स्थाई कैमरे में भी ।

ढाई बज चुके थे और हमारी वापसी की ट्रेन का भी समय हो रहा था, सो अपनी अपनी सहूलियत से सब ग्रुप में लौटने लगे । वापस स्टेशन पहुंचने में भी आधा घंटा लगा । हम कुछ जो एक ग्रुप में आए थे अपने साथियों का इंतजार करने लगे जो ट्रेन आने के थोड़ी ही देर पहले पहुंचे । हुआ ये कि एडवेंचर के चक्कर में वे पुल के रास्ते चले गए जो कि बहुत ही डरावना अनुभव रहा उनका । इसी के चलते उन्हें बहुत घूम कर आना पड़ा । खैर भला हुआ कि ट्रेन के आने से पहले वे सब आ गए क्योंकि अगर उनसे पहले ट्रेन पहुंच जाती तो पुल एक मात्र रास्ता था उनके लिए और ट्रेन के लिए भी तब शायद कोई बड़ी दुर्घटना भी हो सकती थी ।

मारवाड़ से ट्रेन भर कर आती है सो वापसी के इस सफर में वैसी सहूलियत नहीं रही जो आते वक्त थी । सब अलग अलग खड़े हुए कि जिसे जहां जगह मिले बैठ जाए । वापसी में सब अलग थलग जरूर बैठे लेकिन फोन से हाल चाल लेते रहे ।

गोरमघाट वास्तव में प्रकृति की अद्भुत सुंदरता का नमूना है । राजस्थान का नाम सुनकर जहां मस्तिष्क में सूखी रेत और रूखे माहौल की छवि उभरती है उससे अलग एकदम हराभरा सुंदर वनप्रदेश देख कर सहसा यकीन करना कठिन हो जाता है कि ये राजस्थान है ।

हां इस यात्रा में कुछ बातें जरूर ध्यान रखने की है ।

यहां जाने का सबसे अच्छा समय जुलाई से सितंबर है । जब भी जाएं खाने पीने की चीजें साथ लेकर जाएं । कपड़े विशेषकर जूते मजबूत पहनें जिससे चढ़ने उतरने में सुविधा रहे । अपने सामान की सुरक्षा की जिम्मेदारी आपकी अपनी है,मनुष्यों से भी और मनुष्यों के पूर्वज लंगूरों से भी । ध्यान रहे कि गाड़ी आपका एकमात्र वाहन है और वहां रात को रुकने का कोई इंतजाम नहीं हो सकता है ।


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.