लाखों लोगों की तरह मैं भी इरफान का मुरीद था और उनकी फिल्मों के रिलीज़ होने का इंतजार करता था…

Hemant Kumar Jha

इरफान खान पारंपरिक अर्थों में स्टार नहीं थे, लेकिन समकालीन हिन्दी सिनेमा को समृद्ध करने में जिन कुछ खास कलाकारों का खास योगदान है उनमें उनका नाम लिया जाता है। वे जिस फ़िल्म में होते थे, लोग मान लेते थे कि उसमें दम होगा, क्योंकि इरफान हैं।

जब किसी कलाकार की उपस्थिति मात्र से फ़िल्म को पहचान मिले तो समझा जा सकता है कि उसका जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है।

‘पान सिंह तोमर’ के बाद उनका कैनवास बड़ा हो गया था और वे संजीदा अभिनेताओं की पहली पंक्ति में गिने जाने लगे थे। इसके पहले, एक अंग्रेजी फ़िल्म, शायद ‘वारियर’ नाम था उसका, में भी वे आए थे जिसने उन्हें बड़ी शोहरत दी थी।

‘मकबूल’ उनकी अभिनय यात्रा में मील का पत्थर है जिसमें पंकज कपूर और तब्बू जैसे मंजे हुए स्थापित कलाकारों के रहते इरफान ने सबसे अधिक प्रशंसा पाई। फिर तो…एक के बाद एक कई फिल्में आईं और वे ऊंचाइयां चढ़ते ही गए।

‘साहब, बीवी और गैंग्स्टर-पार्ट 2’ अगली ऐसी फिल्म थी जिसमें इरफान ने अविस्मरणीय अभिनय किया। हालांकि इस फ़िल्म को आलोचकों की अधिक तारीफ नहीं मिली, लेकिन विलेन का रोल करते हुए भी वे इस फ़िल्म में हीरो जिमी शेरगिल और हीरोइन माही गिल से अधिक महत्वपूर्ण थे। उनके ही कंधों पर चल कर यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सफल रही।

अपने प्रतापी पूर्वजों, जो कि राजा थे, की पराजय का बदला लेने को आतुर, इसके लिये कुछ भी करने को तैयार इरफान अंत में हार जाते हैं और जब क्लाइमेक्स में वे हताश होकर खुद को खत्म करते हैं तो दर्शकों में उनके लिये सहानुभूति उभरती है।

लाखों लोगों की तरह मैं भी इरफान खान का मुरीद था और जिस फ़िल्म में वे काम करते थे उसके रिलीज होने का इंतजार रहता था मुझे। हॉल में देखें तो बरसों बीते, लेकिन लैपटॉप में उन्हें देखता था।

‘साहब, बीवी और गैंग्स्टर’ के इरफान वाले दृश्यों को न जाने कितनी बार मैं ने देखा होगा। उनकी ‘हिंदी मीडियम’ भी मेरे लैपटॉप में है और उसके दृश्य भी देखता रहता हूँ अक्सर।

सच तो यह है कि फ़िल्म के नाम पर बीते दो-तीन वर्षों में जितना भी समय मैं ने लैपटॉप या मोबाइल पर खर्च किया होगा, उसका आधा समय सिर्फ इरफान के लिये था। यू ट्यूब पर खोज खोज कर उनके क्लिप्स, उनकी फिल्में देखने में अच्छा लगता था।

हिंदी मीडियम तो बहुत सारे लोगों ने देखी होगी, मेरा अनुरोध है कि इस लॉक डाउन में समय मिले तो ‘साहब, बीवी और गैंग्स्टर पार्ट-2’ जरूर देखें। इरफान अपने सशक्त अभिनय से आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे।

जब से उन्हें कैंसर होने की बात सुनी, मन बोझिल सा हो गया था। जब उनकी रिकवरी की बात सुनी तो आश्वस्ति मिली। लेकिन…!

दो-तीन दिन पहले इरफान की मां के निधन का समाचार आया था। और फिर…आज वे खुद चले गए।

औपचारिकता नहीं, यह सच्चाई है कि उनके असामयिक निधन से हिन्दी सिनेमा ने अपना एक अनमोल रत्न खो दिया है। उन्हें अभी मीलों आगे जाना था। वे अब इस हैसियत में थे कि उन्हें ध्यान में रख कर फिल्में लिखी जाने लगी थीं। जाहिर है, उनका सर्वश्रेष्ठ आना अभी बाकी था।

लेकिन…होनी को यही मंजूर था। मां की अर्थी उठने के दो-तीन दिन बाद बेटे की अर्थी। विधि का यह कैसा विधान…!


[jetpack_subscription_form title="Subscribe to Marginalised.in" subscribe_text=" Enter your email address to subscribe and receive notifications of Latest news updates by email."]

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.